व्याकुल पथिकः

29 सितम्बर 2018   |  Shashi Gupta   (50 बार पढ़ा जा चुका है)

आपके कर्मों की ज्योति अब राह हमें दिखलायेगी

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कुछ यादें कुछ बातें, जिनकी पाठशाला में मैं बना पत्रकार

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एक श्रद्धांजलि श्रद्धेय राजीव अरोड़ा जी को


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किया था वादा आपने कभी हार न मानेंगे ,

बनके अर्जुन जीवन रण में जीतेंगे हार न मानेंगे,

जीवन-मरण के खेल में नियति के हाथों हार गये,

चढ़ा प्रत्यंचा गाड़ीव में,क्यूँ अंत समय में हार गरे,

आपके कर्मों की ज्योति अब राह हमें दिखलायेगी,

यादें मचलेंगी आँखों में अधरों पे मुस्कान खिलायेगी।


देर शाम कमरे पर काढ़ा तैयार कर था , तभी अचानक अपने गांडीव कार्यालय, वाराणसी से फोन आता है कि भैया जी नहीं रहें। मैंने स्तब्ध सा रह गया, सो पलट कर पूछा कि अरे कब ! वैसे तो हम सभी को पता था कि इस अप्रिय संदेश का एक दिन आना तय है, परंतु इतनी शीघ्रता भी क्या थी... भले ही गंभीर रुप से अस्वस्थ रहें वे, फिर भी हम सभी के लिये वटवृक्ष थें। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डा० भगवान दास अरोड़ा जिनकी त्याग एवं तपस्या से गांडीव के रुप में जो निर्भीक सांध्यकालीन समाचार पत्र काशी के वासिंदों की आवाज बन गया था , उनके सुपुत्र राजीव अरोड़ा जी ने उसका और भी विस्तार कर उसे बनारस वासिंदों की धड़कन बना दिया था। पाठकों की कैसी भी खबर हो , प्रेस विज्ञप्ति, जनसमस्या, शोक समाचार, मांगलिक समाचार, कविताएं और लेख सभी को गांडीव में सम्मान मिलता था। उन्होंने गांडीव का उदारवादी चेहरा पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया था। यही नहीं पाठक मंच के लिये भी एक बड़ा कालम होता था अपने अखबार में। सो, यदि किसी ने गांडीव कार्यालय पर अपनी विज्ञप्ति दी है, तो उसे इतना विश्वास रहता था कि उसका समाचार निश्चित प्रकाशित होगा।

अब यदि अपनी बात कहूँ तो आज पत्रकार के रुप में मेरा जो सम्मान, पहचान है, जो इस आजीविका से कहींं अधिक मूल्यवान है मेरे लिये, यह सब उन्हीं का तो दिया है। हमारे समाचार पत्र सांध्य दैनिक गांडीव के निवर्तमान सम्पादक राजीव अरोड़ा जी को हम सभी भैया जी ही कहते थें। जिनका गत शनिवार की शाम निधन हो गया है । वे काफी दिनों से गंभीर रुप से अस्वस्थ रहें। फिर भी जब वे विगत वर्षों यहाँ मीरजापुर आये थें और होटल राही इन में ठहरे थें, तो वापस लौटते समय हम सभी से कह गये थें , "इतनी जल्दी जाने वाला मैं नहीं हूँ। हाँ , स्वास्थ्य ठीक न होने से कार्यालय नहीं जा पा रहा हूँ। " इसके बाद भैया जी से आखिरी मुलाकात उनके घर पर ही हुई थी। मेरे दस्तक पर दरवाजा भी उन्होंने ही खोला था। न्यायालय के एक मामले में उनका मेडिकल रिपोर्ट लेने के लिये मैं गया था तब। मुझे देखते ही उन्होंने हाल समाचार पूछा , फिर कहा कुछ जलपान। जब मैंने ना में सिर हिला दिया , तो कहा कि अच्छा यह सत्तू पी कर जाइए । मुझे याद है मैं जब भी बनारस जाता था। कार्यालय में मुझ पर नजर पड़ते ही उनका पहला सवाल रहता था कि जलपान किया है कि नहीं ? वे हम सभी को " आप "कह कर ही सम्बोधित करते थें। किसी भी खबर पर मुझे डांट पड़ी हो या मेरा समाचार रोक दिया हो उन्होंने, मुझे याद नहीं है। एक बार यहां के एक विधानसभा क्षेत्र से एक प्रभावशाली मंत्री चुनाव लड़ रहे थें। मतदाताओं में साड़ियाँ बांटते हुये उनके चुनाव प्रचार वाहन को पकड़ लिया गया। फिर क्या था माननीय के सिपहसालारों ने मीडिया मैनेजमेंट शुरू कर दिया। मेरी खबर भी रोकने की जानकारी मुझे मिल गयी, तो उदास मन से मैंने सीधे सम्पादक जी को अपना वह समाचार दिया और सारी बातें बता दी। फिर क्या था, प्रबंध सम्पादक / उप सम्पादक तक को भनक नहीं लगी और सायं प्रथम पृष्ठ पर खबर लग ही गयी। उस शाम मुझे अपने अखबार पर एवं अपने सम्पादक जी पर कितना गर्व महसूस हुआ था, पूछे ही मत। आप समझ सकते हैं, इससे कि उन्हें जुगाड़ तंत्र की राजनीति समाचार के क्षेत्र में बिल्कुल भी पसंद न थी। सफेद पायजामा- कुर्ता और खादी का झोला, इस वेशभूषा में प्रेस के स्वामी कम बिल्कुल खाटी पत्रकार दिखते थें वे। समाचार डेस्क पर सभी के पास वे जाते थें, साथ ही पूछते रहते थें कि कुछ लिख रहे हैं क्या विशेष। मेरी खबरें भी उन्हें पसंद थी, बस इतना कहते थें कि थोड़ा और पढ़ लिया करें, ताकि अशुद्धियाँ न हो। परंतु पत्रकार होकर भी मेरे पास पढ़ने का समय था ही कहाँ। समाचार संकलन, उसे लिखना, बंडल लेने जाना और फिर वितरण भी, सुबह 6 से रात 10 बजे तक घड़ी की सुई के संग- संग चलना ही मेरी नियति हो गई थी। फिर भी ऐसा भी नहीं है कि मैं समाचार के मामले में बैकफुट पर कभी था। उस दौर में बेखौफ लिखता था मैं , तभी तो शशि और गांडीव एक दूसरे के पर्याय हैं, ऐसा भी पाठक यहाँ कहने लगे थें।

पैसा, ताकत और जुगाड़ के बल पर मेरा समाचार कोई कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो भैया जी से कह कर दबवा तो नहीं ही सकता था, इतना मुझे विश्वास था। हालांकि मैं पुलिस और प्रशासन के विरुद्ध जब अधिक मुखर हो जाता था, तो वे कुछ चिन्तित भी हो जाते थें कि लड़का मीरजापुर में अकेले रहता है। सो, मेरे पास किसी सहयोग से अप्रत्यक्ष संदेश भेजा करते थें। फिर भी मैंने तब तक दब कर नहीं लिखा, जब तक अपनों के ही षड़यंत्र का शिकार नहीं हुआ।

वाराणसी स्थित अपने घर से गांडीव कार्यालय और वहाँ से मीरजापुर आ कर पत्रकारिता करने की मेरी दास्तान पेट की आग और सम्मान से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1994 की बात है। जब मैं दुबारा कलिम्पोंग से लौट कर वाराणसी आया, तो मेरी पहली प्राथमिकता रही दो जून की रोटी , क्यों कि कहींं नौकरी मुझे जमी नहीं। दादी भी न थी कि भोजन के लिये कुछ व्यवस्था कर देती। ऐसे में गांडीव परिवार का मैं सदस्य बना। मुझे एक बिल्कुल अंजान शहर मीरजापुर की जिम्मेदारी दी गयी। साफ शब्दों में बताया गया था कि बनारस से सायं अखबार को मीरजापुर ले जाना, उसका वितरण, समाचार संकलन एवं लेखन , यह चारों ही कार्य तुम्हें स्वयं करना है। अपने निठल्लेपन के कलंक को धोने की चाह में मेरा एक पांव बनारस तो दूसरा मीरजापुर में होता था। मेरे लिये समाचार लेखन एक बड़ी समस्या थी उन दिनों। इसके लिये मेरे पास न कोई डिग्री थी, न ही प्रशिक्षण । फिर भी इतना प्रेस में भी सभी जानते थें कि मैं नकलची सम्वाददाता नहीं हूँ।अतः सम्पादक जी को मुझ पर विश्वास था और मुझे जब पत्रकारिता का ककहरा भी नहीं आता था, तभी से भैया जी के स्नेह से मेरी बाइलाइन खबर गांडीव के प्रथम पृष्ठ पर लगने लगी थी। यहां मीरजापुर में जब बड़े समाचार पत्रों के क्षेत्रीय कार्यालय खुलने लगे थें, तो मेरे समक्ष भी उनसे जुड़ने का प्रस्ताव आता रहा , फिर भी गांडीव छोड़ कर मैं कहीं नहीं गया और जाता भी कैसे , भूख, बेगारी, बदहाली, बेरोजगारी और उससे भी अधिक अपनों के परायेपन के दर्द से मुझे इसी समाचार पत्र के चौखट पर मुक्ति जो मिली है। हाँ, लम्बी बीमारी से अब मेरा भी शरीर थक चुका है। अतः यहीं से मैं भी पत्रकारिता जगत से अपनी विदाई चाहता हूँ, कुछ यूँ हंसते,मुस्कुराते और गुनगुनाते हुये-


"रोते रोते ज़माने में आये मगर

हँसते हँसते ज़माने से जायेँगे हम ..."


यह इसलिये की थोड़ी बहुत तो मैंने भी अपनी पहचान बना ही ली है, इस अनजाने शहर में पत्रकारिता की डगर पर । यह सम्मान मुझे अपने पूर्व सम्पादक जी के सानिध्य में ही प्राप्त हुआ है। - शशि


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