समर्थवान कौन ?? --- आचार्य अर्जुन तिवारी

07 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (180 बार पढ़ा जा चुका है)

समर्थवान कौन ?? --- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन काल से यदि भारतीय इतिहास दिव्य रहा है तो इसका का कारण है भारतीय साहित्य | हमारे ऋषि मुनियों ने ऐसे - ऐसे साहित्य लिखें जो आम जनमानस के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाते रहे हैं | हमारे सनातन साहित्य मनुष्य को जीवन जीने की दिशा प्रदान करते हुए दिखाई पड़ते हैं | कविकुल शिरोमणि परमपूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस एक कालजयी रचना बन कर के जीवन के हर विषय पर मानव मात्र का पद प्रदर्शन करने वाला ग्रंथ है | बाबा जी की वैसे तो प्रत्येक चौपाई अपने आप में अनूठी है परंतु एक चौपाई को लेकर के प्राय: समाज में चर्चा होती रहती है | बाबा जी ने लिखा ;-- "समरथ को नहिं दोष गोसाई" इस चौपाई के अर्थ से लेकर अनर्थ तक लगाये गये | समर्थ का क्या अर्थ होता है ? इसको हमारे सनातन साहित्य में स्पष्ट करते हुए लिखा है | सम + अर्थ अर्थात जो भेदभाव से रहित होकर सबके साथ समान व्यवहार करें वही समर्थ है | समरथ का यदि सन्धिविच्छेद किया जाय तो (सम + अर्थ ) होता है | (सम + अर्थ ) में धनबल , बाहुबल , एवं पशुबल का भाव न समझकर आत्मबल का भाव ही समझना चाहिए | जो अपने कर्मों व विचारों से दोष रहित हो वहीं समर्थ कहा जा सकता है | जिसके कर्म भेदभाव वाली बुद्धि से प्रेरित ना हो वहीं समर्थ कहा जा सकता है | अपनी चौपाई को पूरी करते हुए शायद इसीलिए बाबा जी ने आगे लिखा है :-- " रवि पावक सुरसरि की नांईं " | सूर्य अग्नि एवं गंगा जी के कार्य भेदभाव रहित ही है | कहने का अर्थ है की जो दोष रहित हो वही समर्थन है | यदि इस विषय पर विचार किया जाए कि भेदभाव से परे एवं दोष रहित एवं समर्थवान कौन है तो तो ईश्वर के अतिरिक्त दोष रहित कोई दूसरा नहीं हो सकता | इसलिए समर्थन एवं सर्व शक्तिमान एक वही परमात्मा हो सकता है गीता में योगेश्वर कृष्ण ने कहा है " निर्दोषं हि समं ब्रह्म" है अर्थात :-- ब्रह्म ही निर्दोष है |* *आज जिस प्रकार युग बदला मान्यताएं बदल गई उसी प्रकार अनेक ग्रंथों में लिखी हुई सूक्तियां एवं उनके अर्थ लोगों ने अपने अनुसार बदल लिए हैं | आज समर्थवान का अर्थ दोषरहित न हो करके धनबल एवं बाहुबल से लगाया जाने लगा है | जिसकी जितनी ज्यादा शासनसत्ता से समीपता एवं पकड़ है वहीं समर्थवान कहा जा सकता है | आज समर्थवान का सीधा अर्थ है कि मनुष्य कुछ भी करके निर्दोष सिद्ध हो जाता है तो लोग उसे समर्थवान कहने लगते हैं | और लोग बाबा जी की चौपाई का उदाहरण भी देने लगते हैं कि जो समर्थवान होता है उसको कोई दोष नहीं लगता है | जबकि मेरा आचार्य अर्जुन तिवारी का मानना है समर्थवान वही हो सकता है जो समाधिस्थ हो | समाधि का अर्थ होता है सम +धि अर्थात जिसकी बुद्धि सबको समान देखने वाली हो , उसी को समाधिस्थ एवं समर्थवान माना जा सकता है | आज के भौतिकयुग में भी यदि कोई ऐसा हो जो सबको बराबर की दृष्टि से देख सकता हो तो वही वास्तविक समर्थ है अन्यथा तो सभी समर्थवान हैं ही |* *आज के समर्थवान तब तक ही समर्थ हैं जब तक उनके पास बल है | मनुष्य को दीर्घकालिक समर्थवान (आत्मबल से पूर्ण) बनने का प्रयास करना चाहिए |*

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