नूतन बनाम पुरातन

10 सितम्बर 2018   |  डॉ बृजेन्द्र कुमार अग्निहोत्री   (90 बार पढ़ा जा चुका है)

नूतन को पुरातन से हमेशा शिकायत रही है, आज भी है। इसके बावजूद कि पुरातन से ही नूतन का उद्भव हुआ है। मजेदार बात यह है कि नूतन को यह बात पता है, इसके बावजूद भी..। बात अगर केवल शिकायत तक सीमित रहती तो भी ठीक था, बात अब दोषारोपण तक पहुंच चुकी है। दोषारोपण इसलिए क्योंकि पुरातन - परंपराओं की, सौहार्दता की, मानवता की, और न जाने कितनी अनमोल थातियां सौंपना चाहता है अथवा इसलिए कि उसने नूतन को अस्तित्व दिया। ध्यान देने वाली बात यह है कि नूतन का प्रतिरोध तभी प्रारंभ होता है, जब वह पुरातन का उपभोग कर चुका होता है।

नूतन-पुरातन की इस लड़ाई से साहित्य भी अछूता नहीं है। पिछले कुछ सालों से कई शहरों, प्रांतों के साहित्यकारों से रूबरू होने का अवसर मिल रहा है। हर जगह गुटबाजी-खेमेबाजी। अपने को श्रेष्ठ दिखाने की प्रतिस्पद्र्धा। हम सीखतें हैं वयोवृद्ध वरिष्ठ साहित्यकारों से, फिर उनसे कैसी प्रतिस्पद्र्धा। प्रेम से उनके सान्निध्य में रहो देखो, सब तुम्हारे लिए ही है। यह सच है कि कुछ लेखक (उन्हें साहित्यकार नहीं कहा जा सकता, जो दुराभाव की भावना से इस खाई को और गहरा करते हैं) नवोदित रचनाकारों का शोषण करते हैं, लेकिन अगर हम गौर करें तो ऐसे लोगों के द्वारा ही हमारे अंदर आदमी को पहचानने की क्षमता विकास होता है।

कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जिन्हें यह भी नहीं पता होता कि ‘साहित्य’ किस चिडि़या का नाम है, फिर भी अपनी गंदी टांग से गंदगी फैलाने की कुचेष्टा करते रहते हैं। प्रायः ऐसे लोग नवोदित प्रतिभाओं को दिग्भ्रमित करते देखे जा सकते हैं। सृजनकार के अंदर विनम्रता का होना पहली शर्त है, क्योंकि विनम्रता के अभाव में उसकी ग्राह्य क्षमता स्वमेव नष्ट हो जाती है। और उस पर अगर उसके अंदर अहम् ने घर कर लिया, तो सोने पर सोहागा। फिर तो उसकी रचनाधर्मिता का नष्ट होना तय है, क्योंकि रचनाकार के अंदर का अहम उसके विवेक का नाश कर देगा, फिर कैसे बचेगी उसकी रचनाधर्मिता।

आज का युवा रचनाकार, जो अभी ‘साहित्य’ का क ख ग ..... भी नहीं जानता, उन साहित्यकारों की बुराइयां करता दिखेगा, जिनकी सद्यः रचनायें भी शायद उसने न पढ़ी हों। बुराई करना उसकी दिनचर्या का एक हिस्सा बन जाता है, और इसके द्वारा वह समाज में दस्त करता रहता है। उसको इस बात का अंदाज़ा नहीं होता कि दस्त के बाद कितनी कमजोरी आती है। जाने-अनजाने वह अपना ही नुकसान कर रहा होता है, ऐसा नुकसान जिसकी भरपाई संभव नहीं होती। अनुरोध है आज के रचनाकारों से कि सृजनधर्मिता के दायित्व का निर्वहन करें, सम्मान देंगे तो सम्मान मिलेगा, नहीं तो अस्तित्व बचाना भी असम्भव हो जायेगा।

अगला लेख: अपनी परेशानी



अलोक सिन्हा
12 सितम्बर 2018

बहुत अच्छा ही नहीं , बहुत सशक्त लेख है | आज के नव सृजन कर्ताओं की मानसिकता पर प्रकाश डालने वाला और साथ साथ उनका मार्ग दर्शन करने वाला |

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x