त्रिगुणात्मक सृष्टि :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

28 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (57 बार पढ़ा जा चुका है)

त्रिगुणात्मक सृष्टि :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सृष्टि के जनक जिन्हे ईश्वर या परब्रह्म कहा जाता है वे सृष्टि में घट रही घटनाओं का श्रेय स्वयं न लेकरके किसी न किसी को माध्यम बनाते रहते हैं | परमपिता परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना में पंचतत्वों की महत्वपूर्ण भूमिका बनायी और साथ ही इस सृष्टि में तीन गुणों (सत्व , रज एवं तम) को प्रकट किया और सकल सृष्टि को त्रिगुणात्मक बना दिया | इस सकल सृष्टि में कोई भी तत्व ऐसा नहीं है जो इन त्रिगुण तत्वों से परे हो | श्रीमद्भगवद्गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण "अर्जुन" को उपदेश देते हुए बताते हैं कि हे पार्थ :- "मनुष्य जन्म से ही इन तीनों गुणों से प्रभावित होता है क्योंति यह सृष्टि ही "त्रिगुणात्मक है | ये तीनों गुण समस्त प्राणियों में विद्यमान रहते हैं | जिस प्राणी में जिस गुण की प्रधानता हो जाती है उसका चरित्र उसी प्रकार का हो जाता है" | भगवान के इन वाक्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि कोई भी इन तीनों गुणों से बच नहीं पाया है | मनुष्य को सदैव अपने तमोगुण (तामसी प्रवृत्ति) का हनन करके रजोगुण (राजसी प्रवृत्ति) को अपनाकर अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करते हुए सतोगुण (सात्त्विक प्रवृत्ति) को जीवन भर के अपना लेना चाहिए | इसका दिव्य उदाहरण हमें भगवान श्री राम के जीवन चरित्र से प्राप्त होता है | विश्वामित्र जी के साथ यज्ञरक्षा करने प्रभु श्री राम को सर्वप्रथम तमोगुणी ताड़का मिलती है जिसका वध उन्होंने अविलम्ब कर दिया ! उसके बाद गौतम ऋषि के आश्रम में रजोगुणी अहिल्या को अपनी शरण में लिया ! जब तमोगुण का हनन करके रजोगुण को शरण देते हुए आगे चलते हैं तब उन्हें सतोगुणी महारानी श्री सीता जी प्राप्त होती हैं जिन्हें उन्होंने जीवन भर के लिए अपना लिया | सतोगुण (सीता जी) के ही कारण उनका यश त्रिभुवन त्रिकाल में अक्षुण्ण बना |* *आज भी ये तीनों गुण सृष्टि में विद्यमान हैं परंतु अब बड़ी कठिनता से सतोगुण के दर्शन प्राप्त होते हैं | तामसी प्रवृत्ति जो कि आलस्य , प्रमाद , क्रोध एवं नकारात्मकता प्रतट करती है आज यह अधिकाधिक देखने को मिल रही है | वहीं राजसी प्रवृत्ति की कामना में अधिक से अधिक सुख , ऐश्वर्य एवं अधिकाधिक धन प्राप्त करने के उद्योग में ही मनुष्य रत दिखाई पड़ रहा है जबकि सतोगुण की न्यूनता चिंता का विषय कही जा सकती है | कुछ लोग प्राय: कहा करते हैं कि :- "मनुष्य जीवन में कहीं ये तीनों गुण दिखाई ही नहीं पड़ते" | ऐसे लोगों को मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" मानव जीवन में ही इन तीनों गुणों का दर्शन कराने का किंचित प्रयास कर रहा हूँ | जब मनुष्य का जन्म होता है तो लोग उसे अपना नयनतारा , राजकुमार एवं राजा बेटा की उपाधि देते रहते हैं उस समय वह रजोगुण से भरा रहता है | जब मनुष्य युवावस्था में प्रवेश करता है तो संगति / कुसंगति में पड़कर नकारात्मक होकर कर्म / कुकर्म करने को भी आतुर हो जाता तब उसमें तमोगुण प्रभावी होते हैं | जीवन भर दुर्दान्त बनकर तमोगुण से घिरकर जीवन यापन करने वालों का अन्तत: जब इस जीवन के परम सत्य (वृद्धावस्था) से सामना होता है तो वह सम्पूर्ण जीवन के कर्म / कुकर्म त्यागकर सतोगुणी बनने का प्रयास करता देखा जा सकता है | कहते हैं कि वृद्ध होने पर बक (बगुला) भी भगत बनने का प्रयास करता है | इस प्रकार मनुष्य के जीवनकाल में तीनों ही गुण विद्यमान हैं जिसकी जो इच्छा हो अपना सकता है |* *प्रत्येक मनुष्य को तीनों गुण (सत रज तम ) में से तमोगुण का हनन करके रजोगुण का कुछ अंश लेकर सतोगुण अपनाना चाहिए |*

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