कर्मफल का सिद्धांत :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

20 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (77 बार पढ़ा जा चुका है)

कर्मफल का सिद्धांत :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*संसार में जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित है | अमर इस संसार में कोई नहीं है | जन्म एवं मृत्यु के बीच का जो समय होता है उसे जीवन कहा जाता है | मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में अनेक अनुभव करता रहता है | सुख - दुख , शोक - प्रसन्नता , हानि - लाभ आदि समय समय पर मनुष्य को प्राप्त होते रहते हैं | इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण होता है मनुष्य का कर्म एवं उसके प्रतिफल में प्राप्त होने वाला कर्मफल | मनुष्य के द्वारा किए गए कर्म ही फल के रूप में उसको वापस मिलते हैं | कर्म का सिद्धांत कितना सुंदर है कि मनुष्य इससे बच नहीं सकता चाहे वह स्वयं भगवान ही क्यों ना हों | जिसने जैसा कर्म किया उसको उसका फल भुगतना ही पड़ेगा | हमें संसार में जहां अनेकों प्रकार के सगे - संबंधी, परिवार , समाज आदि मिले हुए हैं वहीं इनसे मिलने वाले नाना प्रकार के कष्ट भी हैं | देखने में तो यह लगता है कि अमुक व्यक्ति के द्वारा हम को कष्ट मिला परंतु यह भी सत्य है कि वह कष्ट हमको हमारे पूर्व कर्मों के फल के रूप में मिल रहा है | क्योंकि हमारे ग्रंथ बताते हैं कि संसार सागर में कोई किसी को न सुख देता है ना दुख देता है जीव मात्र अपने कर्मों के अनुसार ही फल भोगते हुए इस संसार सागर में जीवन यापन करता है | महाराज दशरथ को पुत्र वियोग के कारण अपने प्राण त्यागने पड़े और संसार के लोगों ने इसका सारा दोष कैकेयी एवं मंथरा पर लगाया , परंतु यह भी ध्यान देना चाहिए कि महाराज दशरथ जी द्वारा श्रवणकुमार की हत्या के बाद अंधे माता - पिता के प्राणत्याग का फल दशरथ को प्राण त्याग करके भुगतना पड़ा | यह है कर्म फल का अकाट्य सिद्धांत |* *आज जिधर भी दृष्टि डालो हर जगह दुख ही दुख दिखाई पड़ता है | कोई धन से दुखी है , कोई तन से दुखी है , कोई परिवार से दुखी है तो कोई समाज और राष्ट्र से दुखी है | सुख तो जैसे इस संसार से पलायन कर चुका है | यह बड़ी हास्यास्पद स्थिति है कि मनुष्य को जब सुख मिलता है तब वह बड़ा प्रसन्न होता है और कहता है कि सुख हमको हमारे कर्मों से मिला है परंतु जब वह दुखी होता है तो सारा दोष दूसरों पर लगाना चाहता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज समाज में यत्र - तत्र सर्वत्र देख रहा हूं कि लोग धनी तो हैं परंतु परिवार से नहीं सुखी हैं | किसी को अपने पुत्र से दुख है तो किसी पुत्र को अपने पिता से कष्ट है | यदि किसी को अपने संतान के द्वारा कष्ट मिल रहा है तो यह मान लेना चाहिए कि हमारे पूर्व जन्मों का कोई दोष है जो हमको इस जन्म में भुगतना पड़ रहा है | क्योंकि यहां आपके एक-एक क्षण का हिसाब होता है और वही आपको वापस मिलता है | जिस प्रकार धरती से आसमान की ओर फेंकी हुई कोई भी वस्तु वापस धरती पर ही आती है ठीक उसी प्रकार मनुष्य के द्वारा किए हुए कर्म ही उसको वापस कर्मफल के रूप में मिलते हैं | यदि आज हम को किसी प्रियजन के द्वारा कष्ट मिल रहा है तो इसका दोष किसी को ऊपर न लगा कर के यह मानना चाहिए कि हमारे पूर्व जन्मों के या इसी जन्म के किए हुए कर्मों का फल है जो आज हमको भुगतना पड़ रहा है | किसी के अंदर इतनी सामर्थ्य नहीं है जो किसी को सुख या दुख दे सके | यदि संतान के द्वारा सुख प्राप्त हो रहा है तो भी यह मानना चाहिए कि पूर्व जन्म में हमने कोई अच्छे कर्म किए हैं जिसका प्रतिफल आज हमको मिल रहा है |* *कर्मों का फल मनुष्य को मिलता अवश्य है | अतः मनुष्य को कोई भी कर्म करने के पहले यह अवश्य विचार कर लेना कि इसका फल चाहे सुख रूप में हो या दुख रूप में भोगना हमको ही है |*

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