आओ पितरों को याद करें :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

24 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (78 बार पढ़ा जा चुका है)

आओ पितरों को याद करें :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में ऐसी मान्यता है कि मनुष्य जन्म लेने के बाद तीन प्रकार के ऋणों का ऋणी हो जाता है | ये तीन प्रकार के ऋण मनुष्य को उतारने ही पड़ते हैं जिन्हें देवऋण , ऋषिऋण एवं पितृऋण के नाम से जाना जाता है | सनातन धर्म की यह महानता रही है कि यदि मनुष्य के लिए कोई विधान बनाया है तो उससे निपटने या मुक्ति पाने का मार्ग भी बतलाया गया है | मनुष्य जीवन में तीन अलग अलग प्रकार के ऋणों को उतारने में शायद सक्षम न हो सके अत: इन तीनों ऋणों को एक साथ उतारने का अवसर मिलता है एक विशेष पक्ष में | भाद्रपद माह की पूर्णिमा से आश्विनमाह की अमावस्या पर्यन्त सोलह दिनों के पक्ष को "पितृपक्ष" का नाम देकर कुछ विशेष विधान (तर्पण + पिंडदानादि) बतलाये गये हैं जिनका पालन करने पर मनुष्य एक साथ तीनों ऋणों से उऋण होने का प्रयास कर सकता है | इन विशेष सोलह दिनों को श्राद्धपक्ष भी कहा गया है जिसमें श्राद्धकर्म करके मनुष्य पितरों को संतुष्ट करता है | पितरों के प्रति तर्पण अर्थात जलदान पिंडदान पिंड के रूप में पितरों को समर्पित किया गया भोजन ही श्राद्ध कहलाता है | देव, ऋषि और पितृ ऋण के निवारण के लिए श्राद्ध कर्म है | अपने पूर्वजों का स्मरण करने और उनके मार्ग पर चलने और सुख-शांति की कामना ही वस्तुत: श्राद्ध कर्म है | पूर्णिमा तिथि के साथ ही आज से श्राद्ध पक्ष प्रारम्भ हो जाएगा | सोलह दिन के लिए हमारे पितृ घर में विराजमान होंगे | अपने वंश का कल्याण करेंगे | घर में सुख-शांति-समृद्धि प्रदान करेंगे | जिनकी कुंडली में पितृ दोष हो, उनको अवश्य अर्पण-तर्पण करना चाहिए | वैसे तो सभी के लिए अनिवार्य है कि वे श्राद्ध करें | श्राद्ध करने से हमारे पितृ तृप्त होते हैं | आज सोमवार को पूर्णिमा है | जिन लोगों की मृत्यु पूर्णिमा को हुई है, वे सवेरे तर्पण करें और मध्याह्न को भोजनांश निकालकर अपने पितरों को याद करें |* *आज मनुष्य नाना प्रकार के दुखों से पीड़ित है कोई भी सुखी नहीं दिखाई पड़ता है | लोग परेशान होकर पंडित , आचार्य एवं ज्योतिषियों के पास जाते हैं तब उनको पता चलता है कि पितृदोष के कारण उनको कष्ट प्राप्त हो रहा है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि आज मनुष्य के दुख का सबसे बड़ा कारण है अपनी मान्यताओं को भूल जाना | आज भौतिकता की चकाचौंध में मनुष्य जहाँ एक ओर इन मान्यताओं को मात्र ढकोसला मानता हैं वहीं इनसे किनारा भी कर रहा है | परंतु मैंने यह भी देखा है कि इन प्राचीन मान्यताओं को न मानने वाले जब जीवन में संघर्ष करने के बाद भी सफल नहीं होते हैं तो किसी विद्वान की शरण में दीन हीन बनकर जाते हैं और तब विद्वान द्वारा उनको पितृदोष और उसके निवारण का उपाय बताया जाता है | उस समय पर मनुष्य की सारी आधुनिकता समाप्त हो जाती है और वह सबकुछ करने को तैयार हो जाता है | कहने का तात्पर्य है कि जब कष्ट हुआ तो देवी - देवता - पितर सबको मानने लगता है | सनातन धर्म में इसीलिए समय समय इन विधानों को बनाया गया है कि मानवमात्र इन दुखों से निवृत्ति पाता रहे | यदि पितृपक्ष में विधानानुसार मनुष्य देवतर्पण , ऋषितर्पण एवं पितृतर्पण करता रहे तो शायद उसको इन परेशानियों से छुटकारा मिलता रहे | अपने पितरों की तिथि विशेष पर श्राद्ध अवश्य करना चाहिए | यथाशक्ति तर्पण , पिंडदान करके ब्राह्मण को भोजन करावे | यदि ब्राह्मण न उपलब्ध हो सकें तो पितरों के निमित्त किसी गरीब को या मंदिर में दान कर देना चाहिए |* *हमारा अस्तित्व पितरों से ही है ! जिनके बनाये ऐश्वर्य पर हम अपना जीवन यापन कर रहे हैं उनके लिए वर्ष के सोलह दिन तो निकाल ही सकते हैं |*

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