विद्वता :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

07 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (45 बार पढ़ा जा चुका है)

*सनातन काल से हमारे विद्वानों ने संपूर्ण विश्व को एक नई दिशा प्रदान की | आज यदि हमारे पास अनेकानेक ग्रंथ , उपनिषद एवं शास्त्र उपलब्ध हैं तो उसका कारण है हमारे विद्वान ! जिन्होंने अपनी विद्वता का परिचय देते हुए इन शास्त्रों को लिखा | जिसका लाभ हम आज तक ले रहे हैं | जिस प्रकार एक धनी को धनवान कहा जाता है , एक बली को बलवान कहा जाता है उसी प्रकार विद्या अर्जन करने वाले को विद्वान कहा जा सकता है | परंतु इन में अंतर भी है | एक धनवान जब अपना धन व्यय करता चला जाता है तो एक दिन वह धनहीन हो जाता है , परंतु एक विद्वान अपने विद्या का जितना व्यय करता है उतनी ही विद्या उसके पास स्वयं आती रहती है | जो निरंतर अपने आय के स्रोत को बनाए रखते हुए धनार्जन करता रहता है वहीं धनवान की श्रेणी में आता है , ठीक उसी प्रकार जो निरंतर विद्यार्जन करते हुए नित नये ज्ञान की प्राप्ति का उद्योग करता रहता है वहीं विद्वान कहा जा सकता है | हमारे धर्म ग्रंथों में देखने को मिलता है कि अनेकानेक विद्वान विद्यार्जन करते हुए अपना सारा जीवन व्यतीत कर देते हैं परंतु फिर भी स्वयं को उन्होंने कभी विद्वान नहीं कहते | अपनी विद्वता से उन्होंने अनेक लोक कल्याण कार्य किए परंतु उन्हें कभी अहंकार नहीं आया कि मैं विद्वान हूँ |* *आज भी हमारे देश में अनेकों ऐसे विद्वान हैं जो विद्वान होते हुए भी स्वयं को कुछ नहीं मानते | परंतु कुछ तथाकथित विद्वान जिन्होंने एक या दो ग्रंथों का अध्ययन कर लिया वह स्वयं को विद्वान मानने लगे एवं अपनी उसी बिद्वता के अहंकार में अपने संस्कारों को भी भूलने का कार्य कर रहे हैं | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना कि जो विद्वान होता है वह कभी नहीं कहता है या वह कभी यह दर्शाने का प्रयास नहीं करता है कि वह विद्वान है | हमारे धर्म शास्त्रों में एक सूक्ति कही जाती है "विद्वान कुलीनो न करोति गर्व:" अर्थात जो विद्वान होता है और साथ ही अच्छे कुल का होता है उसको कभी अपनी विद्वता का अहंकार नहीं होता है | परंतु आजकल प्राय: देखने को मिलता है थोड़ी सी विद्या प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्य स्वयं को विद्वान घोषित करके अहंकारी हो जाता है | इनका वही हाल है जैसे मानस में बाबा जी लिखते हैं "छुद्र नदी भर चली तोराई ! जिमि थोरे धन खल इतराई !! जैसे बरसात में छोटी छोटी नदियां जल से पूर्ण हो जाती है जैसे थोड़ा सा धन आ जाने पर दुष्ट उस दिन पर अहंकार करने लगते हैं , ठीक उसी प्रकार जो निम्न मानसिकता के लोग होते हैं अल्प विद्वता प्राप्त कर लेने के बादलस्वयं को विद्वान मानने लगते हैं ! परंतु यह विद्वता का परिमाप नहीं हो सकता | विद्वता वह जो कि सब कुछ जानने के बाद भी विद्वान का भाव हो कि मैं कुछ नहीं जानता | इस संसार में जिसने यह कह दिया कि मुझे सारा ज्ञान हो गया समझ लो कुछ भी नहीं जाना |* *विद्वता का सीधा सा अर्थ है अपने आप में सब कुछ समाहित कर लेना परंतु उसका प्रदर्शन ना करना | थोथा प्रदर्शन करने वाला कभी विद्वान नहीं कहा जा सकता |*

अगला लेख: त्रिगुणात्मक सृष्टि :---- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
11 अक्तूबर 2018
*सृष्टि के प्रारम्भ में विराट पुरुष से वेदों का प्रदुर्भाव हुआ | वेदों ने मानव के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है | जीवन के प्रत्येक अंगों का प्रतिपादन वेदों में किया गया है | मानव जीवन पर वेदों का इतना प्रभाव था कि एक युग को वैदिक युग कहा गया | परंतु वेदों में वर्णित श्लोकों का अर्थ न निकालकर क
11 अक्तूबर 2018
23 सितम्बर 2018
*सनातन धर्म प्रत्येक पर्व एवं त्योहार स्वयं इस वैज्ञानिकता कुछ छुपाये हुए हैं | इतना बृहद सनातन धर्म कि इसके हर त्यौहार अपने आप में अनूठे हैं | आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को "अनंत चतुर्दशी" के नाम से जाना जाता है | संपूर्ण भारत में भक्तजन यह व्रत बहुत ही श्रद्धा के साथ लोग रहते हैं | "अनंत चत
23 सितम्बर 2018
22 अक्तूबर 2018
*सनातन धर्म में मनाए जाने वाले प्रत्येक त्योहारों में एक रहस्य छुपा हुआ है | नौ दिन का दिव्य नवरात्र मनाने के बाद दशमी के दिन दशहरा एवं विजयदशमी का पर्व मनाया जाता है | शक्ति की उपासना का पर्व शारीेय नवरात्रि प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल
22 अक्तूबर 2018
26 सितम्बर 2018
*परमात्मा की बनाई हुई इस सृष्टि को सुचारु रूप से संचालित करने में पंचतत्व एवं सूर्य , चन्द्र का प्रमुख योगदान है | जीवों को ऊर्जा सूर्य के माध्यम से प्राप्त होती है | सूर्य की गति के अनुसार ही सुबह , दोपहर एवं संध्या होती है | सनातन धर्म में इन तीनों समय (प्रात:काल , मध्यान्हकाल एवं संध्याकाल ) का व
26 सितम्बर 2018
01 अक्तूबर 2018
*इस सृष्टि का सृजन करके हमेम इस धरा धाम पर भेजने वाली उस परमसत्ता को ईश्वर कहा जाता है | ईश्वर के बिना इस सृष्टि की परिकल्पना करना ही व्यर्थ है | कहा भी जाता है कि मनुष्य के करने से कुछ नहीं होता जो कुछ करता है ईश्वर ही करता है | वह ईश्वर जो सर्वव्यापी है और हमारे पल पल के कर्मों का हिसाब रखता है |
01 अक्तूबर 2018
02 अक्तूबर 2018
*पुरातन काल से भारतीय संस्कृति अपने आप में अनूठी रही है | भारत से लेकर संपूर्ण विश्व के कोने-कोने तक भारतीय संस्कृति एवं संस्कार ने अपना प्रभाव छोड़ा है , और इसे विस्तारित करने में हमारे महापुरुषों ने , और हमारे देश के राजाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था | किसी भी समस्या के निदान के लिए या किसी नवी
02 अक्तूबर 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x