विद्वता की पहचान :---+ आचार्य अर्जुन तिवारी

07 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (121 बार पढ़ा जा चुका है)

विद्वता की पहचान :---  आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन जीने के लिए अनेक रीतियों - रीतियों का पालन करना बहुत ही आवश्यक है | जो मनुष्य नीति से विमुख होकर चलने का प्रयास करता समाज उससे विमुख हो जाता है | समाज में दो प्रकार के मनुष्य होते हैं एक तो अपने ज्ञान - ध्यान के कारण विद्वान कहे जाते हैं और दूसरे अल्पज्ञ | अल्पज्ञ सदैव जिज्ञासु रहते हुए विद्वानों से कुछ नया जानने की चेष्टा किया करते हैं , परंतु विद्वानों द्वारा उनको ज्ञानार्जन कराने पर जब उनके तर्क बढने लगें तो यह चेष्टा कुचेष्टा में परिवर्तित हो जाती है | ऐसे समय में विद्वानों को क्या करना चाहिए इसका निर्देश नीतिशतकम् में दिया गया है :--"भद्रं भद्रं कृतं मौनं कोकिलैर्जलदागमे ! वक्तारो दर्दुरा यस्य तत्र मौनं समाचरेत !! अर्थात :- जल से भरे हुए बादलों के आगमन पर (वर्षा ऋतु में) कोयल नहीं कूकती है , क्योंकि उस समय यदि मेंढक टर्रा रहे हों तो ऐसे स्थिति में उनका मौनधारण करना ही श्रेयस्कर है | महाराज जनक की सभा में धनुषभंग के बाद जब महारानी सीता जी ने मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम जी को वरमाला पहना दी उस समय हताश - निराश अन्य राजागण टर्राने लगे कि :- सीता को छुड़ा लो , दोनों भाईयों (राम - लक्ष्मण) को बाँध लो आदि - आदि | लेकिन उन सबके इन वक्तव्यों पर धीर गम्भीर श्री राम एवं लक्ष्मण जी नीति का पालन करते हुए मौन ही रहे , क्योंकि वहाँ कुछ भी बोलने का अर्थ था कि वह स्वयंवर सभा रणांगण बन सकता था | यही विद्वता की पहचान है | ऐसे अनेक उदाहरण हमारे इतिहास / पुराणों में दिये गये हैं जो कि हमारे मार्गदर्शक का कार्य करते हैं आवश्यकता है इनको अपनाकर अपनी गम्भीरता बनाये रखने की |* *आज के युग में पहले की अपेक्षा इतिहास को जानने के साधन अत्यंत सरल हो गये हैं | जहाँ पहले सीमित साधन (गुरुकुल एवं सतसंग) थे वहीं आज अनेक विद्वानों द्वारा गूढ विषयों पर लिखी पुस्तकें घर घर में उपलब्ध हैं जिसे पढकर लोग ज्ञानार्जन कर रहे हैं | परंतु पूर्ण तो संसार में कोई हो ही नहीं सकता सिवाय परमात्मा के , चाहे वह लेखक हो या फिर पाठक ! कुछ न कुछ छूट ही जाता है | उस छूटे हुए विषय को जानने के लिए पाठक व्याकुल हो जाता है और उसे विद्वानों के माध्यम से जानने का प्रयास करता रहता है | इस प्रयास में कभी - कभी वह ऐसे - ऐसे तर्क प्रस्तुत करने लगता है कि वह कुतर्क में परिवर्तित होने लगता है , ऐसे समय में समाधानकर्ता मौन हो जाता है क्योंकि यही नीति भी कहती है | जब विश्वमोहिनी स्वयंवर के बाद नारद जी भगवान श्रीहरि से मिले तो अनेकों तर्क - कुतर्क - दुर्वचन कहे परंतु श्रीहरि विष्णु जी कुछ भी नहीं बोले सिर्फ मुस्कराते रहे | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" ऐसे लोगों से कहना चाहूँगा कि :- जिन विषयों पर नारायण के अंशावतार भगवान वेदव्यास जी की लेखनी कुछ भी लिखने में असमर्थ हो गयी उस विषय पर कोई क्या कह सकता है | परंतु इसका अर्थ यह भी न माना जाय कि मनुष्य को जिज्ञासु ही नहीं होना चाहिए | जिज्ञासा मनुष्य को ज्ञानवान बनाती है परंतु इतना भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी के समाधान से यदि हम स्तुष्ट नहीं हैं तो कुचेष्टा या कुतर्क न करके स्वाध्याय करके या कहीं अन्यत्र इस विषय की खोज करने का प्रयास करे |* *जीवन में कई ऐसे विषय होते हैं जो मनुष्य जीवन भर नहीं जान पाता , यही मानव जीवन की सच्चाई है कि वह प्रयास करके भी कभी पूर्ण नहीं हो पाता , क्योंकि पूर्ण तो सिर्फ परमात्मा है |*

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