वेदों में निषेध है बलि एवं मांसाहार :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

11 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (44 बार पढ़ा जा चुका है)

वेदों में निषेध है बलि एवं मांसाहार :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि के प्रारम्भ में विराट पुरुष से वेदों का प्रदुर्भाव हुआ | वेदों ने मानव के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है | जीवन के प्रत्येक अंगों का प्रतिपादन वेदों में किया गया है | मानव जीवन पर वेदों का इतना प्रभाव था कि एक युग को वैदिक युग कहा गया | परंतु वेदों में वर्णित श्लोकों का अर्थ न निकालकर कर के कुछ लोगों ने अनर्थ निकाल दिया | वेदों का सबसे विवादित विषय रहा है कि क्या वेदों में मांसाहार एवं बलि देने का निर्देश दिया गया है ?? जी नहीं ! सनातन का आधार माने जाने वाले वेदों में इन कार्यों का सर्वथा निषेध किया गया है , परंतु मध्यकालीन विद्वानों (वामपंथ के आचार्य सायण एवं महीधर एवं पाश्चात्य विद्वान मैक्समुलर आदि ) ने सनातन वेदों को बदनाम करने के लिए उनकी ऋचाओं के अनर्थ निकाले | विचार कीजिए जिन वेदों में यज्ञों के माध्यम से परमात्मा को प्राप्त करने का निर्देश दिया गया है उन वेदों में मांसाहार एवं बलिप्रथा का वर्णन कदापि नहीं हो सकता | यज्ञ में पशुबलि का विधान मध्यकाल की देन है | प्राचीनकाल में यज्ञों में पशुबलि आदि प्रचलित नहीं थे | मध्यकाल में जब गिरावट का दौर आया तब मांसाहार, शराब आदि का प्रयोग प्रचलित हो गया | सायण, महीधर आदि के वेद भाष्य में मांसाहार, हवन में पशुबलि, गाय, अश्व, बैल आदि का वध करने की अनुमति थी जिसे देखकर मैक्समुलर, विल्सन , ग्रिफ्फिथ आदि पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों से मांसाहार का भरपूर प्रचार कर न केवल पवित्र वेदों को कलंकित किया अपितु लाखों निर्दोष प्राणियों को मरवाकर मनुष्य जाति को पापी बना दिया | इन विद्वानों ने जो भाष्य लिखे उनमें अपने अनुसार अर्थ का अनर्थ करके मानवमात्र के समक्ष प्रस्तुत करके भ्रांतियां फैलाईं |* *आज के आधुनिक युग में जहाँ सनातन विरोधियों ने वेदों के इन्हीं भाष्यों का अवलम्ब लेकर सनातन की छवि धूमिल करने का कार्य कर रहे हैं वहीं हमारे कुछ विद्वान भी इसी भ्रम में पड़कर वास्तविकता को जाने बिना ऐसे उपदेश देने से नहीं हिचकते | आज लोग वेदों में वर्णित अश्वमेध , गोमेध , नरमेध अजमेध आदिक यज्ञानुष्ठानों का अर्थ अश्वों , गायों , मनुष्यों आदि की बलि से निकालते हैं | ऐसे सभी विद्वानों को मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बता देना चाहता हूँ कि सर्वप्रथम हमें किसी भी शब्द की गहराई में जाकर ही उसका अर्थ निकालना चाहिए | मेध शब्द का अर्थ केवल हिंसा नहीं है | मेध शब्द के तीन अर्थ हैं- १- मेधा अथवा शुद्ध बुद्धि को बढ़ाना, २- लोगों में एकता अथवा प्रेम को बढ़ाना, ३- हिंसा | इसलिए मेध से केवल हिंसा शब्द का अर्थ ग्रहण करना उचित नहीं है | जब यज्ञ को अध्वर अर्थात ‘हिंसारहित' कहा गया है तो उसके संदर्भ में ‘मेध' का अर्थ हिंसा क्यों लिया जाए ?? बुद्धिमान व्यक्ति ‘मेधावी' कहे जाते हैं और इसी तरह लड़कियों का नाम मेधा, सुमेधा इत्यादि रखा जाता है, तो क्या ये नाम क्या उनके हिंसक होने के कारण रखे जाते हैं ? या बुद्धिमान होने के कारण ? कहने का तात्पर्य यह है कि अर्थ को अनर्थ न करते हुए मनुष्य मात्र को इसकी गहराई में उतरने का प्रयास करना चाहिए |* *वेदों को समझना इतना आसान नहीं है ! वेदों के किसी भी श्लोक में मांसाहार , बलि एवं हिंसा का निर्देश यदि किसी को मिले तो वह प्रेषित अवश्य करे |*

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