भागवत रसामृत

10 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (80 बार पढ़ा जा चुका है)

*बिनु सत्संग विवेक न होई* *प्यारे भगवत्प्रेमी सज्जनों-* *प्रभु की कृपा से संत मिलते हैं आर जब संत मिलते हैं तो सत्संग होता है और सत्संग से ही विवेक विवेक जागृत होता* *सत्य और विवेक एक दूसरे के पूरक हैं ज्ञान होगा तो सत्संग में जाओगे और सत्संग में जाओगे तो ज्ञान मिलेगा जहां पर सुंदर बुद्धि हैं वहीं पर विवेक जागृत होता है* *प्यारे सज्जनों-* *बुद्धि के साथ आत्मा का संबंध तो हो जाता है परंतु जब तक उसे कोई महात्मा नहीं मिलता सत्संग लाभ नहीं होता है तब तक विवेक नहीं आता है* *ठीक वही हुआ आत्म देव जी के साथ आत्मा और धुंधली पति पत्नी प्रेम से रह रहे हैं परंतु विवेक रूपी पुत्र नहीं है संत भगवान की कृपा हुई फल दिया पंडित जी को पंडित जी ने धुंधली को खाने के लिए कहा परंतु कुतर्की बुद्धि धुंधली ने फल नहीं खाया गो को खिलाया गो अर्थात् गाय-इन्द्रिय-भक्ति।परिणाम यह हुआ कि गाय से विवेक रूपी गोकर्ण के रूप में आत्म देव शर्मा जी को पुत्र प्राप्त हुआ *प्यारे सज्जनों-* *यदि आत्मा और बुद्ध के संबंध से विवेक रूपी पुत्र पुत्र नहीं होता तो जीव संसार रूपी सागर में डूब मरता है जिसके घर में विवेक रूपी पुत्र नहीं होता वह संसार रूपी सागर में डूब जाता है ।* *इसी से आत्मदेव गंगा के किनारे पर डूब मरने के लिए तैयार थे।* *परंतु विवेक तो सत्संग से प्राप्त होता है और विवेक आत्मा को आमंत्रित करता है और दूसरों को देव बनाने की शक्ति आत्मा में ही है बर्शते आत्मशक्ति को जागृत करना है। हनुमान जी समर्थ थे किन्तु जामवंत ने उनको अपने स्वरूप का ज्ञान कराया तभी उन्हें अपने स्वरूप का ज्ञान हुआ। आत्मशक्ति सत्संग से जागृत होती है सत्संग के बिना जीवन में दिव्यता नहीं आती संत महात्मा द्वारा दिया गया विवेक रूपी फल बुद्धि को पसंद नहीं है धुंधली की छोटी बहन भी बुद्धि है ।मन बुद्धि की सलाह लेता है और दुखी होता है आत्मा को धोखा देता है मन स्वार्थी है । मन जो कहे वो नहीं करना चाहिए विवेक जो करने को कहे वही करना चाहिए। आत्म देव की आत्मा भोली है उसे मन बुद्धि बार-बार धोखा दिया।* *आत्मदेव मन बुद्धि का छल समझ नहीं सके।* *प्यारे सज्जनों -* *सूत जी कहते हैं कि-धुंधुकारी बड़ा होकर के चोरी करने लगा चुप करके वह दूसरों के घर में आग लगा देता छोटे छोटे खेलते हुए बालकों को कुएँ में डाल देता वह अस्त्र शस्त्र धारण किये रहता था। अंधे दीन-दुखियों को व्यर्थ तंग किया करता था चंडालों से उसका विशेष प्रेम था* *"चाण्डालाभिरतो"* *यहां तक कि वह शव के हाथों से भोजन करता ।* *"शवहस्तेन भोजनम्।"* *शव के हाथ कौन ?* *जो हाथ परोपकार नहीं करते, जिन हाथों से भगवान की सेवा न हो वो हाथ शव के हाथ के समान हैं।*

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