जागते रहेंगे और कितनी रात हम..

04 अक्तूबर 2018   |  Shashi Gupta   (66 बार पढ़ा जा चुका है)

जागते रहेंगे और कितनी रात हम..  - शब्द (shabd.in)

जागते रहेंगे और कितनी रात हम ...

************************

सच कहूँ, तो मेरा अब तक का अपना चिन्तन जो रहा है, वह यह है कि पुरुष व्यर्थ में श्रेष्ठ होने के दर्प में जी रहा है ,क्यों कि वह नारी ही जो अपने प्रेम, समर्पण और सानिध्य से उसे सम्पूर्णता देती है। यहाँ उसका सहज कर्म योग है।

******************************



मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूँगा सदा

मेरी आवाज़ को, दर्द के साज़ को, तू सुने ना सुने

मुझे देखकर कह रहे हैं सभी

मोहब्बत का हासिल है दीवानगी

प्यार की राह में, फूल भी थे मगर

मैंने कांटे चुने...


इस खूबसूरत नगमें से अपने नादान दिल को बहलाने की नाकाम कोशिश में बंद कमरे के बाहर की रोशनी का एहसास कर रहा था। अवसाद का घटाटोप कभी- कभी कर्मपथ में रुकावट बन जाता है। यह जीवन है क्या सांप- सीढ़ी का ही तो एक खेल है न, इंसान कभी धरती से आसमां की बढ़ता- मचलता दिखता है, तो कभी कटी पंतग बन कर रह जाता है।

कुछ जीवित्पुत्रिका पर्व सोच रहा था, अपने बचपन की मधुर स्मृतियों को , हम दोनों भाइयों का आज के दिन रंग था। किसी की डांट नहींं पड़ती थी। मेरी निगाहें तो पूजा की थाली में पड़े चना और मटर पर जमी रहती थीं। जो अगले दिन तक अंकुरित हो जाता था। मेरे लिये इन्हें तेल और जीरे के तड़का से तल दिया जाता था। महिलाओं के पर्व और रसोईघर से मुझे न जाने क्यों कोलकाता में जो लगाव हुआ, वह आज नासूर बन इस कोमल हृदय को बार-बार संताप देते रहता है। बाजार से लेकर गंगा घाटों पर कैसा उत्सव का माहौल रहा आज ,पर मैं किसी के जिगर का टुकड़ा कहाँ रहा , ना कोई मेरा ही रहा ..

कब से अपने विकल मन को यही तो समझा रहा हूं कि किस्मत का खेल निराला है दोस्त, शांत हो जा न प्यारे ..


परिवार में बिखराव क्या आया कि इन सभी छोटी- छोटी खुशियों पर अकाल्पनिक ग्रहण लग गया। फिर तो अपने तीन दशक के एकाकी जीवन बस यादों के सहारे ही गुजरा है।

तभी रेणु दी का एक भावविह्वल करने वाला संदेश स्मरण हो आया। जिसके कुछ अंश इस तरह से हैं--


" बस समभाव से सृजन करते जाइये | आपके लेखन के मर्म को पहचानने वाले बहुत लोग हैं | और आप कुछ बदल नहीं सकते तो ये भावुकता क्यों ? कितने स्वर्णिम साल गुजर गये किसी अवलम्बन की आस में -- आगे भी गुजर जायेंगे | आपके साथ स्नेह का नया कारवां जुड़ा है उसके स्वागत में अपने आपको हल्का करिये इस पीड़ा से | खुश रहिये | "


उनका स्नेह भरा मार्गदर्शन मुझे ब्लॉग लेखन से जुड़ने के बाद से ही प्राप्त होता रहा है। जब मेरे पोस्ट पर कमेंट बाक्स रिक्त रहता था, तो यह रेणु दी ही थी कि प्रतिक्रिया व्यक्त करती ही रहीं और गत शनिवार के पोस्ट पर भी खाली बाक्स ने जब मुझे उदास किया ,तो अचानक उनका ही कमेंट आ गया। स्नेह का बंधन कभी- कभी रक्त संबंध से भी मजबूत होता है। ऐसी अनुभूति मुझे यहाँ ब्लॉग पर हो रही है ,अपने लिये ..


खैर, पिछले पोस्ट को लेकर कुछ मित्रों ने कहा कि शशि जी बिल्कुल नकारात्मक है। एक जिनका मुझ पर अत्यंत स्नेह है, उन्होंने नाराजगी जताते हुये कहा कि ऐसा भी कोई लिखता है..? गुस्से में ब्लॉग पर प्रतिक्रिया भी नहीं दी उन्होंने...


बंधुओं एक बात मैं स्पष्ट कहना चाहता हूँ कि लिख तो मैं किसी भी विषय पर सकता हूँ , फिर भी यहाँ स्वः अनुभूत विषयों को प्राथमिकता दे रहा हूँ। जीवन के उस चौराहे पर मैं एकाकी खड़ा हूँ, जहाँ पथिक को स्वयं ही सही दिशा का चयन करना है। न जीवनसाथी है, न मनमीत है , न कोई सहारा, जो हाथ थाम ले और भटकने से रोक ले ...

मुझ जैसे कितने ही एकाकी इंसान होगें, जिनकी खामोश पुकार दुनिया के इस शोर भरे मेले में वर्षों पूर्व गुम हो चुकी है। सो, अब यह कहना-


तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो

होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम

जागते रहेंगे और कितनी रात हम

मुक़्तसर सी बात है तुम से प्यार है

तुम्हारा इन्तज़ार है,

तुम पुकार लो ...

स्वयं का उपहास है। फिर क्या किया जाए,जब मस्तानी शाम डरावनी सी लगने लगे और रात काली नागिन सी फुफकार रही हो ,तो है कोई रास्ता अवलंबन का..?


तो मित्रों, तीन रास्ते हैं मेरे जैसे संवेदनशील एकाकी लोगों के समक्ष , जिन्हें बाहरी दुनिया की हंसी- ठहाका उबाऊ लगता है। क्लब की पार्टी और बैठकों में जाना पसन्द नहीं हो। पहला अध्ययन, दूसरा चिन्तन और तीसरा लेखन। मेरे पास चौथा जबर्दस्त विकल्प है, वह यह कि दोनों कानों में इयरफोन लगा तेज आवाज में फिल्मी नगमें सुनने लगता हूँ। ऐसा करने से मस्तिष्क पटल से स्मृतियों पर पर्दा डालना आसान हो जाता है, हृदय की वेदना भी स्वतः कम हो जाती है। अन्यथा तो..

रात ये क़रार की बेक़रार है

तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो...


सच कहूँ, तो मेरा अब तक का अपना चिन्तन जो रहा है, वह यह है कि पुरुष व्यर्थ में श्रेष्ठ होने के दर्प में जी रहा है ,क्यों कि वह नारी ही जो अपने प्रेम, समर्पण और सानिध्य से उसे सम्पूर्णता देती है। यहाँ उसका सहज कर्म योग है। इस पथ पर चल कर जीवन की राह में भ्रमित होने की गुंजाइश कम होती है। नहीं तो बिन स्त्री के करते रहें न हठयोग, जीवन इसे साधने में ही निकल जाएगा, यदि कहीं पांव डगमगाया तो सारी साधना, सारा स्वाभिमान, सारा सम्मान क्षण भर में धूल में मिल जाएगा। इससे भी कहीं अधिक एकाकीपन का बड़ा रोग है..।

नर - नारी ये प्रकृति के सृजन सूत्र हैं। यहाँ सबकुछ स्वाभाविक है, यह तृष्णा नहीं है। तृष्णा तो हमारे मन का सृजन है। प्रकृति की उत्पत्ति के मूल में संयोग ही है। इनमें से किसी भी तत्व के वियोग होते ही विखंडित हो जाएगी , हमारी यह खूबसूरत पृथ्वी ।

फिर भी पुरुष की शंकालु प्रवृत्ति यह नहीं देख पाता कि स्नेह, प्रेम, सेवा , त्याग एवं उत्सर्ग की प्रतिमूर्ति है नारी। वह नर नारी के मध्य वासना के अतिरिक्त और भला सोचेगा भी क्या ? नारी में माता , बहन और मित्र देखने की जो उसकी आदत ही नहीं है। पुरुष की इसी प्रवृत्ति के कारण नारी कितनी भी ऊँचाई पर पहुँच जाए, फिर भी उसके वास्तविक स्वरूप को दबा उसे भोग की सामग्री बना दिया जाता है। ऐसा मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में रह कर देखा है कि कितने ही महिला अधिकारियों के संबंधों को यह पुरुष अपनी वासना की चाशनी में डूबो कर परोसता है। ऐसे पुरुष उसके प्यार भरे आंचल का छांव कभी प्राप्त नहीं कर पाते हैं। जिसका आश्रय पाने से पुरुष की रिक्तता, निरुद्देश्यता, व्याकुलता समाप्त हो जाती है, अर्धांगिनी के न होने के बावजूद भी ऐसी अनुभूति मुझे न जाने क्यों होती रहती है। जैसे किसी अदृश्य डोर से बधा हुआ है, मेरा यह मासूम हृदय....


खैर , यह मन भी कितना पागल है, कल्पनाओं के भुलभुलैये से शीघ्र निकलने का नाम ही नहीं लेता है जो। अब मैं आज की शाम अपनी बात इस प्यारे से गीत से समाप्त कर रहा हूँ...


तेरे लिये पलकों की झालर बनूं

कलियों सा गजरे में बांधे फिरूं

धूप लगे जहां तुझे छाया बनूं

आजा साजना...

अगला लेख: माँ, महालया और मेरा बाल मन



रेणु
04 अक्तूबर 2018

प्रिय शशि भाई -- आपने मेरे शब्दों को इतना महत्व दिया - मैं बहुत हैरान भी हूँ और भावुक भी | आपके एकाकीपन में भी आप बहुत पारदर्शिता से सामाजिक चिंतन करते हैं | सदियों से ही पुरुष समाज का नारी जाति के प्रति बहुत ही रवैया भेदभावपूर्ण रहा है पर कहीं ना कहीं सोच बदल भी रही है | नारी परिवार की धुरी है पर जीवन साथी के बिना वह भी अधूरी है | दोनों का समर्पण और स्नेहासिक्त सामजस्य ही पारिवारिक जीवन को सुखद बनाता है | ईश्वर ना करे कोई भी इस सुख से वंचित रहे | सुंदर सारगर्भित लेख के लिए आपको हार्दिक शुभकामनायें |

Shashi Gupta
05 अक्तूबर 2018

जी दी.बस इसी तरह से आपका स्नेह बना रहे, आपकी प्रतिक्रिया सदैव मनोबल बढ़ाती है है

Shashi Gupta
04 अक्तूबर 2018

जी रेणु दी आपके स्नेह भरे शब्दों में वही जादू है,जो मेरी मां की वाणी में रही, प्रणाम। इससे आगे कुछ नहीं कह पाऊंगा, नेत्र भर आये हैं, सुबह सुबह

कामिनी सिन्हा
04 अक्तूबर 2018

जी हां ,शशि भाई समाज को अब तो अपनों सोच बदलनी ही पड़ेगी .स्त्री -पुरुष के बीच एक पवित्र रिश्ता भी हो सकता है ये बात समझनी ही पड़ेगी .आपने अपने दर्द के साथ साथ एक पवित्र सोच का भी उल्लेख कर इस लेख को और प्रभावशाली बना दिया है .सादर नमन

Shashi Gupta
04 अक्तूबर 2018

प्रयास करता हूँ कि अपनी अनुभूति को सकारात्मक बनाऊं । आभार आपका।

अभिलाषा चौहान
04 अक्तूबर 2018

नर - नारी ये प्रकृति के सृजन सूत्र हैं। यहाँ सबकुछ स्वाभाविक है, यह तृष्णा नहीं है। तृष्णा तो हमारे मन का सृजन है। प्रकृति की उत्पत्ति के मूल में संयोग ही है। इनमें से किसी भी तत्व के वियोग होते ही विखंडित हो जाएगी , हमारी यह खूबसूरत पृथ्वी ।

अभिलाषा चौहान
04 अक्तूबर 2018

नर - नारी ये प्रकृति के सृजन सूत्र हैं। यहाँ सबकुछ स्वाभाविक है, यह तृष्णा नहीं है। तृष्णा तो हमारे मन का सृजन है। प्रकृति की उत्पत्ति के मूल में संयोग ही है। इनमें से किसी भी तत्व के वियोग होते ही विखंडित हो जाएगी , हमारी यह खूबसूरत पृथ्वी ।

Shashi Gupta
04 अक्तूबर 2018

आभार आपका

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
01 अक्तूबर 2018
गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा , हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा********************************आज रविवार का दिन मेरे आत्ममंथन का होता है। बंद कमरे में, इस तन्हाई में उजाला तलाश रहा हूँ। सोच रहा हूँ कि यह मन भी कैसा है , जख्मी हो हो कर भी गैरों से स्नेह करते रहा है।*************
01 अक्तूबर 2018
06 अक्तूबर 2018
इस्तीफा जो नज़ीर न बना ..( बातें, कुछ अपनी- कुछ जग की ) ************************* सोच रहा हूँ कि जिस नज़ीर की बात उस समय शीर्ष पर स्थित राजनेता कर रहे थें। उनके उस चिन्तन का क्या हश्र हुआ ,इस आधुनिक भारत में ..? क्या आज शीर्ष पर बैठें राजनेता, अधिकारी से लेकर परिवार का मुखिया तक किसी भी मामले में
06 अक्तूबर 2018
06 अक्तूबर 2018
इस्तीफा जो नज़ीर न बना ..( बातें, कुछ अपनी- कुछ जग की ) ************************* सोच रहा हूँ कि जिस नज़ीर की बात उस समय शीर्ष पर स्थित राजनेता कर रहे थें। उनके उस चिन्तन का क्या हश्र हुआ ,इस आधुनिक भारत में ..? क्या आज शीर्ष पर बैठें राजनेता, अधिकारी से लेकर परिवार का मुखिया तक किसी भी मामले में
06 अक्तूबर 2018
14 अक्तूबर 2018
जब किसी से कोई गिला रखना ************************ यहाँ मैं गृहस्थ, विरक्त और संत मानव जीवन की इन तीनों ही स्थितियों को स्वयं की अपनी अनुभूतियों के आधार पर परिभाषित करने की एक मासूम सी कोशिश में जुटा हूँ। *************************मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नह
14 अक्तूबर 2018
14 अक्तूबर 2018
जब किसी से कोई गिला रखना ************************ यहाँ मैं गृहस्थ, विरक्त और संत मानव जीवन की इन तीनों ही स्थितियों को स्वयं की अपनी अनुभूतियों के आधार पर परिभाषित करने की एक मासूम सी कोशिश में जुटा हूँ। *************************मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नह
14 अक्तूबर 2018
01 अक्तूबर 2018
गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा , हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा********************************आज रविवार का दिन मेरे आत्ममंथन का होता है। बंद कमरे में, इस तन्हाई में उजाला तलाश रहा हूँ। सोच रहा हूँ कि यह मन भी कैसा है , जख्मी हो हो कर भी गैरों से स्नेह करते रहा है।*************
01 अक्तूबर 2018
29 सितम्बर 2018
व्
आपके कर्मों की ज्योति अब राह हमें दिखलायेगी-----------------------------------------कुछ यादें कुछ बातें, जिनकी पाठशाला में मैं बना पत्रकार***************************एक श्रद्धांजलि श्रद्धेय राजीव अरोड़ा जी को***********************किया था वादा आपने कभी हार न मानेंगे ,बनके अर्जुन जीवन रण में जीतेंगे हा
29 सितम्बर 2018
12 अक्तूबर 2018
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है..******************** पुरुष समाज में से कितनों ने अपनी अर्धांगिनी में देवी शक्ति को ढ़ूंढने का प्रयास किया अथवा उसे हृदय से बराबरी का सम्मान दिया..? शिव ने अर्धनारीश्वर होना इसलिये तो स्वीकार किया। पुरुष का पराक्रम और नारी का हृदय यह किसी कम्प्यूटर के हार्डवेय
12 अक्तूबर 2018
17 अक्तूबर 2018
जब तक मैंने समझा जीवन क्या है ,जीवन बीत गया...********************************रावण का पुतला दहन हम नहीं भूले हैं। लेकिन, भ्रष्टाचार, अनाचार और कुविचार से ग्रसित हो हम
17 अक्तूबर 2018
26 सितम्बर 2018
ऐसा सुंदर सपना अपना जीवन होगा *************************** मैं तो बस इतना कहूँगा कि यदि पत्नी का हृदय जीतना है , तो कभी- कभी घर के भोजन कक्ष में चले जाया करें बंधुओं , पर याद रखें कि गृह मंत्रालय पर आपका नहीं आपकी श्रीमती जी का अधिकार है। रसोईघर से उठा सुगंध आपके दाम्पत्य जीवन को निश्चित अनुराग से भ
26 सितम्बर 2018
06 अक्तूबर 2018
इस्तीफा जो नज़ीर न बना ..( बातें, कुछ अपनी- कुछ जग की ) ************************* सोच रहा हूँ कि जिस नज़ीर की बात उस समय शीर्ष पर स्थित राजनेता कर रहे थें। उनके उस चिन्तन का क्या हश्र हुआ ,इस आधुनिक भारत में ..? क्या आज शीर्ष पर बैठें राजनेता, अधिकारी से लेकर परिवार का मुखिया तक किसी भी मामले में
06 अक्तूबर 2018
07 अक्तूबर 2018
माँ , महालया और मेरा बाल मन...************************** आप भी चिन्तन करें कि स्त्री के विविध रुपों में कौन श्रेष्ठ है.? मुझे तो माँ का वात्सल्य से भरा वह आंचल आज भी याद है। ****************************जागो दुर्गा, जागो दशप्रहरनधारिनी, अभयाशक्ति बलप्रदायिनी, तुमि जागो... माँ - माँ.. मुझे
07 अक्तूबर 2018
07 अक्तूबर 2018
माँ , महालया और मेरा बाल मन...************************** आप भी चिन्तन करें कि स्त्री के विविध रुपों में कौन श्रेष्ठ है.? मुझे तो माँ का वात्सल्य से भरा वह आंचल आज भी याद है। ****************************जागो दुर्गा, जागो दशप्रहरनधारिनी, अभयाशक्ति बलप्रदायिनी, तुमि जागो... माँ - माँ.. मुझे
07 अक्तूबर 2018
22 सितम्बर 2018
किसीका दर्द मिल सके तो ले उधार ****************************** अब देखें न हमारे शहर के पोस्टग्रेजुएट कालेज के दो गुरुदेव कुछ वर्ष पूर्व रिटायर्ड हुये। तो इनमें से एक गुरु जी ने शुद्ध घी बेचने की दुकान खोल ली थी,तो दूसरे अपने जनरल स्टोर की दुकान पर बैठ टाइम पास करते दिखें । हम कभी तो स्वयं से पूछे क
22 सितम्बर 2018
17 अक्तूबर 2018
जब तक मैंने समझा जीवन क्या है ,जीवन बीत गया...********************************रावण का पुतला दहन हम नहीं भूले हैं। लेकिन, भ्रष्टाचार, अनाचार और कुविचार से ग्रसित हो हम
17 अक्तूबर 2018

शब्दनगरी से जुड़िये आज ही

आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x