छल - कपट :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

01 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (211 बार पढ़ा जा चुका है)

छल   - कपट :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य इस पृथ्वी पर इकलौता प्राणी है जिसमें अन्य प्राणियों की अपेक्षा सोंचने - समझने के लिए विवेकरूपी एक अतिरिक्त गुण ईश्वर ने प्रदान किया है | अपने विवेक से ही मनुष्य निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर होता रहा है | मनुष्य को कब क्या करना चाहिये इसका निर्णय विवेक ही करता है | अपने विवेक का प्रयोग जिसने सकारात्मकता से किया वह समाज में अच्छे कार्य करता हुआ पूज्यनीय हुआ , और जिसका विवेक नकारात्मक हो गया उसे उपेक्षा ही प्राप्त होती रही है | नकारात्मकता को अपनाते हुए जिसने छल - कपट को अपना हथियार बनाने का प्रयास किया उसकी दुर्गति क्या हुई है यह बताने की आवश्यकता नहीं है | इसके अनेकों उदाहरण ग्रंथों में पढने को मिलते हैं | मनुष्य संसार में तो उपेक्षित होता ही है मृत्यु के बाद भी उसकी दुर्गति ही होती है | भगवान स्वयं कहते हैं :-- "निर्मल मन जन सो मोंहिं पावा ! मोंहिं कपट छल छिद्र न भावा !!" कहने का तात्पर्य यह है कि कपटी के द्वारा की गयी पूजा - अर्चना ईश्वर भी नहीं स्वीकारते हैं | आश्चर्य तो तब होता है जब जब रावण जैसा प्रकाण्ड विद्वान भी सीताहरण के लिए छल - कपट का सहारा लेता है , यदि उसके द्वारा ऐसा कृत्य किया गया तो उसका परिणाम क्या हुआ यह भी सभी जानते हैं | यद्यपि छिद्रान्वेषण , छल एवं कपट का त्याग करके ही समाज में सम्मानित हुआ जा सकता परंतु कुछ लोग इसे ही सीढी बनाकर सफलता अर्जित करना चाहते हैं | जिसका फल अन्ततोगत्वा दुखदायी ही होता है |* *आज मनुष्य की मानसिकता पहले की अपेक्षा क्या एवं कैसी होती जा रही है यह देखकर दुख होता है | आज समाज में नकारात्मक लोगों की संख्या बढती जा रही है | झूठ , छल , कपट एवं छिद्रान्वेषण ने अपना विस्तृत प्रभाव लगभग सभी के ऊपर डाल रखा है | आज छल एवं कपट का इतना बोलबाला हो गया है कि नित्य समाचारपत्रों एवं संचार माध्यम से इसके समाचैर मिलते रहते हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" समाज की वर्तमान दिशा एवं दशा देखकर विचार करता हूँ कि आखिर हम एवं हमारा समाज किस दिशा में अग्रसर होता जा रहा है | आज मित्र अपने मित्र से कपट करके सारी सम्पत्ति हथिया रहा है | संसार का सबसे पवित्र बंधन पति पत्नी का माना जाता है परंतु यह भी आज इस दुर्गुण से अछूता नहीं रह गया है | प्राय: देखने को मिल रहा है कि पत्नी ने पति की या पति ने पत्नी की छलपूर्वक हत्या करवा दी | शिष्य भी अपने गुरु से छल करने में पीछे नहीं हटते | और तो और आज के पुत्र भी अपने जन्मदाता माता - पिता से कपट करके छलपूर्वक उनका सबकुछ हथियाना चाहते हैं | जबकि पिता का सबकुछ पुत्र का ही है परंतु पिता के जीते जी ही वे मालिक बन जाने की लालसा में ऐसा निकृष्ट कृत्य कर डालते हैं | हमारे साहित्यों एवं सनातन संस्कृति में भाई को भाई की भुजा होने का गौरव प्राप्त है , परंतु आज ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जायेंगे जहाँ मनुष्य छल करके अपनी भुजायें स्वयं काट रहा है | उपरोक्त तथ्य सब पर तो नहीं प्रभावी कहे जा सकते है परंतु अधिकतर आज यही हो रहा है | पूजा - पाठ तीर्थयात्रा तो बड़े प्रेम से की जाती है परंतु मन से छल एवं कपट को दूर नहीं कर पा रहे मनुष्य की दुर्गति होना निश्चित है और ऐसे लोगों की दुर्गति हो भी रही है |* *आज के युग में मन से छल कपट का पूर्णतय: हट पाना शायद सम्भव न हो परंतु दृढ इच्छाशक्ति से असम्भवसकुछ भी नहीं है |*

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