गुजरात से यूपी-बिहार वाले बस-ट्रेन में भरकर लौट रहे हैं, इसका जिम्मेदार कौन है?

08 अक्तूबर 2018   |  रवि मेहता   (83 बार पढ़ा जा चुका है)

गुजरात से यूपी-बिहार वाले बस-ट्रेन में भरकर लौट रहे हैं, इसका जिम्मेदार कौन है?

गुजरात छोड़कर जा रहे हैं वहां काम करने वाले मजदूर और लोग.

उत्तर प्रदेश से गुजरात में रोजी-रोटी कमाने आए हुए नौजवान जब घर से निकलते हैं तो मां को बड़ी चिंता रहती है. और आजकल मोबाइल फोन होने के कारण ट्रेन में बैठने के बाद मां हर घंटे उसको फोन करती है कि बेटा कहां पहुंचे. मां हर घंटे बेटे का हाल पूछती रहती है. फिर मां पूछती है कि गुजरात आया कि नहीं आया. फिर जैसे ही बेटा बताता है कि अब ट्रेन गुजरात में पहुंच गई है. तो मां कहती है बस बेटा अब मैं सो जाती हूं. गुजरात में तुम्हारी ट्रेन पहुंच गई, मतलब अब तुम सलामत हो.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये बात 2014 में लोकसभा के लिए प्रचार करते हुए गोरखपुर में कही थी.

रैली संबोधित करते पीएम मोदी.

ये बयान सही भी था. गुजरात वाकेयी सुरक्षित था. इसीलिए यहां यूपी, बिहार से मजदूर काम करने के लिए पूरे मन से जाते थे. काफी सालों से. उन्हें भरोसा था कि जैसे महाराष्ट्र में यूपी-बिहार वालों पर हमले हुए, वैसा यहां कुछ नहीं होगा. पर ये भरोसा टूट गया है. अब गुजरात सुरक्षित नहीं है. यहां उत्तर भारत से गए लोगों को अब चुन-चुन कर मारा जा रहा है. फैक्ट्रियों में काम कर रहे मजदूरों पर दफ्तर में जाकर भीड़ हमला कर रही है. और इसके लिए नरेंद्र मोदी कतई जिम्मेदार नहीं है. वो होंगे भी क्यो, वो अब गुजरात नहीं चलाते हैं. जिम्मेदार है गुजरात के लोग. बल्कि गुजरात के लोग भी नहीं. जिम्मेदार हैं गुजरात के वो लोग जो ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं. ये गुजरात की छवि खराब करने में लगे हैं. छवि कैसे खराब हो रही है. ये दो केस पढ़कर समझिए –

# मैं अहमदाबाद में 22 साल से रह रही हूं. कभी ऐसी कोई घटना नहीं देखी. किसी ने कभी इसलिए निशाना नहीं बनाया कि हम उत्तर भारतीय हैं. यहां हिंदू-मुस्लिम टेंशन जरूर रही है, मगर ऐसा कुछ कभी नहीं देखा. – कृष्णाचंद्रा

# मैं बाइक से जा रहा था. तभी मुझे 6-7 लोगों के एक ग्रुप ने रोका. पूछा – मैं कहां से हूं. मुझे समझ आ गया कि कुछ दिक्कत हो सकती है इसलिए मैंने खुद को राजस्थान का बताया. मुझे उन लोगों ने तभी जाने दिया जब वो कंफर्म हो गए कि मैं यूपी, एमपी और बिहार से नहीं हूं. जाते वक्त मैंने देखा कि उन लड़कों ने पास में ही एक बाइक को आग लगाई थी. –मंजू सिंह

मंजू और कृष्णाचंद्रा दोनों ही इस घटना के बाद वापस अपने प्रदेश लौट गए हैं. और ये दोनों ऐसा करने वाले पहले नहीं है. गुजरात से हजारों उत्तर भारतीय वापस अपने घर लौट गए हैं. इसका कारण है डर. जो इसलिए फैला है क्योंकि अब तक गुजरात के 6 जिलों में उत्तर भारतीयों से मारपीट की घटना के 42 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हो चुके हैं. 342 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. सबसे ज्यादा घटनाएं मेहसाणा इलाके में हो रही हैं. यहां 15 मुकदमे हो चुके हैं. वहीं सबरकांठा में 11 मुकदमे दर्ज हुए हैं. इनके अलावा अहमदाबाद, गांधीनगर, अरावली और सुरेंद्रनगर में भी ऐसी घटनाएं हुई हैं.

गुजरात से लोग अपने घर वापस जा रहे हैं.

क्यों हो रहा हमला?

ये मारने-पीटने की घटनाएं शुरू हुई हैं एक रेप के बाद. एक 14 महीने की बच्ची के साथ रेप के बाद. मामला 28 सितंबर का है. जगह थी अहमदाबाद से 100 किलोमीटर दूर पड़ने वाला सबरकांठा जिला. और रेप के आरोप में जो व्यक्ति गिरफ्तार हुआ, वो बिहार का रहने वाला था. नाम है रवीन्द्र साहू. वो घटनास्थल के पास ही चीनी मिट्टी के एक कारखाने में काम करता था. अब चूंकि आरोपी बिहार से है. सो इस मामले को गुजराती वर्सेज नॉन गुजराती बना दिया गया. और उत्तर भारतीयों पर हमले शुरू हो गए. सोशल मीडिया पर भी उत्तर भारतीयों के खिलाफ नफरत फैलानी वाली तमाम पोस्ट शेयर की जा रही हैं. पुलिस ने ऐसी 70 प्रोफाइलों को तलाशा है, जिन पर कार्रवाई की तैयारी हो रही है.

हमला करने वालों में मेन अल्पेश का संगठन?

उत्तर भारतीयों पर हमले में कुछ लोकल संगठनों के नाम आ रहे हैं. मगर सबसे ज्यादा आगे है ठाकोर सेना. वही ठाकोर सेना जिसके प्रेसिडेंट कांग्रेस एमएलए अल्पेश ठाकोर हैं. विधानसभा चुनाव के वक्त जो युवाओं की तिकड़ी आई थी, उनमें से एक. अल्पेश तब खुद को ओबीसी का नेता बता रहे थे. पर एक जाति का झंडा उठाए रहने से शायद उनका पेट नहीं भरा. इसलिए अल्पेश अब क्षेत्रवाद का जहर बोने का काम कर रहे हैं. उनके संगठन ठाकुर सेना पर आरोप है कि 2 अक्टूबर को उसके करीब 200 लोगों ने मेहसाणा के वडनगर के पास एक फैक्ट्री पर हमला कर दिया, जिसमें 2 कामगार बुरी तरह घायल हो गए. ताज्जुब की बात ये है इन्हीं अल्पेश को कांग्रेस ने बिहार का सह प्रभारी भी बनाया हुआ है. और खुद इनका संगठन बिहारियों को निशाना बना रहा है.

राहुल गांधी के साथ अल्पेश ठाकोर.

अब इस हमले में जो लोग गिरफ्तार हुए हैं, अल्पेश ठाकोर उनको छोड़ने और उनके खिलाफ लिखे मुकदमे वापस लेने की मांग कर रहे हैं. उनका यही नहीं पेट भरा खुद को गुजरात का राज ठाकरे बनाने के चक्कर में उन्होंने लगे हाथ एक और मांग उठा दी. बोले – नौकरियों में गुजरातियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. उनका मानना है कि कम्पनियां 80 फीसदी गुजरातियों को नौकरी देने का वादा पूरा नहीं कर रही हैं. जिसे सरकार को लागू कराना चाहिए. अल्पेश ने सरकार को ये भी चैलेंज किया है कि अगर उनके समर्थकों के खिलाफ दर्ज किये गये केस वापस नहीं लिए तो वह 11 अक्टूबर से ‘सद्भावना’ उपवास करेंगे.

डीजीपी बोले- त्योहार है इसलिए वापस जा रहे लोग

मारपीट की घटनाओं के बाद डर का आलम ये है कि यूपी, बिहार और एमपी के लोग वापस अपने घर लौटने लगे हैं. गुजरात के बस अड्डों पर घर वापस जाते लोगों की भीड़ देखी जा सकती है. लोगों का कहना है कि उनको रोक-रोककर पूछा जा रहा है कि वो कहां से हैं. अगर गुजराती न बोलनी आती हो तो पिटना तय है. मकान मालिक घर खाली करने का दबाव बना रहे हैं. हालांकि गुजरात के डीजीपी शिवानंद झा का कुछ अलग ही मानना है. वो बोले कि ये त्योहारी सीजन है. नवरात्रि, दिवाली और छठ करीब है. इसलिए लोग वापस जा रहे हैं. कोई डर का माहौल नहीं है. अब सवाल उठता है कि अगर इतनी ही शांति है तो वो राज्य रिजर्व पुलिस (सीआरपी) की 17 कंपनियों को क्यों तैनात कर रहे हैं.

निरूपम ने तो मोदी को ही धमका दिया

कांग्रेस नेता संजय निरूपम भी इस मुद्दे में कूद गए हैं. प्रधानमंत्री को घेरा है. बयान दिया है कि प्रधानमंत्री के गृह राज्य में अगर यूपी, बिहार, MP के लोगों को मारकर भगाया जा रहा है, तो एक दिन पीएम को भी वाराणसी जाना है. इसे याद रखना. वाराणसी के लोगों ने उन्हें गले लगाया था और प्रधानमंत्री बनाया था.

बाहरियों को निशाना बनाने का इतिहास पुराना है

# महाराष्ट्र का रायता तो सब जानते हैं. कैसे 2008 में राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने उत्तर भारतीयों का जीना मुश्किल कर दिया था. इससे पहले इनके पापा संगठन शिवसेना ने भी महाराष्ट्र वर्सेज बाहरी का आंदोलन लंबे समय से चलाया हुआ है. मराठी मानुष का नारा उन्हीं ने दिया. जब राज ठाकरे ने ये बवाल मचा रखा था तब बाल ठाकरे ने अपने एक एडिटोरियल में लिखा था- एक बिहारी, सौ बीमारी. इससे पहले 1966 में उनका दक्षिण भारतीयों के खिलाफ चलाया गया आंदोलन तो मशहूर है ही. जब ठाकरे ने ‘बजाओ पुंगी, भगाओ लुंगी’ का नारा दिया. इसके बाद तमिल मजदूरों पर हमले होने लगे और उन्हें मुंबई छोड़कर जाना पड़ा.

राज ठाकरे, बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे (बाएं से दाएं)

# इसी तरह से देश का आईटी सिटी माना जाने वाला बेंगलुरु शहर भी नॉर्थ ईस्ट के लोगों पर हमले की वजह से चर्चा में रहा है. कर्नाटक में दिल्ली और हरियाणा के बाद नॉर्थ ईस्ट के लोगों पर सबसे ज्यादा 22 हमले की घटनाएं हुई हैं. 2014 से 2016 के बीच. 2012 में तो एक बार ऐसा डर का माहौल बन गया था कि हजारों नॉर्थ ईस्ट के लोग वापस अपने घर जाने लगे थे

https://www.thelallantop.com/news/why-people-of-up-bihar-and-mp-are-leaving-gujarat/

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