पवित्रता का महत्व

07 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (77 बार पढ़ा जा चुका है)

पवित्रता का महत्व

*चौरासी योनियों में सर्वश्रेष्ठ एवं सबसे सुंदर शरीर मनुष्य का मिला | इस सुंदर शरीर को सुंदर बनाए रखने के लिए मनुष्य को ही उद्योग करना पड़ता है | सुंदरता का अर्थ शारीरिक सुंदरता नहीं वरन पवित्रता एवं स्वच्छता से हैं | पवित्रता जीवन को स्वच्छ एवं सुंदर बनाती है | पवित्रता, शुद्धता, स्वच्छता मानव-जीवन को ऊँचा उठाने के लिये एक महत्वपूर्ण सद्गुण है | मनुष्य के लिए पवित्रता क्यों आवश्यक है इसके विषय में हमारे धर्मग्रंथों में बताया गया है :--- कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं , बह्णशिनं निष्ठुरभाषिणं च ! सूर्योदये चास्मिते च शायिनं , विमुञ्चति श्रीरपि चक्रपाणिम् !! अर्थात :-- "मैले वस्त्र पहनने वाले, दाँत गंदे रखने वाले, ज्यादा खाने वाले, निष्ठुर बोलने वाले, सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय सोने वाले स्वयं विष्णु भगवान हों तो उन्हें भी लक्ष्मी जी त्याग देती है | कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को स्वच्छ एवं पवित्र रहना चाहिए | शरीर सुंदर हो इसकी अपेक्षा मन (हृदय) का सुंदर होना बहुत आवश्यक है | एक पवित्र हृदय से ही पवित्रता की भावना विकसित हो सकती है | मन की पवित्रता ही सर्वश्रेष्ठ पवित्रता है | मन की पवित्रता से संपूर्ण शरीर की पवित्रता संभव है | अधिकतर लोग शरीर को पवित्र बनाने के बारे में सोचते रहते है परंतु मन की पवित्रता के बारे में सोचते भी नहीं है | वास्तव में मन की पवित्रता से दैनिक दिनचर्या में होने वाले कर्मों में भी पारदर्शिता और पवित्रता की झलक साफ दिखाई देती है | मानव जीवन में पवित्रता के महत्व को दर्शाते हुए हमारे शास्त्र कहते हैं कि :- पवित्र व्यक्ति पर वज्र भी गिरे तो उसका बाल बाँका नहीं कर सकता | " वज्रात् त्रायते इति पवित्रः " | जो पवि अर्थात् वज्र से भी रक्षा करे, उसका नाम है पवित्र | वज्र पवित्र व्यक्ति का स्पर्श नहीं कर सकता | प्रत्येक मनुष्य को मन से सुंदर एवं पवित्र बनने का प्रयास करना चाहिए |* *आज के युग में पवित्रता एवं सुंदरता का अर्थ बदल गया है | अनेक लोग स्वच्छता अथवा सफाई का अर्थ केवल ऊपर की टीपटाप, आकर्षक शृंगार या बढ़िया फैशन बना लेना ही समझते हैं | कुछ लोगों की दृष्टि में बढ़िया वस्त्र, आभूषण, प्रसाधन सामग्री का उपयोग करना सफाई और सौंदर्य का प्रमाण समझा जाता है | कुछ लोग ऐसे भी हैं जो शरीर और वस्तुओं की अधिक सफाई सौंदर्य की वृद्धि आदि बातों को साँसारिक प्रपंच मानकर इनकी उपेक्षा करने में ही सफलता का अनुभव करते हैं | पर ये सभी दृष्टिकोण एकांगी हैं | यह हो सकता है कि कुछ लोग विलास-प्रियता का शृंगार के भाव से ही स्वच्छता और सफाई करते है यह भी हो सकता है कि अन्य लोग अपना वैभव, न प्रकट करने के दृष्टिकोण से सफाई पर ध्यान देते है | पर इससे स्वच्छता की प्रवृत्ति को अनावश्यक या अनुकरणीय नहीं माना जा सकता | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि स्वच्छता, एवं पवित्रता एक ही उच्च मनोवृत्ति के रूप हैं और दोनों का स्वस्थ, मन को प्रसन्न तथा आत्मा को शान्त करने में इनका बड़ा योग रहता है | बाह्य स्वच्छता और पवित्रता से अन्तःकरण की पवित्रता की भी वृद्धि होती है | मन में अशुद्ध भावों का उदय होना स्वयमेव कम पड़ता जाता है | प्राय: लोग तीर्थों में इस शरीर को मल मलकर धुलते हैं परंतु मन को नहीं धुल पाते हैं | आंतरिक पवित्रता से शून्य मनुष्य किसी संगमरमर की मूर्ति से अधिक नहीं समझे जा सकते | मनुष्य को सदैव मन से , वचन से , एवं कर्म से पवित्र होना चाहिए |* *मनुष्य के मन को दर्पण की संज्ञा दी गयी है ! दर्पण सदैव स्वच्छ एवं पवित्र ही रखना चाहिए अन्यथा उसमें अपना ही प्रतिबिम्ब दिखना बन्द हो जाता है |*

अगला लेख: त्रिगुणात्मक सृष्टि :---- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
02 अक्तूबर 2018
*पुरातन काल से भारतीय संस्कृति अपने आप में अनूठी रही है | भारत से लेकर संपूर्ण विश्व के कोने-कोने तक भारतीय संस्कृति एवं संस्कार ने अपना प्रभाव छोड़ा है , और इसे विस्तारित करने में हमारे महापुरुषों ने , और हमारे देश के राजाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था | किसी भी समस्या के निदान के लिए या किसी नवी
02 अक्तूबर 2018
28 सितम्बर 2018
*इस सृष्टि के जनक जिन्हे ईश्वर या परब्रह्म कहा जाता है वे सृष्टि में घट रही घटनाओं का श्रेय स्वयं न लेकरके किसी न किसी को माध्यम बनाते रहते हैं | परमपिता परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना में पंचतत्वों की महत्वपूर्ण भूमिका बनायी और साथ ही इस सृष्टि में तीन गुणों (सत्व , रज एवं तम) को प्रकट किया और सकल स
28 सितम्बर 2018
07 अक्तूबर 2018
*सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि को गतिमान करने के लिए कई बार सृष्टि की रचना की , परंतु उनकी बनाई सृष्टि गतिमान न हो सकी , क्योंकि उन्होंने प्रारंभ में जब भी सृष्टि की तो सिर्फ पुरुष वर्ग को उत्पन्न किया | जो भी पुरुष हुए उन्होंने सृष्टि में कोई रुचि नहीं दिखाई | अपनी बनाई हुई सृष्टि क
07 अक्तूबर 2018
12 अक्तूबर 2018
*पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।* *प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥* *हमारे सनातन धर्म में नवरात्र पर्व के तीसरे दिन महामाया चंद्रघंटा का पूजन किया जाता है | चंद्रघंटा की साधना करने से मनुष्य को प्रत्येक सुख , सुविधा , ऐश्वर्य , धन एवं लक्ष्मी की प्राप्
12 अक्तूबर 2018
05 अक्तूबर 2018
*इस संसार में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ इसलिए माना गया है क्योंकि मनुष्य में निर्णय लेने की क्षमता के साथ परिवार समाज व राष्ट्र के प्रति एक अपनत्व की भावना से जुड़ा होता है | मनुष्य का व्यक्तित्व उसके आचरण के अनुसार होता है , और मनुष्य का आचरण उसकी भावनाओं से जाना जा सकता है | जिस मनुष्य की जैसी भावना ह
05 अक्तूबर 2018
12 अक्तूबर 2018
*नवरात्र के पावन अवसर पर चल रही नारीगाथा पर आज एक विषय पर सोंचने को विवश हो गया कि नारियों पर हो रहे अत्याचारों के लिए दोषी किसे माना जाय ??? पुरुषवर्ग को या स्वयं नारी को ??? परिणाम यह निकला कि कहीं न कहीं से नारी की दुर्दशा के लिए नारी ही अधिकतर जिम्मेदार है | जब अपने साथ कम दहेज लेकर कोई नववधू सस
12 अक्तूबर 2018
28 सितम्बर 2018
*मानव समाज में एक दूसरे के ऊपर दोषारोपण करने का कृत्य होता रहा है | जबकि हमारे आर्ष ग्रंथों में स्थान - स्थान पर इससे बचने का निर्देश देते हुए लिखा भी है :- "परछिद्रेण विनश्यति" अर्थात दूसरों के दोष देखने वाले का विनाश हो जाता है अर्थात अस्तित्व समाप्त हो जाता है | इसी से मिलता एक शब्द है "निंदा" |
28 सितम्बर 2018
15 अक्तूबर 2018
*चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन |* *कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ||* *महामाई आदिशक्ति भगवती के पूजन का पर्व नवरात्र शनै: शनै: पूर्णता की ओर अग्रसर है | महामाया इस सृष्टि के कण - कण में विद्यमान हैं | जहाँ जैसी आवश्यकता पड़ी है वैसा स्वरूप मैया ने धारण करके लोक
15 अक्तूबर 2018
02 अक्तूबर 2018
*पुरातन काल से भारतीय संस्कृति अपने आप में अनूठी रही है | भारत से लेकर संपूर्ण विश्व के कोने-कोने तक भारतीय संस्कृति एवं संस्कार ने अपना प्रभाव छोड़ा है , और इसे विस्तारित करने में हमारे महापुरुषों ने , और हमारे देश के राजाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था | किसी भी समस्या के निदान के लिए या किसी नवी
02 अक्तूबर 2018
01 अक्तूबर 2018
*मनुष्य इस पृथ्वी पर इकलौता प्राणी है जिसमें अन्य प्राणियों की अपेक्षा सोंचने - समझने के लिए विवेकरूपी एक अतिरिक्त गुण ईश्वर ने प्रदान किया है | अपने विवेक से ही मनुष्य निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर होता रहा है | मनुष्य को कब क्या करना चाहिये इसका निर्णय विवेक ही करता है | अपने विवेक का प्रयोग जिसने स
01 अक्तूबर 2018
24 सितम्बर 2018
*संसार में अब तक अनेक विद्वान महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने क्रिया कलापों से संसार का कल्याण करने का ही प्रयास किया है ! उनके चरित्रों का अनुसरण करके मनुष्य स्वयं पूजित होता रहा है | महापुरुषों के बताये गये मार्गों का अनुसरण करके , उनके लिखे ग्रंथों का पठन - पाठन करके ही विद्वान बनते आये महापुरुषो
24 सितम्बर 2018
07 अक्तूबर 2018
*इस धराधाम पर जीवन जीने के लिए हमारे महापुरुषों ने मनुष्य के लिए कुछ नियम निर्धारित किए हैं | इन नियमों के बिना कोई भी मनुष्य परिवार , समाज व राष्ट्र का सहभागी नहीं कहा जा सकता | जीवन में नियमों का होना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि बिना नियम के कोई भी परिवार , समाज , संस्था , या देश को नहीं चलाया जा सक
07 अक्तूबर 2018
23 सितम्बर 2018
*सनातन धर्म प्रत्येक पर्व एवं त्योहार स्वयं इस वैज्ञानिकता कुछ छुपाये हुए हैं | इतना बृहद सनातन धर्म कि इसके हर त्यौहार अपने आप में अनूठे हैं | आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को "अनंत चतुर्दशी" के नाम से जाना जाता है | संपूर्ण भारत में भक्तजन यह व्रत बहुत ही श्रद्धा के साथ लोग रहते हैं | "अनंत चत
23 सितम्बर 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x