ईश्वर , गुरु एवं आत्मा एक ही हैं :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

01 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (87 बार पढ़ा जा चुका है)

ईश्वर   , गुरु एवं आत्मा एक ही हैं :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सृष्टि का सृजन करके हमेम इस धरा धाम पर भेजने वाली उस परमसत्ता को ईश्वर कहा जाता है | ईश्वर के बिना इस सृष्टि की परिकल्पना करना ही व्यर्थ है | कहा भी जाता है कि मनुष्य के करने से कुछ नहीं होता जो कुछ करता है ईश्वर ही करता है | वह ईश्वर जो सर्वव्यापी है और हमारे पल पल के कर्मों का हिसाब रखता है | "एको$हम् बहुस्याम:" के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए इस सृष्टि में ईश्वर ही आत्मा रूप में सभी जीवो में विद्यमान रहता है | बाबा जी मानस में लिखते हैं :-- "ईश्वर अंश जीव अविनासी" इसका मतलब यह हुआ कि ईश्वर एवं जीवो में रहने वाली आत्मा दोनों एक ही हैं परंतु जीवस्थित आत्मा उस परम परमात्मा के स्वरूप को कैसे जान पाए , इसके लिए परमात्मा ने एक दूसरा स्वरूप धारण किया जिसे सद्गुरु की संज्ञा दी गई | सद्गुरु ही वह प्राणी है जो आत्मा को परमात्मा से साक्षात्कार कराने का कार्य करता है | यह भी कहा जा सकता है ईश्वर , आत्मा एवं गुरु तीनों एक ही शक्ति है जो अलग अलग बंट करके अपने कार्य को निष्पादित कर रहे हैं | विचार कीजिएगा कि यदि वह ईश्वर सद्गुरु के वेश में हमको ना प्राप्त हो तो हम उस ईश्वर के विषय में उसके अंश होने के बाद भी कुछ भी नहीं जान सकते हैं | मानव जीवन में सद्गुरु का बहुत बड़ा महत्व है | यद्यपि आत्मा परमात्मा का ही अंश या यह भी कहा जा सकता है कि हर आत्मा ही परमात्मा है , लेकिन परमात्मा को जानने के लिए आत्मा को सद्गुरु का आश्रय लेना ही पड़ता है क्योंकि सद्गुरु ईश्वर का ही दूसरा रूप होता है | जो इन तीनों के रहस्य को जान जाते हैं वहीं महापुरुषों की श्रेणी में सुशोभित होकर लोक कल्याण के लिए सद्ज्ञान प्रसारित करते रहते हैं |* *आज का मनुष्य इतना ज्यादा व्यस्त होता जा रहा है कि उसे न तो ईश्वर को जानने का समय और ना ही अपनी आत्मा को पहचानने का | प्रायः यह भी सुनने को मिला करता है कि अमुक व्यक्ति की आत्मा तो मर चुकी है | विचार कीजिए कि हम कहां से कहां आ गए ?? जब हम स्वयं को पैदा करने वाले ईश्वर एवं स्वयं की आत्मा को जान पाने के लिए प्रयास नहीं कर पा रहे हैं तो फिर सद्गुरु को जानने का उद्योग भला कैसे हो सकता है | आज सद्गुरु के पास शिष्य जाता भी है तो मात्र अपने स्वार्थ बस और वहां तब तक ही रहता है जब तक उसका स्वार्थ सिद्ध नहीं हो जाता है | शिष्यों का उद्देश्य लौकिक ज्ञान प्राप्त करने का होता है | पारलौकिक ज्ञान कोई प्राप्त ही नहीं करना चाहते | गुरु - शिष्य परंपरा लगभग समाप्ति की ओर अग्रसर है | ईश्वर, आत्मा और गुरु यह तीनों एक ही है यह बताने वाला यदि कोई मिल भी जाता है तो इसको जानने की पात्रता रखने वाला भूले से भी नहीं मिलना चाहता | परंतु मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के इस आधुनिक युग में भी देख रहा हूं कि अभी भी अनेकों महापुरुष ऐसे मिल जाएंगे जो इन दिव्य रहस्यों को जानने का प्रयास करते रहते हैं | परंतु यह भी सत्य है कि वे आज की आधुनिकता की चकाचौंध से दूर एकांत में अपने गुरु का आश्रय लेकर के आत्मा और परमात्मा को जानने के लिए प्रयास कर रहे हैं | यदि ईश्वर का दर्शन करना है तो सर्वप्रथम अपनी आत्मा में किया जाए , आत्मा में दर्शन ना मिल पाए तो आत्मा में ईश्वर का दर्शन करने का विधान जानने के लिए हमें सद्गुरु की शरण में जाना पड़ेगा क्योंकि सद्गुरु ईश्वर का दूसरा रुप होता है | बिना सद्गुरु के बताए मार्गों का अनुसरण किए हम ईश्वर के विषय में कुछ भी नहीं जान सकते , और न यह जान सकते हैं कि ईश्वर क्या है आत्मा क्या है और उस सतगुरु का स्थान जीवन में क्या है |* *यदि अपने जीवन काल में ईश्वर का दर्शन करने की इच्छा है तो सर्वप्रथम स्वयं को पहचानते हुए सतगुरु की शरण में जाकर ही यह अवसर प्राप्त हो सकता है |*

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