विकृत होती संस्कृति :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

02 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (44 बार पढ़ा जा चुका है)

विकृत होती संस्कृति :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*पुरातन काल से भारतीय संस्कृति अपने आप में अनूठी रही है | भारत से लेकर संपूर्ण विश्व के कोने-कोने तक भारतीय संस्कृति एवं संस्कार ने अपना प्रभाव छोड़ा है , और इसे विस्तारित करने में हमारे महापुरुषों ने , और हमारे देश के राजाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था | किसी भी समस्या के निदान के लिए या किसी नवीन जानकारी के लिए संपूर्ण विश्व भारत की ओर देखता था , इसीलिए भारत को विश्वगुरु की उपाधि मिली थी | किसी भी संस्कृति को पालन करने का कार्य यदि प्रजा करती है तो उसे पालन करवाने का कर्तव्य राजा का होता है | जिस देश में राजा बिलासी हो जाता है उस देश के प्रजा निरंकुश हो जाती है , और फिर देश की मान्यताओं को छोड़कर के वह मनमाने व्यवहार करने लगती है | महान देश भारत ने सदैव देने का कार्य किया है ! हम सदैव दाता बनकरके विश्व पटल पर छाए रहे हैं | संपूर्ण विश्व में घूम घूम कर हमारे ऋषि - महर्षियों ने भारतीय संस्कृति एवं संस्कार का प्रचार प्रसार किया था , जिसके परिणामस्वरूप हमारा देश भारत महान से महानतम की श्रेणी में गिना जाता था | अनेर ऐसे देश जिनका कि प्राचीन काल में कोई अस्तित्व ही नहीं था उनकी सभ्यताएं भी भारतीय संस्कार एवं संस्कृति से शिक्षा लेकर के ही विकसित हुईं | अनेक प्रसंग ऐसे पढ़ने को मिलते हैं जहां भारतीय दर्शन शास्त्रों ने अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किए हैं | मर्यादा का पालन कैसे किया जाता है ? परिवार कैसे चलाए जाते हैं ? यदि यह जानना हो तो कोई भी हमारे प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कर सकता है ! यह हमारी संस्कृति थी ! यही भारत की महानता थी !! परंतु विचार कीजिए अब हम कहां खड़े हैं ?? |* *आज भारत की संस्कृति अपने संक्रमण काल से गुजर रही है | इसका एक कारण यह है कि हम कुछ भी नया जानने के लिए विदेशों की ओर आशा भरी निगाहों से देखते हैं | जबकि प्राचीन काल में अन्य देशों ने यही कार्य हमारे प्रति किया था | आज हम अपनी संस्कृति को अपने संस्कार को किनारे करके पाश्चात्य संस्कृति को स्वयं के जीवन में उतारने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं , जिसके कारण आज भारतीय संस्कृति एवं संस्कार विकृत होते जा रहे हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह देख रहा हूं कि आज यदि भारतीय जनमानस पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने के लिए आतुर दिख रहा है तो भारतीय शासक को भी उसी प्रभाव से प्रभावित दिखाई पड़ रहे हैं | आजकल हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय ऐसे ऐसे नियम बनाकर प्रस्तुत कर रहा है जिससे हमारे देश की संस्कृति एवं संस्कार का पतन निश्चित है | मर्यादा को तार - तार करने वाले नये विधान (समलैंगिकता एवं विवाहेतर संबंध ) हमारी संस्कृति के लिए घातक ही हैं | हमारे संस्कारों को नष्ट करने के लिए एक अचूक हथियार तैयार हो गया | जिसे समाज ने कभी मान्यता नहीं दी थी आज वही नियम एक नए संस्कार के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत है | विचार कीजिए आखिर किधर जा रहे हैं ? क्या यही हमारे संस्कार थे ?;हम आज दाता की जगह याचक की भूमिका में खड़े दिखाई पड़ते हैं | जिस भारत देश ने सदैव विश्व के दूसरे राष्ट्रों को एक नवीन ज्ञान प्रस्तुत किया था आज वही भारत दूसरों की संस्कृति को अपनाने के लिए आतुर दिख रहा है जो कि आने वाले भविष्य के लिए घातक ही हो सकता है |* *नये समाज में नई मान्यताओं को मानना कोई बुरा नहीं , परंतु अपनी मान्यताओं को भुलाकर के अन्य सभ्यताओं को अपनाना भी उचित नहीं कहा जा सकता | विचार कीजिएगा |*

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