भगवान वामन का अवतार :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

20 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (90 बार पढ़ा जा चुका है)

भगवान वामन का अवतार   :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में जहाँ ३३ करोड़ देवी - देवताओं का वर्णन मिलता है वहीं प्रमुख तीन देव (ब्रह्मा , विष्णु , महेश) भी कहे गये हैं | इन प्रमुख त्रिदेवोों में ब्रह्मा जी सृजन करते करते हैं , विष्णु जी पालन करते हैं और भगवान रुद्र को संहार का कारक माना जाता है | सृजन और संहार जहाँ प्रथम और अंतिम चरण है वहीं पालन करना जीवन पर्यन्त का कार्य है , अत: पालक का कर्तव्य सृष्टिकर्ता एवं संहारक से कहीं अधिक बढ जाता है | इसीलिए समय समय पर विकृत होते समाज को पुनर्स्थापित करने के लिए सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्री हरि नारायण विष्णु ने इस धराधाम पर अवतार धारण किया है | अपने इन्हीं अवतारों में एक "वामनावतार" भगवान ने "भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी" को मध्य दिवस में कश्यप जी के आश्रम में देवता माता दिति के गर्भ से जन्म लिया | राजा बलि के भय से भयभीत देवताओं को निर्भय करने के लिए वामन भगवान राजा बलि की यज्ञभूमि में पहुँच गये | दान स्वरूप मांगे गये मात्र तीन पग में तीनों लोकों को नापकर राजा बलि को सुतललोक प्रदान करके भगवान ने उसे वरदान भी दिया !:-- "नित्यं द्रष्टासि मां तत्र गदापाणिम वस्थितम् !" इस प्रकार भगवान ने यहां अपनी निग्रहात्मिका कृपा को ही कृपा के रूप में निरुपित किया है | भगवान कहते हैं :- ‘मैं जिसके ऊपर कृपा करता हूं, उसके धन का हरण कर लेता हूं, जिस धन के मद से व्यक्ति उन्मत्त होकर लोक की और मेरी अवमानना करता है | भगवान जब कृपा करते हैं तो तीन कदम यानि तीन चीजें मांगते हैं — तन, मन और धन | जो उन्हें अर्पित कर देते हैं तो भगवान उनकी रक्षा स्वयं करते हैं | वामन चरित्र का रहस्य है कि यद्यपि परमात्मा बड़े हैं, तब भी बलि के आगे वामन अर्थात छोटे बनते हैं | इस अवतार द्वारा भगवान ने भक्त के सामने अपने को छोटा मानने का रहस्य भी प्रकट किया है | भगवान ने विराट रूप द्वारा अपनी दिव्यता, प्रभुता, सर्वव्यापकता को दर्शाया है |* *आज के समाज में दानदाताओं की एक लम्बी कतार देखी जा सकती है | जो कि बड़े मठ मन्दिरों में दान करके भव्य आयोजनों में सहायक होते रहते हैं | परंतु दुख तब होता है जब अपनी ख्याति बढाने के उद्देश्य से दान करने वाले ये बड़े बड़े दानदाता अपने दरवाजे पर पहुँचे किसी भूखे गरीब को अपशब्द कहते हुए धक्के मारकर भगा देते हैं | ऐसा वे इसलिए करते हैं क्योंकि उस गरीब को भोजन कराते हुए कोई देखेगा नहीं तो उनकी ख्याति भी नहीं होगी तो कुछ देने से क्या लाभ ?? मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इन सभी दानदाताओं से कहना चाहूँगा कि दिखावे के दान करने की मानसिकता से ऊपर उठकर कुछ शिक्षा राजा बलि से लेने का प्रयास करें ! जिन्होंने भगवान वामन से यह नहीं पूछा कि आप कौन हैं ? और तो और गुरु शुक्राचार्य के बताने पर भी उन्होंने द्वार पर आये याचक को खाली नहीं लौटाया और सबकुछ दान कर दिया | सबकुछ दे देने पर ही उसे "भगवत्कृपा" प्राप्त हुई | मनुष्य जब अपना तन मन धन अर्पण कर देता है तभी उसे परमात्मा की कृपा मिलती है |* *यदि "भगवत्कृपा प्राप्त करनी है तो प्रत्येक मनुष्य को दिखावे मात्र की पूजा , पाठ , तीर्थ , दान आदि से विमुख होना पड़ेगा |*

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