सर्वपितृ अमावस्या पर अवश्य करें श्राद्ध :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

08 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (60 बार पढ़ा जा चुका है)

सर्वपितृ अमावस्या पर अवश्य करें श्राद्ध :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मृत्युलोक में जन्म लेने के बाद मनुष्य तीन प्रकार के ऋणों से ऋणी हो जाता है यथा :- देवऋण , ऋषिऋण एवं पितृऋण | पूजन पाठ एवं दीपदान करके मनुष्य देवऋण से मुक्त हो सकता है , वहीं जलदान करके ऋषिऋण एवं पिंडदान (श्राद्ध) करके पितृऋण से मुक्त हुआ जा सकता है | प्रत्येक वर्ष आश्विनमास के कृष्णपक्ष में पितरों के नाम से विशेष "पितृपक्ष" मनाया जाता है | इन सोलह दिनों में पुत्रों द्वारा पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण एवं पिंडदानादि कर्म किये जाते हैं | प्राय: एक प्रश्न उठता है कि ज्सके पुत्र न हो उसका पिंडदान एवं श्राद्ध कैसे और कौन कर सकता है | इसका निदान हमारे "स्मृति ग्रंथ" "श्राद्धकल्प" में करते हुए मनीषियों ने बताया है कि :--पुत्र: पौत्रश्च तत्पुत्र: पुत्रिकापुत्र एव च ! पत्नी भ्राता च तज्जश्च पिता माता स्नुषा तथा !! भगिनी भागिनेयश्च सपिण्ड: सोदकस्तथा ! असन्निधाने पूर्वेषामुत्तरे पिण्डदा: स्मृता: !! अर्थात :- पुत्र , पौत्र , प्रपौत्र , दौहित्र (पुत्री का पुत्र), पत्नी , भाई , भतीजा पिता , माता , पुत्रवधू , बहन , भानजा आदि श्राद्ध के अधिकारी कहे गये हैं ! विष्णुपुराण का कथन है कि :-- "कुलद्वयेपि चोच्छिन्ने स्त्रीभि: कार्या:" अर्थात :- यदि दोनों कुल में कोई नहीं है तो स्त्री यह कार्य कर सकती है | यद्यपि पिंडदान करने का अधिकार पुत्र को ही है परंतु यदि पुत्र न हो तो क्या हो इसका निदान "हेमाद्रि" में मिलता है :-- "पितु: पुत्रेण कर्तव्या पिण्डदानोदकक्रिया !पुत्राभावे तु पत्नी स्यात् पत्न्याभावे तु सोदर: !! अर्थात :- यद्यपि पिता की पिण्डदानादि क्रिया पुत्र को करनी चाहिए | परंतु यदि पुत्र न हो तो यह कार्य पत्नी करे | पत्नी भी न हो तो सहोदर भाई यह कार्य सम्पन्न कर सकता है | कहने का तात्पर्य यह है कि पितरों का पिंडदान परम आवश्यक मानते हुए जो भी परिवार में हो उसके द्वारा यह क्रिया सम्पन्न की जानी चाहिए |* *आज की आधुनिकता में सनातन धर्मी ही स्वयं की संस्कृति एवं मान्यताओं को भूलते जा रहे हैं | लोग प्राय: प्रश्न कर देते हैं कि :- क्या पितरों का श्राद्ध करना आवश्यक है ?? क्या पितरों का श्राद्ध करना चाहिए ?? या जिन पितरों का मोक्ष हो गया है ऐसे पितरों के पिंड का क्या होता होगा ?? कुछ लोग ये भी कहते हैं जिन्होंने जीवन भर भक्ति की है उनका मोक्ष हो गया होगा तो उनका श्राद्ध करना आवश्यक नहीं है | ऐसे सभी लोगों से मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" कहना चाहता हूं कि जिस प्रकार हमने आज तक देवताओं को नहीं देखा है परंतु उनकी पूजा करते हैं , उसी प्रकार हमारे पूर्वज , हमारे पितर , मृत्योपरांत मोक्ष को प्राप्त हुए , पितृ योनि में गये या प्रेत योनि में रह रहे हैं | इसका अनुभव करना हमारे लिए संभव नहीं है | अतः हमें यथा समय पितरों के श्राद्ध आदि कर्म श्रद्धा के साथ करते रहना चाहिए | आज सर्वपितृ अमावस्या के दिन जिनको हम जानते हैं या जिन को नहीं जानते ऐसे सभी पितरों के लिए श्राद्ध करने का अवसर हमें मिलता है | प्राय: श्राद्ध पूर्वजों की मृत्यु तिथि पर किया जाता है परंतु जिन की मृत्युतिथि हमें नहीं ज्ञात है ऐसे सभी पितरों का श्राद्घ "सर्वपितृ अमावस्या" के दिन करने का विधान है | जिनका श्राद्ध नहीं किया जाता है ऐसे पितर अपने कुल में स्थितियां विपरीत कर देते हैं और लोग परेशान होकर विद्वानों के पास पहुँचकर "पितृदोष निवारण" का उपाय पूंछते और करते रहते हैं | इन स्थितियों से बचने के लिए यथासमय श्राद्ध एवम् पिंडदान करते रहना चाहिए |* *आज "सर्वपितृ अमावस्या" के दिन पितृलोक में निवास कर रहे सभी पितरों को साष्टांग दंडवत करते हुए यही कामना है कि सबके पितर सबका कल्याण करते रहें |*

अगला लेख: त्रिगुणात्मक सृष्टि :---- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
28 सितम्बर 2018
*मानव समाज में एक दूसरे के ऊपर दोषारोपण करने का कृत्य होता रहा है | जबकि हमारे आर्ष ग्रंथों में स्थान - स्थान पर इससे बचने का निर्देश देते हुए लिखा भी है :- "परछिद्रेण विनश्यति" अर्थात दूसरों के दोष देखने वाले का विनाश हो जाता है अर्थात अस्तित्व समाप्त हो जाता है | इसी से मिलता एक शब्द है "निंदा" |
28 सितम्बर 2018
01 अक्तूबर 2018
*मनुष्य इस पृथ्वी पर इकलौता प्राणी है जिसमें अन्य प्राणियों की अपेक्षा सोंचने - समझने के लिए विवेकरूपी एक अतिरिक्त गुण ईश्वर ने प्रदान किया है | अपने विवेक से ही मनुष्य निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर होता रहा है | मनुष्य को कब क्या करना चाहिये इसका निर्णय विवेक ही करता है | अपने विवेक का प्रयोग जिसने स
01 अक्तूबर 2018
28 सितम्बर 2018
*इस सृष्टि के जनक जिन्हे ईश्वर या परब्रह्म कहा जाता है वे सृष्टि में घट रही घटनाओं का श्रेय स्वयं न लेकरके किसी न किसी को माध्यम बनाते रहते हैं | परमपिता परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना में पंचतत्वों की महत्वपूर्ण भूमिका बनायी और साथ ही इस सृष्टि में तीन गुणों (सत्व , रज एवं तम) को प्रकट किया और सकल स
28 सितम्बर 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x