कलंक चतुर्थी :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

13 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (144 बार पढ़ा जा चुका है)

कलंक चतुर्थी :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हर्षोल्लास एवं आस्था व आध्यात्मिकता का पर्व "गणेशोत्सव" आज से प्रारम्भ हो चुका है | देश भर में जगह जगह पांडाल लगाकर भगवान गणेश की स्थापना प्रारम्भ हो चुकी है | सिद्धि - बुद्धि के दाता विघ्नहरण गणेश भगवान का जन्मोत्सव एक तरफ तो प्रसन्नता से झूमने को विवश कर देता है वहीं दूसरी ओर कुछ सावधानियाँ भी बनाये रखने का संकेत देता है | क्योंकि आज के दिन किसी भी मनुष्य को चन्द्रदर्शन करना वर्जित कर दिया गया है | आज अर्थात भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्रमा का दर्शन कर लेने से मनुष्य को कोई न कोई कलंक अवश्य लग जाता है | सुंदरता का अप्रतिम उदारहण प्रस्तुत करने वाले चन्द्र को देखना वर्जित क्यों है ?? इसके पीछे एक पौराणिक कथा है | गणेश पुराण के अनुसार जब भगवान गणेश के धड॒ पर गज का शीश रखा गया तो सभी देवताओं ने स्तुति की परंतु चन्द्रमा गणेश जी की हंसी उड़ाने लगा | गणेश जी ने चन्द्रमा को काले हो जाने का श्राप दे दिया ! देवताओं की क्षमा याचना पर गणेश भगवान ने कहा मेरे श्राप को मिथ्या नहीं किया जा सकता परंतु अपनी सुंदरता के अहंकार में चन्द्रमा हम पर हंसा है तो आज इसकी सुंदरता को कोई नहीं देखेगा ! यदि भूलवश किसी ने देख भी लिया तो वह कलंकित अवश्य हो जायेगा | तब से आज तक भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का चन्द्रदर्शन वर्जित माना जाता है और इसे "कलंक - चतुर्थी" का नाम दे दिया गया | यदि किसी ने भूलवश देख भी लिया तो उसके दोष का परिहार हमारे ग्रंथों में मिलता है | श्रीमद्देवीभागवत के माहात्म्य में या श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध मे वर्णित स्यमंतक मणि कथा प्रसंग का श्रवण व पाठन इस दोष से मुक्ति दिलाता है |* *आज के कुछ विधर्मी लोग प्राय: कहा करते हैं कि गणेश महोत्सव का आयोजन नया होने के साथ ही इसका किसी भी ग्रंथ में कोई विधान नहीं मिलता है | इसे आधुनिक महोत्सव मानने वालों से मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूँगा कि सनातन के प्राचीन ग्रंथों :-- "शारदा तिलकम्" , "मंत्र महोदधि" , महामंत्र महार्णव एवं तंत्रशास्त्रों का अध्ययन करें तो उन्हें भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से चतुर्दशी तक गणपति का विग्रह स्थापित करके उनकी उपासना का वर्णन प्राप्त हो जायेगा | गणेश आखिर हैं क्या ?? गण = देव , पति = स्वामी ! देवताओं के प्रमुख , जिनके बिना किसी भी देवता को पूजा का भाग नहीं मिल सकता वह सर्वव्यापी तत्व हैं गणेश | वैसे तो भगवान गणेश जलतत्व के कारक माने जाते हैं परंतु सृष्टि में विराजमान पाँचों तत्वों में ही भगवान गणेश के दर्शन प्राप्त होते रहे हैं | भगवान गणेश सर्वव्यापक हैं , इनकी व्यापकता का अलौकिक उदाहरण तब देखने को मिलता है जब भगवान शिव ने माता पार्वती का पाणिग्रहण करने के इनका पूजन किया था | यह प्रसंग पढकर कुछ लोग भ्रमित हो जाते हैं कि यह भला कैसे सम्भव है कि भगवान शिव + पार्वती विवाह में गणेश का पूजन हो | इस विषय पर इतना ही कहना चाहूँगा कि जिस प्रकार भगवान विष्णु के अनेक अवतार हुए हैं उसी प्रकार गणेश जी के भी अनेक अवतारों का वर्णन प्राप्त होता है तो इसमें इतना संदेह नहीं होना चाहिए |* *भगवान गणेश के जन्मोत्सव का खूब आनंद लें परंतु आज चन्द्रदर्शन न करें ! अन्यथा कलंक लग सकता है |*

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