विकृत होती संस्कृति :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

02 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (87 बार पढ़ा जा चुका है)

विकृत होती संस्कृति :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*पुरातन काल से भारतीय संस्कृति अपने आप में अनूठी रही है | भारत से लेकर संपूर्ण विश्व के कोने-कोने तक भारतीय संस्कृति एवं संस्कार ने अपना प्रभाव छोड़ा है , और इसे विस्तारित करने में हमारे महापुरुषों ने , और हमारे देश के राजाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था | किसी भी समस्या के निदान के लिए या किसी नवीन जानकारी के लिए संपूर्ण विश्व भारत की ओर देखता था , इसीलिए भारत को विश्वगुरु की उपाधि मिली थी | किसी भी संस्कृति को पालन करने का कार्य यदि प्रजा करती है तो उसे पालन करवाने का कर्तव्य राजा का होता है | जिस देश में राजा बिलासी हो जाता है उस देश के प्रजा निरंकुश हो जाती है , और फिर देश की मान्यताओं को छोड़कर के वह मनमाने व्यवहार करने लगती है | महान देश भारत ने सदैव देने का कार्य किया है ! हम सदैव दाता बनकरके विश्व पटल पर छाए रहे हैं | संपूर्ण विश्व में घूम घूम कर हमारे ऋषि - महर्षियों ने भारतीय संस्कृति एवं संस्कार का प्रचार प्रसार किया था , जिसके परिणामस्वरूप हमारा देश भारत महान से महानतम की श्रेणी में गिना जाता था | अनेर ऐसे देश जिनका कि प्राचीन काल में कोई अस्तित्व ही नहीं था उनकी सभ्यताएं भी भारतीय संस्कार एवं संस्कृति से शिक्षा लेकर के ही विकसित हुईं | अनेक प्रसंग ऐसे पढ़ने को मिलते हैं जहां भारतीय दर्शन शास्त्रों ने अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किए हैं | मर्यादा का पालन कैसे किया जाता है ? परिवार कैसे चलाए जाते हैं ? यदि यह जानना हो तो कोई भी हमारे प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कर सकता है ! यह हमारी संस्कृति थी ! यही भारत की महानता थी !! परंतु विचार कीजिए अब हम कहां खड़े हैं ?? |* *आज भारत की संस्कृति अपने संक्रमण काल से गुजर रही है | इसका एक कारण यह है कि हम कुछ भी नया जानने के लिए विदेशों की ओर आशा भरी निगाहों से देखते हैं | जबकि प्राचीन काल में अन्य देशों ने यही कार्य हमारे प्रति किया था | आज हम अपनी संस्कृति को अपने संस्कार को किनारे करके पाश्चात्य संस्कृति को स्वयं के जीवन में उतारने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं , जिसके कारण आज भारतीय संस्कृति एवं संस्कार विकृत होते जा रहे हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह देख रहा हूं कि आज यदि भारतीय जनमानस पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने के लिए आतुर दिख रहा है तो भारतीय शासक को भी उसी प्रभाव से प्रभावित दिखाई पड़ रहे हैं | आजकल हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय ऐसे ऐसे नियम बनाकर प्रस्तुत कर रहा है जिससे हमारे देश की संस्कृति एवं संस्कार का पतन निश्चित है | मर्यादा को तार - तार करने वाले नये विधान (समलैंगिकता एवं विवाहेतर संबंध ) हमारी संस्कृति के लिए घातक ही हैं | हमारे संस्कारों को नष्ट करने के लिए एक अचूक हथियार तैयार हो गया | जिसे समाज ने कभी मान्यता नहीं दी थी आज वही नियम एक नए संस्कार के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत है | विचार कीजिए आखिर किधर जा रहे हैं ? क्या यही हमारे संस्कार थे ?;हम आज दाता की जगह याचक की भूमिका में खड़े दिखाई पड़ते हैं | जिस भारत देश ने सदैव विश्व के दूसरे राष्ट्रों को एक नवीन ज्ञान प्रस्तुत किया था आज वही भारत दूसरों की संस्कृति को अपनाने के लिए आतुर दिख रहा है जो कि आने वाले भविष्य के लिए घातक ही हो सकता है |* *नये समाज में नई मान्यताओं को मानना कोई बुरा नहीं , परंतु अपनी मान्यताओं को भुलाकर के अन्य सभ्यताओं को अपनाना भी उचित नहीं कहा जा सकता | विचार कीजिएगा |*

अगला लेख: जीवन का रहस्य --- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
21 सितम्बर 2018
*नारी का हमारे समाज में क्या स्थान है यह किसी से छिपा नहीं है। मां, बहिन और पत्नी के रूप में सदैव पूज्य रही है। जो आदर जो मान उसे मिला वही किसी से छिपा नहीं है। वह जननी है बड़े-बड़े महापुरुषों की। भगवान महावीर जैसे महापुरुष उसी की कोख से जन्में। हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारे इतिहास नारी की महा
21 सितम्बर 2018
21 सितम्बर 2018
*नारी का हमारे समाज में क्या स्थान है यह किसी से छिपा नहीं है। मां, बहिन और पत्नी के रूप में सदैव पूज्य रही है। जो आदर जो मान उसे मिला वही किसी से छिपा नहीं है। वह जननी है बड़े-बड़े महापुरुषों की। भगवान महावीर जैसे महापुरुष उसी की कोख से जन्में। हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारे इतिहास नारी की महा
21 सितम्बर 2018
07 अक्तूबर 2018
*सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि को गतिमान करने के लिए कई बार सृष्टि की रचना की , परंतु उनकी बनाई सृष्टि गतिमान न हो सकी , क्योंकि उन्होंने प्रारंभ में जब भी सृष्टि की तो सिर्फ पुरुष वर्ग को उत्पन्न किया | जो भी पुरुष हुए उन्होंने सृष्टि में कोई रुचि नहीं दिखाई | अपनी बनाई हुई सृष्टि क
07 अक्तूबर 2018
12 अक्तूबर 2018
*नवरात्र के पावन अवसर पर चल रही नारीगाथा पर आज एक विषय पर सोंचने को विवश हो गया कि नारियों पर हो रहे अत्याचारों के लिए दोषी किसे माना जाय ??? पुरुषवर्ग को या स्वयं नारी को ??? परिणाम यह निकला कि कहीं न कहीं से नारी की दुर्दशा के लिए नारी ही अधिकतर जिम्मेदार है | जब अपने साथ कम दहेज लेकर कोई नववधू सस
12 अक्तूबर 2018
19 सितम्बर 2018
*इस धराधाम पर ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति बनकर आई मनुष्य | मनुष्य की रचना परमात्मा ने इतनी सूक्ष्मता एवं तल्लीनता से की है कि समस्त भूमण्डल पर उसका कोई जोड़ ही नहीं है | सुंदर मुखमंडल , कार्य करने के लिए हाथ , यात्रा करने के लिए पैर , भोजन करने के लिए मुख , देखने के लिए आँखें , सुनने के लिए कान , एवं
19 सितम्बर 2018
27 सितम्बर 2018
*सनातन धर्म के आर्षग्रंथों (गीतादि) में मनुष्य के कल्याण के लिए तीन प्रकार के योगों का वर्णन मिलता है :- ज्ञानयोग , कर्मयोग एवं भक्तियोग | मनुष्य के लिए कल्याणकारक इन तीनों के अतिरिक्त चौथा कोई मार्ग ही नहीं है | प्रत्येक मनुष्य को अपने कल्याण के लिए इन्हीं तीनों में से किसी एक को चुनना ही पड़ेगा |
27 सितम्बर 2018
17 सितम्बर 2018
*अखिल ब्रह्माण्ड में जितने भी जड़ चेतन हैं सबमें कुछ न कुछ रहस्य छुपा हुआ है | इन रहस्यों को जानने का जितना प्रयास पूर्व में हमारे ऋषि - महर्षियों ने किया उससे कहीं अधिक आज के वैज्ञानिक कर रहे हैं , परन्तु अभी तक यह नहीं कहा जा सकता कि सारे रहस्यों से पर्दा उठ पाया हो | इन सभी चराचर जीवों में सबसे
17 सितम्बर 2018
07 अक्तूबर 2018
*इस सकल सृष्टि में हर प्राणी प्रसन्न रहना चाहता है , परंतु प्रसन्नता है कहाँ ???? लोग सामान्यतः अनुभव करते हैं कि धन, शक्ति और प्रसिद्धि प्रसन्नता के मुख्य सूचक हैं | यह सत्य है कि धन, शक्ति और प्रसिद्धि अल्प समय के लिए एक स्तर की संतुष्टि दे सकती है | परन्तु यदि यह कथन पूर्णतयः सत्य था तब वो सभी जि
07 अक्तूबर 2018
20 सितम्बर 2018
*सकल सृष्टि में ईश्वर ने मनुष्य को सभी अधिकार दे रखे हैंं | जैसी इच्छा हो वैसा कार्य करें यह मनुष्य के हाथ में है | इतना सब कुछ देने के बाद भी परमात्मा ने कुछ अधिकार अपने हाथ में ले रखे हैं | कर्मानुसार भोग करना मनुष्य की मजबूरी है | जिसने जैसा कर्म किया है , जिसके भाग्य में जैसा लिखा है वह उसको भोग
20 सितम्बर 2018
24 सितम्बर 2018
*सनातन धर्म में ऐसी मान्यता है कि मनुष्य जन्म लेने के बाद तीन प्रकार के ऋणों का ऋणी हो जाता है | ये तीन प्रकार के ऋण मनुष्य को उतारने ही पड़ते हैं जिन्हें देवऋण , ऋषिऋण एवं पितृऋण के नाम से जाना जाता है | सनातन धर्म की यह महानता रही है कि यदि मनुष्य के लिए कोई विधान बनाया है तो उससे निपटने या मुक्ति
24 सितम्बर 2018
05 अक्तूबर 2018
*इस संसार में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ इसलिए माना गया है क्योंकि मनुष्य में निर्णय लेने की क्षमता के साथ परिवार समाज व राष्ट्र के प्रति एक अपनत्व की भावना से जुड़ा होता है | मनुष्य का व्यक्तित्व उसके आचरण के अनुसार होता है , और मनुष्य का आचरण उसकी भावनाओं से जाना जा सकता है | जिस मनुष्य की जैसी भावना ह
05 अक्तूबर 2018
24 सितम्बर 2018
*संसार में अब तक अनेक विद्वान महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने क्रिया कलापों से संसार का कल्याण करने का ही प्रयास किया है ! उनके चरित्रों का अनुसरण करके मनुष्य स्वयं पूजित होता रहा है | महापुरुषों के बताये गये मार्गों का अनुसरण करके , उनके लिखे ग्रंथों का पठन - पाठन करके ही विद्वान बनते आये महापुरुषो
24 सितम्बर 2018
20 सितम्बर 2018
*संसार में जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित है | अमर इस संसार में कोई नहीं है | जन्म एवं मृत्यु के बीच का जो समय होता है उसे जीवन कहा जाता है | मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में अनेक अनुभव करता रहता है | सुख - दुख , शोक - प्रसन्नता , हानि - लाभ आदि समय समय पर मनुष्य को प्राप्त होते रहते हैं |
20 सितम्बर 2018
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x