बदले की भावना

12 सितम्बर 2018   |  विजय कुमार तिवारी   (14 बार पढ़ा जा चुका है)

कहानी

बदले की भावना

विजय कुमार तिवारी

भोर की रश्मियाँ बिखेरने ही वाली थीं,चेतन बाहर आने ही वाला था कि उसके मोबाईल पर रिंगटोन सुनाई दिया। उसने कान से लगाया।उधर से किसी के हँसने की आवाज आ रही थी और हलो का उत्तर नही। कोई अपरिचित नम्बर था और हँसी भी मानो व्यंगात्मक थी। कौन हो सकती है? बहुत याद करने पर भी कोई चेहरा नहीं उभरा।.उसने फोन रख दिया और बाहर निकल आया।

कुछ देर बाद उसने चाय का कप उठाया,फिर फोन बजा। वही अजनबी नम्बर था। इसबार उधर से हँसी के साथ प्रश्न भी पूछा गया,'पहचाने?"

"नहीं,आप कौन? किससे बात करनी है?" चेतन ने सामान्य होते हुए उत्तर दिया।

उधर से फिर हास्य के साथ ही कहा गया,"याद कीजिए,आप किसी की शादी की समस्या सुलझाने चले थे और आपने मुझे बहुत समझाने का प्रयास भी किया था।"

"अच्छा तो तुम हो?'चेतन को विगत माह की बातें याद हो आयी,"क्या नाम बताया था तूने अपना?श्यामा--हाँ,श्यामा नाम है तुम्हारा।"

"हाँ, मै श्यामा ही हूँ।"इसबार उसकी आवाज में गम्भीरता थी।

"अब क्या कहना या पूछना चाहती हो?"चेतन पूर्णतः सामान्य होकर चाय पीने लगा।

"नहीं, कुछ नहीं," फोन कट गया।

भोर-भोर की हवा में ताजगी थी,मौसम सुहाना था और एक तरह की खुशबू व्याप्त थी चारो ओर, फिर भी चेतन उल्लसित नहीं था।चिन्ता की लकीरें उभरने लगीं और सबकुछ असामान्य लगने लगा।नये सिरे से उसने विगत माह की पूरी घटना को याद करना चाहा और पूरे हालात में अपने को परखने की कोशिश की। आज लोग बहुत जल्दी अपनी परिस्थिति के लिए दूसरे को जिम्मेदार ठहराने लगे हैं। दोषारोपण तो छोटी बात है,मरने-मारने पर उतारू हो रहे हैं।लगभग आश्वस्त होते हुए वह उठ खड़ा हुआ और अपने अध्ययन कक्ष की ओर बढ़ चला मानो निश्चिन्त हो गया हो कि उसने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है या किया है कि उस पर अंगुली उठे। फिर भी उसका मन पढ़ने में नहीं लगा और विगत माह की सारी स्थितियाँ जीवन्त हो उठीं।

उस रात बरसात हुई थी और अगली सुबह भी मौसम मे गर्मी नहीं थी। पड़ोस की महिला,उनकी 16-17 साल की बेटी भावना और एक अन्य महिला ने दरवाजे पर दस्तक दी।चेतन ने बैठने के लिए कहा और शर्ट पहनने भीतर आया। चाय-वाय के बाद भावना की माँ ने कहा," हम लोग एक समस्या में पड़ गये हैं और आपसे मदद चाहते हैं।"

चेतन को लगा-शायद कुछ पैसों की जरुरत आ पड़ी होगी। उसने पूछना चाहा," कितना?"

"नहीं,पैसा नहीं चाहिए। समस्या दूसरी है,"भावना की माँ ने कहा। परन्तु विशेष बताने में संकोच कर रही थी। भावना भी सिर झुकाये बैठी थी।चेतन ने बारी-बारी से भावना और उसकी माँ को देखा। कोई उत्तर न पाकर उसने साथ आयी महिला की ओर देखा मानो पूछ रहा हो कि आप कौन हैं।

"मैं, इसकी बुआ हूँ," उसने भावना की ओर संकेत करते हुए मुस्करा कर कहा।माहौल में तनिक देर के लिए उभरा हुआ तनाव उस साँवली सुन्दर महिला की मुस्कान से सामान्य हो चला। चेतन भी मुस्करा उठा। भावना की माँ भी हँस पड़ी।

"बेहिचक कहिए,चाहे कोई बात हो," चेतन ने साँवली महिला की ओर देखा।

"बात गाँव वाली श्यामा दीदी की है,बड़े चाचा की बेटी।,"भावना हँस पड़ी।चेतन ने गौर से देखा और समझते देर नहीं लगी कि लड़की अब मन से वयस्क हो चली है या सबकुछ समझने लगी है।

साँवली महिला ने बताना शुरु किया,"श्यामा बहुत गोरी और सुन्दर है। उसकी सुन्दरता से कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। उसे अपनी बिरादरी के ही लड़के से प्रेम हो गया है। घरवालो ने श्यामा की शादी कहीं और तय की है।"

"फिर? " चेतन ने भावना की माँ को देखा।

"आजकल शादी तय होते ही दुल्हा-दुल्हन फोन पर बातें करने लगे हैं। श्यामा भी खूब बातें करती है" साँवली महिला की मुस्कान ऐसी थी मानो उनको भी मजा आ रहा हो।भावना की माँ शरमा रही थी और भावना सबकुछ उगल देना चाहती थी।

"गड़बड़ी कहाँ है?" चेतन ने भावना के उत्साहित चेहरे को देखा।

"गाँव के लड़के ने श्यामा के होनेवाले दुल्हे को नमक-मिर्च मिलाकर सब बता दिया है",भावना की बुआ ने बताया,"और यह भी कि सबकुछ भोग लिया है।"

भावना की माँ ने आग्रहपूर्वक कहा,'आप श्यामा और उसके होने वाले दुल्हा दोनो को समझा दीजिए ताकि सबकुछ अच्छा से सम्पन्न हो जाये।शादी के लिए सारी तैयारी हो चुकी है,बर-बयाना दिया जा चुका है,शादी के निमन्त्रण भेजे जा चुके हैं और सारी खरीदारी हो चुकी है। नहीं हुई शादी तो बेईज्जती तो होगी ही,और न जाने क्या-क्या हो जायेगा।"

ओह तो समस्या यह है-चेतन चिन्तामग्न हो उठा। उसने धीरे से कहा," आप लोग मेरी माने तो इस शादी को न होने दें। लड़की को जीवन-भर शक के घेरे में रहना पड़ेगा।मतभेद के क्षणों में यह बात भूत की तरह उसे दुखी करती रहेगी। ऐसा भी हो सकता है कि भविष्य में यह शादी इसी कारण टूट भी जाय। "

भावना ने श्यामा को फोन लगा दिया और चेतन को पकड़ा दी। उधर से सुबकने और रोने की आवाज आ रही थी। कुछ समय बाद श्यामा ने कहना शुरु किया,"मैं मर जाऊँगी, जान दे दूँगी। शाम तक यह बात पिताजी सहित सबको मालूम हो जायेगी। वही लोग मुझे मार डालेंगें।"फिर रोना शुरु हो गया। चेतन की बातों का कोई प्रभाव नहीं दिख रहा था। बहुत मुश्किल है-प्रेम में घायल लड़की को समझाना। शादी टूटना ही था,टूट गयी।

कहीं से किसी दिन श्यामा ने चेतन को संदेश भेजा और अपने प्रेम की दुहाई दी।उसने बताया कि हम जरूर शादी करेंगें। हमारा प्रेम कमजोर नहीं है।चेतन ने सामान्य तौर पर कुछ बातें की,कुछ पूछा और कुछ समझाया,जिसे उसने भावना सहित सबको दिखाया।

उसी रात चेतन के ह्वाट्सअप पर संदेश आया,' मैं भावना हूँ,नींद नहीं आ रही तो आपसे बातें करना चाहती हूंँ।आप कुछ भी पुछिए,मैं बताऊँगी".आदि आदि अनेक उल-जलूल बातें।थोड़ी शंका तो हुई परन्तु बातें हुईं।

अगले दिन भावना की माँ ने चेतन को बताया कि श्यामा नीचता पर उतर आयी है और आपको भी भावना के साथ जोड़ कर बदनाम करना चाहती है।चेतन को आश्चर्य नही हुआ।उसने श्यामा का कई रुप देखा है।शादी के पहले सबकुछ भोग लेने वाली लडकी कुछ भी कर सकती है।चेतन को याद आया--इसी को कहा गया है-त्रिया चरित्र।

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