हितैषियों की पहचान :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

28 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (59 बार पढ़ा जा चुका है)

हितैषियों की पहचान :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव समाज में एक दूसरे के ऊपर दोषारोपण करने का कृत्य होता रहा है | जबकि हमारे आर्ष ग्रंथों में स्थान - स्थान पर इससे बचने का निर्देश देते हुए लिखा भी है :- "परछिद्रेण विनश्यति" अर्थात दूसरों के दोष देखने वाले का विनाश हो जाता है अर्थात अस्तित्व समाप्त हो जाता है | इसी से मिलता एक शब्द है "निंदा" | परंतु दोष निकालने एवं निंदा करने में भिन्नता है | दोष निकालना अहितकारी है परंतु आखिर दोष निकालना किसे कहा जा सकता है ?? किसी की कमियों को बताना ही दोष निकालने की परिभाषा मानी गयी है | परंतु यही कार्य जब आपके माता - पिता , गुरुजन व परिजन के द्वारा किया जाता है तो उसे दोष निकालना नहीं कहा जा सकता | जब माता - पिता अपने बच्चों में या गुरुजन अपने शिष्यों में किसी ऐसे दोष का अवलोकन करते हैं जो कि उनके भविष्य के उचित नहीं कहा जा सकता तो वे बच्चे से उसका दोष बताकर सुधार करने को कहते हैं ! जब बच्चा वह गल्ती न सुधारकर उसी मार्ग का अनुगामी होने लगता है तो बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए उसे दण्डित भी करने का कार्य माता - पिता व गुरुजनों के द्वारा किया जाता रहा है | अपने बच्चे को कोई भी दण्ड नहीं देना चाहता परंतु यदि दण्ड देने से सुधार होने की आशा हो तो यह कार्य भी किया जाता है | क्या माता - पिता के इस कार्य को दोष निकालने या निंदा करने की श्रेणी में रखा जा सकता है ?? शायद नहीं | प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक ही नीति नहीं हो सकती |* *आज जहाँ सभ्यताएं बदली , समाज बदल गए , वहीं समाज के नियम एवं सूक्तियां भी बदल कर रह गयी हैं | आज यदि किसी को उसकी कमी बताकर सावधाव करने का प्रयास करो तो वह उस कमी में सुधार न करके आपको ही अहंकारी एवं परदोष दर्शक सिद्ध करने पर उतारू हो जाता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के समाज एवं नई पीढी की मानसिकता को देखते हुए यह कहने पर विवश हो रहा हूँ कि आज जब एक पिता या गुरु अपने पुत्र से कहता है कि बेटा यह तुम्हारी कमी आने वाले भविष्य के लिए घातक हो सकती है इसमें सुधार करो ! तो वह बालक अपने ही जन्मदाता पिता से रुष्ट होकर अनाप शनाप बकने लगता है | और ज्यादा कुछ कह देने पर अपना रास्ता ही अलग कर लेता है | विचार कीजिए कि क्या ऐसा करना उचित है | जो लोग यह कहते हैं कि सिर्फ दूसरों का दोष देखने की आदत क्या उसने कभी यह विचार करने का प्रयास किया कि जिस माता पिता या जिस गुरु ने इतने प्रेम से पालन - पोषण किया , शिक्षा दिया क्या वह आपको दोषपूर्ण देखना पसंद करेगा | आज के समाज की मानसिकता को देखते हुए यह समझ जाना चाहिए कि यदि कोई आपके दोषों को आपसे बता रहा है तो वह आपका हितैषी ही होगा अन्यथा तो आज लोग आपके दोषों पर पर्दा डालते हुए आपकी सराहना करते रहेंगे , क्योंकि ऐसे लोग आपकी उन्नति नहीं कर देख सकते | दोष बताने को निंदा करना बताने वाले यदि समय पर नहीं सम्हल पाते हैं तो आपके आस - पास के चाटुकार आपको पतनोन्मुखी करके ही मानेंगे |* *यदि आपका कोई अपना आपको गलत कह रहा है तो उस पर विचार करना चाहिए कि मुझे प्रेम से पालने वाले यदि आज हमें गलत कह रहे हैं तो कोई कारण अवश्य होगा | बात विचार करने की है |*

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