“बिना राष्ट्रभाषा के देश गूंगा"

14 सितम्बर 2018   |  इंजी. बैरवा   (177 बार पढ़ा जा चुका है)

“बिना राष्ट्रभाषा के देश गूंगा"

बिना राष्ट्रभाषा के तो कोई भी देश गूंगा है । राष्ट्र की अस्मिता की पहचान ही राष्ट्रभाषा से होती है । बगैर इसके सम्पूर्ण देश और देशवासियों की उन्नति सम्भव नहीं है ।

अंग्रेजी भाषा की बढ़ती मांग और हिन्दी का वजूद बनाए रखने के लिए हर साल देशभर में 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है । आज के समय में हिन्दी शहरी इलाकों की बोल-चाल से लगभग समाप्त होती जा रही है 15 अगस्त 1947 को जब देश अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों से आजाद हुआ था तब संविधान सभा में एक विश्वासमत से हिन्दी भाषा को राजभाषा का दर्जा दिया गया था । वर्तमान भारत में हिन्दी समाचार पत्र की संख्या अंग्रेजी समाचार पत्र की तुलना में निरंतर बढ़ती जा रही है लेकिन फिर भी हिन्दी हाशिये पर है

राष्ट्रभाषा का शाब्दिक अर्थ है- समस्त राष्ट्र में प्रयुक्त भाषा अर्थात् आमजन की भाषा (जनभाषा) । जो भाषा समस्त राष्ट्र में जन–जन के विचार–विनिमय का माध्यम हो, वह राष्ट्रभाषा कहलाती है । राष्ट्रभाषा शब्द कोई संवैधानिक शब्द नहीं है, बल्कि यह प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है । राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक शर्त देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है । राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है । राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्क–भाषा होती है । इसका व्यापक जनाधार होता है । राष्ट्रभाषा हमेशा स्वभाषा ही हो सकती है क्योंकि उसी के साथ जनता का भावनात्मक लगाव होता है ।

हालांकि भाषाएं हमारी पैतृक संपत्ति हैं । इन्हें संजोकर रखना हम सबका दायित्व है । यह हमारे पूर्वजों की जिजिविषा ही थी कि सैकड़ों वर्ष की गुलामी के दौर में तमाम आघातों और आक्रमणों को सहते हुए भी उन्होंने अपनी भाषा और संस्कृति को बचाए रखा । आज का दौर संक्रमण का काल है । हिन्दी ज्ञान-विज्ञान, स्वतंत्रता संग्राम, विचार, संस्कृति-संस्कार की भाषा है । सभी विकसित देशों ने अपनी राष्ट्रभाषा में विकास किया है । अपनी मातृभाषा में चिंतन और मनन की प्रक्रिया मौलिक स्वरूप में होती है । यह वही देश है जब यहाँ की भाषा संस्कृत हुआ करती थी तो सारी दुनियां के लोग यहाँ के दर्शन और वैज्ञानिक उपलब्धियों तथा सामाजिक व्यवस्था के कायल हुआ करते थे । अंग्रेज साम्राज्यवादी ताकतों ने यही पहला काम किया । हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए सबसे पहले हमारे विद्यालयों व भाषा-संस्कृति को नष्ट किया है



राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय एकता एवं अंतर्राष्ट्रीय संवाद सम्पर्क की आवश्यकता की उपज होती है । वैसे तो सभी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँ होती हैं, किन्तु राष्ट्र की जनता जब स्थानीय एवं तत्कालिक हितों व पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर अपने राष्ट्र की कई भाषाओं में से किसी एक भाषा को चुनकर उसे राष्ट्रीय अस्मिता का एक आवश्यक उपादान समझने लगती है तो वही राष्ट्रभाषा है । राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्क भाषा होती है । हिन्दी दीर्घकाल से सारे देश में जन-जन के पारस्परिक सम्पर्क की भाषा रही है । यह केवल उत्तरी भारत की नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के आचार्यों वल्लभाचार्य, रामानुज, रामानंद आदि ने भी इसी भाषा के माध्यम से अपने मतों का प्रचार किया था । अहिन्दी भाषी राज्यों के भक्त–संत कवियों (जैसे- असम के शंकरदेव, महाराष्ट्र के ज्ञानेश्वर व नामदेव, गुजरात के नरसी मेहता, बंगाल के चैतन्य आदि) ने इसी भाषा को अपने धर्म और साहित्य का माध्यम बनाया था । भारतवर्ष के भिन्न-भिन्न भागों में जो अनेक देशी भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें एक भाषा ऐसी है जिसमें शेष सब भाषाओं की अपेक्षा एक भारी विशेषता है, वह यह कि उसका प्रचार सबसे अधिक है और वह भाषा हिन्दी ही है । हिन्दी जानने वाला आदमी सम्पूर्ण भारतवर्ष में यात्रा कर सकता है और उसे हर जगह हिन्दी बोलने वाले मिल सकते हैं । भारत के सभी स्कूलों में हिन्दी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए ।

कहने के लिए भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है, परन्तु जहाँ जनता को अपनी भाषा में न्याय पाने का हक नहीं है, वहाँ प्रजातंत्र कैसा ? दुनिया के तमाम उन्नत देश इस बात के प्रमाण हैं कि कोई भी राष्ट्र विदेशी भाषा में काम करके उन्नति नहीं कर सकता । किसी भी विदेशी भाषा के माध्यम से आम जनता की प्रतिभा की भागीदारी देश की विकास-प्रक्रिया में नहीं हो सकती । प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से विश्व के वही देश अग्रणी हैं जो अपनी जन-भाषा में काम करते हैं; और प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से विश्व के वे देश सबसे पीछे हैं जो विदेशी भाषा में काम करते हैं । विदेशी भाषा में उन्हीं अविकसित देशों में काम होता है, जहाँ का बेईमान आभिजात्य वर्ग विदेशी भाषा को शोषण का हथियार बनाता है और इसके द्वारा विकास के अवसरों में अपना पूर्ण आरक्षण बनाए रखना चाहता है ।

आज परिवार रूपी सत्ता को बचाना है तो हिन्दी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं को अपनाना होगा । इस विषय में हिन्दी भाषा दो-तरफा चुनौतियों से जूझ रही है । उसका पहला संग्राम अंग्रेजी से है तो दूसरी तरफ क्षेत्रीय भाषाओं की चुनौती भी उसे झेलनी पड़ रही है । हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाया जाने हेतु, अनुच्छेद 348 में संशोधन करने की हमारी प्रार्थना भी एक ऐसा विषय है जिसमें संसाधनों की कमी का कोई बहाना नहीं बनाया जा सकता है । यह शासक वर्ग द्वारा आम जनता को शोषित करते रहने की दुष्ट भावना का खुला प्रमाण है । छोटी-छोटी बात पर और प्रायः बेबात संविधान को इत्थमभूत धर्मग्रंथ-सा मानकर अशोभनीय व्यवहार करने वाले छुटभैयों से लेकर कथित राष्ट्रीय नेताओं तक ने कभी राष्ट्रभाषा को मुद्दा नहीं बनाया । जब कभी किसीने इस पर आवाज़ उठाई तो बरगलाया गया कि भाषा संवेदनशील मुद्दा है । तो क्या देश को संवेदनहीन समाज अपेक्षित है ? कतिपय बुद्धिजीवी भाषा को कोरी भावुकता मानते हैं । शायद वे भूल जाते हैं कि युद्ध भी कोरी भावुकता पर ही लड़ा जाता है । युद्धक्षेत्र में "हर-हर महादेव' और "पीरबाबा सलामत रहें' जैसे भावुक (!!!) नारे ही प्रेरक शक्ति का काम करते हैं । यदि भावुकता से राष्ट्र एक सूत्र में बंधता हो, व्यवस्था शासन की दासता से मुक्त होती हो, शासकों की संकीर्णता पर प्रतिबंध लगता हो, अनुशासन कठोर होता हो तो भावुकता अनिवार्य रूप से देश पर लाद दी जानी चाहिए । यह हमारी आजादी को निष्प्रभावी बना रहा है । क्या स्वाधीनता का अर्थ केवल ‘यूनियन जैक’ के स्थान पर ‘तिरंगा झंडा’ फहरा लेना ही काफी है ? इस विषय में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिए जाने हेतु, संविधान संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत करने हेतु देश के सभी सजग नागरिक सरकार पर दबाव डालें, यही मेरा “हिन्दी-दिवस” पर आग्रह है ।

जनता की बात जनता की भाषा में होनी चाहिए ।

अगला लेख: तुरंत आवश्यकता है !!!



अलोक सिन्हा
15 सितम्बर 2018

अच्छा लिखा है |

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