प्रशंसा :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

08 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (57 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रशंसा :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन विचित्रताओं से परिपूर्ण है , समाज में रहकर मनुष्य कब किससे प्रेम करने लगे और कब किससे विद्रोह कर ले यह जान पान असम्भव है | यह मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह सबसे ही अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है | अपनी प्रशंसा सुनना सबको अच्छा लगता है | कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जो स्वयं अपनी प्रशंसा अपने मुख से करते नहीं थकते हैं तो कुछ लोग इतने मृदुभाषी , प्रभावशाली व सुंदर व्यक्तित्व के धनी होते हैं कि लोग मुक्तकंठ से उनकी प्रशंसा करते रहते हैं | प्रशंसा का सबसे अधिक और असरदार प्रभाव बच्चों के कोमल मन पर पड़ता है , उनको डांटने की अपेक्षा उनकी सराहना की जाय तो यह उनके लिए पुरस्कार से कम नहीं होता है | प्रशंसा से आत्मविश्वास बढता है और व्यक्ति अपने कार्य को और अधिक रुचिकर ढंग से करने लगता है | परंतु किसी की भी प्रशंसा करते समय एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि प्रशंसा सदैव उन्हीं गुणों की करनी चाहिए जो व्यक्ति के व्यक्तित्व में हो | क्योंकि यदि किसी भी व्यक्ति की प्रशंसा बढ चढकर ऐसे गुणों के लिए की जा रही है जो कि उसके अंदर है ही नहीं तो यह प्रशंसा नहीं बल्कि चाटुकारिता कही जायेगी | इस चाटुकारिता से कोई प्रयोजन तो नहीं सिद्ध हो सकता बल्कि सम्बंधित व्यक्ति में अहंकार तो पनपता ही है और साथ ही चाटुकारिता कर रहे व्यक्ति का स्वयं का व्यक्तित्व गर्हित होता है |* *आज समाज में बहुतायत मात्रा में ऐसे लोग मिल जायेंगे जिनके कार्य करने का एकमात्र उद्देश्य होता है प्रशंसा प्राप्त करना , यश कमाना | यदि चार दिन कहीं किसी समाज में प्रस्तुति देने के बाद उन्हें प्रशंसा न मिली तो वे या तो वहाँ अपनी प्रस्तुति देना ही बंद कर देंगे या फिर उस कार्य / समाज से ही विलग हो जायेंगे | जबकि सच्चे व मेहनती व्यक्ति अपना कोई भी कार्य प्रशंसा सुनने के लिए नहीं करते | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि सकारात्मक कार्यों कि सदैव मुक्तकंठ से प्रशंसा करनी चाहिए | कब कहाँ और किसकी किस कार्य के लिए प्रशंसा करना उचित है इसका विशेष ध्यान रखते हुए यदि कार्य प्रशंसनीय हे तो बिना कंजूसी किये प्रशंसा होनी चाहिए , क्योंकि आपके द्वारा कहे गये प्रशंसा के दो बोल उसके लिए संजीवनी का कार्य कर सकते हैं | किसी की भी सकारात्मक प्रशंसा कभी भी एकांत में न करके समूह में करनी चाहिए जिससे कि उसकी प्रशंसा की सुगंध दूर दूर तक फैल सके और अन्य लोग भी उसकी प्रशंसा सुन करके उसके अनुसार कार्य करने को प्रोत्साहित हो सकें | व्यवहारिक जीवन के चार सूत्र बताये गये हैं :- मैत्री , करूणा , मुदिता और उपेक्षा | समान लोगों के साथ , दु:खी लोगों के साथ करुणा , सफल लोगों के प्रति मुदिता एवं कष्ट पहुँचाने वालों के प्रति उपेक्षा का भाव रखना चाहिए | इसमें जो मुदिता है वही प्रशंसा से जुड़ा है |* *जिन्हें प्रशंसा करना नहीं आता उन्हें सीखना चाहिए क्योंकि जब हम किसी के श्रेष्ठ कार्यों की प्रशंसा करते हैं तो हमारे व्यक्तित्व का भी विकास होता है और हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक बनता है |*

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