व्यक्तित्व का निर्माण करती है भावना :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (52 बार पढ़ा जा चुका है)

व्यक्तित्व का निर्माण करती है भावना :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ इसलिए माना गया है क्योंकि मनुष्य में निर्णय लेने की क्षमता के साथ परिवार समाज व राष्ट्र के प्रति एक अपनत्व की भावना से जुड़ा होता है | मनुष्य का व्यक्तित्व उसके आचरण के अनुसार होता है , और मनुष्य का आचरण उसकी भावनाओं से जाना जा सकता है | जिस मनुष्य की जैसी भावना होती है उसका आचरण उसी प्रकार का होता चला जाता है | सामाजिक स्तर पर जिस मनुष्य का जैसा आचरण होता है उसी प्रकार उसके व्यक्तित्व की सराहना एवं भर्त्सना होती है | सीधे सीधे यह कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व विकास में भावना का महत्वपूर्ण योगदान होता है | कोई भी ऐसा मनुष्य इस पृथ्वी पर नहीं हुआ है जिसके अंदर यह भावना निहित ना हो , यह अलग विषय है उसके मन में किसी के प्रति सद्भावना है तो किसी के प्रति दुर्भावना अंदर होती है | जहां समाज परिवार एवं राष्ट्र के प्रति सद्भावना रखने वाले का सम्मान होता है तो समाज में हर किसी से दुर्भावना रखने वाला मनुष्य स्थान स्थान पर आलोचना का पात्र बनता रहता है और ऐसे मनुष्य कुंठा का शिकार होकर के अंतर्मुखी होते चले जाते हैं | क्योंकि जब स्थान स्थान पर लोग उनकी आलोचना करने लगते हैं तो मनुष्य को यही लगने लगता है कि सारा संसार हमसे द्वेष करता है | जबकि सत्यता यह होती है कि उसका स्वयं का आचरण इस योग्य नहीं होता है कि कोई उस से प्रेम करें | यदि कोई प्रेम करना भी चाहता है तो उस व्यक्ति को यह लगता है यह तो हमारे प्रबल विरोधी हैं प्रेम को स्वीकार तो कर लेता है परंतु उसके मन की दुर्भावना नहीं हटती और उसका व्यक्तित्व और उसके आचरण दुर्भावना से ग्रसित होकर ही आश्रित होते रहते हैं |* *आज समाज में जगह जगह पर सामाजिक संगठनों के द्वारा , धार्मिक संगठनों के द्वारा या ग्रामीण स्तर पर सार्वजनिक कार्यक्रमों का आयोजन इसी उद्देश्य से किया जाता है कि लोग आपस में प्रेम और आपसी सद्भावना का विकास कर सके | व्यक्तित्व निर्माण की प्रथम पाठशाला घर से निकल कर विद्यालय तक होती है | प्राथमिक विद्यालय में गुरुजनों के द्वारा छात्रों को आपसी प्रेम सद्भावना के विषय में ज्ञान कराते हुए उनके चरित्र निर्माण , व्यक्तित्व निर्माण का उद्योग किया जाता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" अब तक मिले ज्ञान एवं आज के समाज की स्थिति को देखते हुए इतना ही कह सकता हूं कि मनुष्य के पास धनबल , जनबल एवं बाहुबल होने के बाद भी यदि उसका व्यक्तित्व सकारात्मक नहीं है उसकी भावनाएं लोगों के प्रति अच्छी नहीं है तो मनुष्य समाज में सम्मान तो पाता है परंतु लोग पीठ पीछे उसके व्यक्तित्व एवं आचरण की आलोचना ही करते मिलते हैं | मनुष्य को सदैव ही ऐसा आचरण करना चाहिए जिससे कि वह जहां भी जाए उसके व्यक्तित्व की सुगंध चहुँओर फैलती रहे , क्योंकि मनुष्य के व्यक्तित्व की प्रशंसा उसके आगे ना हो करके यदि उसकी अनुपस्थिति में हो तभी ही माना जा सकता है उसके आचरण एवं उसकी भावनाएं सबके लिए सकारात्मक है |* *यदि अपने आचरण को एवं व्यक्तित्व को शुद्ध बनाना है तो सर्वप्रथम अपने हृदय में उमड़ रही भावनाओं को सद्भावना में परिवर्तित करना होगा क्योंकि दुर्भावना ग्रस्त मनुष्य कभी विकास नहीं कर सकता |*

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