सनातन धर्म का दर्शन :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

27 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (91 बार पढ़ा जा चुका है)

सनातन धर्म का दर्शन :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म के आर्षग्रंथों (गीतादि) में मनुष्य के कल्याण के लिए तीन प्रकार के योगों का वर्णन मिलता है :- ज्ञानयोग , कर्मयोग एवं भक्तियोग | मनुष्य के लिए कल्याणकारक इन तीनों के अतिरिक्त चौथा कोई मार्ग ही नहीं है | प्रत्येक मनुष्य को अपने कल्याण के लिए इन्हीं तीनों में से किसी एक को चुनना ही पड़ेगा | यह मानव शरीर बहुत ही दुर्लभ है स्वर्ग में रहने वाले देवता , पाताल में रहने वाले असुर , नरक में पीड़ा सहने वाले अनेकानेक जीव एवं भिन्न भिन्न लोकों में रहने वाले यक्ष , किन्नर , गंधर्व आदि इस दुर्लभ मानव शरीर की कामना करते हैं | तीनों लोकों मानव शरीर ही ऐसा है जिस शरीर में आकर अन्त:करण की शुद्धि होने पर ही अपने कर्मों के फलस्वरूप ज्ञान एवं भक्ति की प्राप्ति होती है | स्वर्ग एवं नरक में निवास करने वाले भोगप्रधान शरीर किसी भी साधन को साधने में उपयुक्त नहीं हैं | किसी भी साधन को साधने का सर्वोत्तम कारक है दुर्लभ मानव शरीर | इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में भाव दिया है :-- "साधन धाम मोक्ष कर द्वारा !" अर्थात यह मानव शरीर साधना का धाम एवं मोक्ष प्राप्त का द्वार खोलने वाला है ! इस दुर्लभ मानव शरीर को पा करके भी जिसने इसके महत्व को न समझा उससे बड़ा महामूर्ख कोई अन्य हो ही नहीं सकता | यद्यपि यह मानव शरीर भी नाशवान ही है एक दिन इसे भी मृत्यु का ग्रास बन जाना परंतु यह भी सत्य है कि इसी शरीर के द्वारा मुक्त होने का साधन साधा जा सकता है |* *आज के चकाचौंध भरे आधुनिक युग में चुधियाये अधिकतर मनुष्यों को उपरोक्त तीनों ही योग मनुष्यों को हास्यास्पद ही लगते हैं | ज्ञानी तो बहुत हैं परंतु उनके पास कर्म नहीं है , ज्ञान का सदुपयोग कम एवं दुरुपयोग ज्यादा ही होने लगा है | भक्तिरस में डूबे अनेक लोग दिखाई पड़ जायेंगे जो दूसरों को भक्तियोग अपनाकर सबकुछ भगवान पर छोड़ देने का उपदेश देते रहते हैं परंतु स्वयं भक्ति कौसों दूर दिखाई पड़ते हैं | मृत्यु प्रतिपल शीश पर नाच रही है तो ऐसे में क्या करना चाहिए ?? मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि यह शरीर एर वृक्ष है जिसमें घोंसला बनाकर जीवरूपी पक्षी रह रहा है | यमदुत रूपी लकड़हारे इस वृक्ष को प्रतिपल काटते रहते हैं | ऐसे में मनुष्य को उस पक्षी की तरह व्यवहार करना चाहिए जो वृक्ष कटने के पहले ही अपने घोंसले का त्याग करके उड़ जाता है ! मनुष्य को भी मृत्यु के पूर्व ही अपने कर्मों के माध्यम से यह शरीर रूपी वृक्ष का त्याग करते उड़ जाना (मोक्ष प्राप्त कर लेना) चाहिए | ऐसा वही मनुष्य कर पाता है जो यह जान गया है कि हमें जितनी भी सांसें परमात्मा से मिली हैं वह प्रतिपल कम ही होती जा रही हैं | परंतु इस पावन दुर्लभ शरीर को आज के लोग सिर्फ व्यवस्थित करने में ही व्यस्त दिखाई पड़ते हैं | अपने कल्याणकारक तीनों योगों को लगभग भूल चुके मनुष्य का कल्याण भी उसी प्रकार हो रहा है |* *इन तीनों योगों में से एक को ही अपनाने का प्रयाय करते हुए इस परम दुर्लभ मानव शरीर को कल्याणमय बनाने का प्रयास प्रत्येक मानव को करना ही चाहिए |*

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