अपना सोंचा होत नहिं :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

20 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (117 बार पढ़ा जा चुका है)

अपना सोंचा होत नहिं :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सकल सृष्टि में ईश्वर ने मनुष्य को सभी अधिकार दे रखे हैंं | जैसी इच्छा हो वैसा कार्य करें यह मनुष्य के हाथ में है | इतना सब कुछ देने के बाद भी परमात्मा ने कुछ अधिकार अपने हाथ में ले रखे हैं | कर्मानुसार भोग करना मनुष्य की मजबूरी है | जिसने जैसा कर्म किया है , जिसके भाग्य में जैसा लिखा है वह उसको भोगना ही पड़ेगा | यह अधिकार परमात्मा ने मनुष्य को नहीं दिया है | आदिकाल से लेकर आज तक अनेक घटनाएं देखने को मिलती है जहां मनुष्य अपना सोचा हुआ कार्य नहीं कर पाता | किसी ने लिखा है :-- "अपना सोंचा होत नहिं हरि सोंचा तत्काल" | परमात्मा जो सोचता है या परमात्मा ने जो नियति बना रखी है वह तत्काल घटित हो जाता है , और मनुष्य की सारी योजनाएं धरी रह जाती हैं | महाराज दशरथ ने मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम को राजा बनाने की घोषणा कर दी थी परंतु परमात्मा की नियति नहीं थी और उनको बनवास जाना पड़ा | दैत्त्यगुरु शुक्राचार्य दैत्यराज बलि को स्वर्ग का राजा बनाने के लिए सौ यज्ञ करने का विधान बतलाया | राजा बलि ने ९९ यज्ञ पूरी भी कर ली , १००वीं करने जा रहा था जिसके बाद उसे स्वर्ग का राजा बनने से कोई नहीं रोक सकता था , लेकिन उसकी योजनाओं को रोका स्वयं परमात्मा ने , और बामन का अवतार रख कर के उसके सामने पहुंच गए | जो राजा अपने बाहुबल से स्वर्गाधिपति होना चाहता था उसको पाताल लोक भेज दिया | उसकी इच्छा अधूरी रह गई | इसीलिए हमारे महर्षियों ने बताया है कि मनुष्य को अपने सकारात्मक कर्म करते रहना चाहिए , कब क्या होना है ?? इसका निर्णय परमात्मा ही करेगा | क्योंकि यहां सारे विधान आपको कब क्या करना है कहां जाना है यह सब परमात्मा ने पहले से ही रच कर के रखा है | कोई काम बिगड़ जाने पर किसी का दोष ना दे करके इसे यह मानना चाहिए कि यही नियति है |* *आज के आधुनिक युग में मनुष्य ने बहुत प्रगति कर ली है चंद्रलोक की यात्रा करने वाला मंगल ग्रह पर भी पहुंच गया परंतु आज भी मनुष्य कर्म के लिखे को एवं परमात्मा की नियति को टालने में असमर्थ ही है | कुछ लोग ऐसे भी हैं जो परमात्मसत्ता को नहीं मानते हैं परंतु एक समय ऐसा आता है जब उनको भी उस सत्ता को मानना पड़ता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूं कि मनुष्य किसी उत्सव का आयोजन तो बड़ी धूम-धाम से करता है परंतु कभी-कभी ऐसा होता है सारे आयोजन निरस्त करने पड़ते हैं , क्योंकि परमात्मा की नियत नहीं होती है | मनुष्य के समस्त संसाधन पड़े रह जाते हैं और वह परमशक्ति क्षण भर में अपना कार्य कर देती है | इसीलिए कहा गया है :-- "तेरी सत्ता के बिना हे प्रभु मंगल मूल ! पत्ता तक हिलता नहीं खिले ना कोई फूल !!" हम चाहे जितने प्रगतिशील हो जाए चाहे जितनी उन्नति कर ले लेकिन उस परमसत्ता के आगे हम हमेशा गौण ही रहेंगे | परंतु मनुष्य यह बात मानने को तैयार नहीं होता | आज का मनुष्य कहता है जो करता हूं मैं करता हूं परमात्मा क्या है परंतु वही परमात्मा अपने पर आता है मनुष्य के सारे मंसूबे धरे रह जाते हैं , और तब मनुष्य यह मानने को मजबूर हो जाता है कि इस संसार से अलग भी कोई शक्ती है जो इस संसार का संचालन कर रही है , और इसे मानना ही मनुष्य के हित में है | मनुष्य को अपना कर्म करते रहना चाहिए फल की चिंता नहीं करनी चाहिए , ऐसा योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता में भी कहा है | आज अगर हम दुखी हैं तो इसका एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि हम स्वयं को ही सब कुछ मानने लगे हैं | जिस दिन स्वयं को कुछ ना मान करके परमात्मा को शक्ति को मानने लगेंगे उसी दिन सारे दुख दूर हो जाएंगे |* *यह मानना ही पड़ेगा कि हमारे अलावा भी कोई शक्ति है जो कि समस्त सृष्टि का संचालन कर रही है | जिसने इसको नहीं माना है वह पग-पग पर दुखी होता देखा गया है | अत: उस परम सत्ता को स्वीकार करना ही मनुष्य की बुद्धिमत्ता है |*

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