अनन्त चतुर्दशी :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

23 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (87 बार पढ़ा जा चुका है)

अनन्त चतुर्दशी :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म प्रत्येक पर्व एवं त्योहार स्वयं इस वैज्ञानिकता कुछ छुपाये हुए हैं | इतना बृहद सनातन धर्म कि इसके हर त्यौहार अपने आप में अनूठे हैं | आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को "अनंत चतुर्दशी" के नाम से जाना जाता है | संपूर्ण भारत में भक्तजन यह व्रत बहुत ही श्रद्धा के साथ लोग रहते हैं | "अनंत चतुर्दशी" का व्रत भगवान श्री हरि नारायण विष्णु को समर्पित है | हमारे सनातन धर्म में भगवान नारायण एवं उनकी लीलाओं को "अनन्त" कहा गया है | इस व्रत को करने का अर्थ यह है मनुष्य सनातन धर्म में बताएं गये चौदह लोकों के सुख मानवयोनि में ही भोग करने की इच्छा पूरी करता है | अपने पापों का प्रायश्चित करके पूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त के हेतु यह व्रत किया जाता है | दुर्योधन की सभा में अपना सब कुछ जुए में हार कर के पांडव निराश्रित होकर बारह वर्ष का वनवास भोग रहे थे , उसी समय खांडव वन में उनसे मिलने भगवान कृष्ण और उन्होंने वर्तमान कष्ट से निवृत्ति के लिए युधिष्ठिर को अनंत चतुर्दशी का व्रत विधान करने का सुझाव दिया , जिससे उनका खोया राज्य पुनः प्राप्त हो सके | महाराज युधिष्ठिर ने पूर्ण श्रद्धा के साथ अनंत चतुर्दशी का व्रत किया एवं महाभारत जैसे विशाल युद्ध में विजय प्राप्त करके अपना खोया राज्य एवं ऐश्वर्य पुनः प्राप्त किया | जो भी मनुष्य श्रद्धा भक्ति के साथ अपने समस्त पापों का प्रायश्चित करते हुए अनंत चतुर्दशी का व्रत करके भगवान श्री हरि विष्णु की श्रद्धा भक्ति के साथ पूजन करता है उसका खोया हुआ ऐश्वर्या पुनः प्राप्त हो जाता है | यह अनंत चतुर्दशी अपने आप में एक एक सिद्ध व्रत है जिसको यदि चौदह वर्ष तक लगातार कर लिया जाए तो मनुष्य के लिए कुछ भी अप्राप्त नहीं रह जाता |* *आज संपूर्ण भारत में विगत दस दिनों से चल रहे हैं गणेश महोत्सव का समापन दिवस भी है | भिन्न-भिन्न पांडालों में स्थापित किए गए विघ्न विनाशक भगवान गणेश आज जल में समाहित हो जाएंगे | भगवान गणेश का विसर्जन इस बात का उदाहरण प्रस्तुत करता है कि इस धरा धाम पर देव , दनुज , दानव , मानव कोई भी हो जो आया है उसको जाना ही पड़ेगा , यहां कोई नहीं रह सकता है | इसी क्रम में आज भगवान गणपति विसर्जन भक्त पूरी श्रद्धा भाव से करेंगे | कुछ लोग प्राय: यह प्रश्न किया करते हैं कि इतनी महंगी मूर्तियां आखिर जल में प्रवाहित क्यों कर दी जाती हैं ?? ऐसे सभी लोगों से मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" मात्र इतना कहना चाहूँगा कि तीन लोक , चौदह भुवन में मानव योनि से बढकर कीमती कुछ भी नहीं है | समय आने पर इस अनमोल काया का भी विसर्जन ही करना पड़ता है | भगवान गणेश "जलतत्व" के स्वामी हैं | चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक अनवरत महाभारत का लेखन करते हुए जब उनके शरीर का ताप बढ गया तब वेदव्यास जी ने उनका ताप मिटाने के लिए उनको जल में डुबो दिया | तब से चतुर्थी से चतुर्दशी तक गणेशपूजन करके "अनन्त चतुर्दशी" को "गणपति बप्पा" को जल में स्थान दिया जाता है |* *सनातन धर्म का प्रत्येक पर्व किसी न किसी पौराणिक चरित्र एवं रहस्यों से जुड़ा है ! आवश्यकता है इन्हें जानने व समझने की |*

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