कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है

12 अक्तूबर 2018   |  Shashi Gupta   (70 बार पढ़ा जा चुका है)

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है  - शब्द (shabd.in)

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है..

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पुरुष समाज में से कितनों ने अपनी अर्धांगिनी में देवी शक्ति को ढ़ूंढने का प्रयास किया अथवा उसे हृदय से बराबरी का सम्मान दिया..? शिव ने अर्धनारीश्वर होना इसलिये तो स्वीकार किया। पुरुष का पराक्रम और नारी का हृदय यह किसी कम्प्यूटर के हार्डवेयर और साफ्टवेयर की तरह ही तो है। एक दूसरे से है, इनका अस्तित्व।

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हे आयो आयो नवरात्री त्यौहार ओ आंबे मैय्या

तेरी जय जयकार हो आंबे मैय्या तेरी जय जयकार...


बचपन में नवरात्र पर्व पर जैसे ही यह भक्ति गीत बजता था, पूछे मत मैं खुशी से किस तरह से चहक उठता था। टाउनहाल, वाराणसी में दुर्गापूजा पर खूब सजावट और पूरे नौ दिनों तक देश भर से सुविख्यात कथा वाचकों का आगमन होता था यहाँ। हमारे घर के पड़ोस में एक लाउडस्पीकर पूजास्थल का हर वर्ष लगता था। सुबह देवी गीत और शाम को विभिन्न धर्मग्रंथों पर कथा सम्वाद। मेरी अवस्था 10 वर्ष रही होगी तब , क्यों कि 12 वर्ष पूरा होने से पहले कोलकाता ही चला गया था। लेकिन ,जैसे ही दुर्गा प्रतिमा को विसर्जन के लिये गाड़ी पर रखा जाता था, मेरी विकलता बढ़ जाती थी। मेरा बाल मन समझ नहीं पाता था कि क्यों गंगा जी ले जा रहे हैं ये दुर्गा मैय्या को , अभी तक तो सब पूजा पाठ कर रहे थें, अब पराया सा यह व्यवहार क्यों..

वियोग से मुझे बचपन से ही भय लगता था। माँ - बाबा जब भी वापस कोलकाता जाने को ट्रेन पर बैठते थें, माँ को बिल्कुल भी मैं नहींं छोड़ता था। जबर्दस्ती मुझे उनसे अलग किया जाता था। लेकिन, कोलकाता का दूर्गा पूजा चकाचौंध से भरा रहा । बनारस में एक गरीब शिक्षक का पुत्र था, तो कोलकाता में माँ का दुलारा मुनिया.. और बाबा चाँद - तारा तक तोड़ लाने को तत्पर रहते थें। फिर आज से करीब ढ़ाई दशक पूर्व वह दिन आया जब किसी नाते -रिश्तेदार के यहाँ शरण न लेने की ठान सान्ध्य दैनिक गांडीव समाचार पत्र हाथ में ले एक अनजान शहर मीरजापुर आ गया। पेट की असहनीय भूख ने मुझे राजा मुन्ना से ऐसा विचित्र श्रमिक बना दिया था कि एक पांव बनारस में था, तो दूसरा मीरजापुर में...

याद आ रहा कि मैं जब मीरजापुर आ रहा था , तभी किसी अपने ने टोका था कि देखों वहाँ जा कर दो कार्य निश्चित करना एक विंध्याचल देवी का दर्शन और दूसरा सदैव मखाना खाते रहना, क्योंं कि तुमने कभी श्रम इस तरह का किया नहीं है। पर मेरे पास विंध्याचल मंदिर जाने का समय कहाँ था, बनारस पहुँचने में ही रात्रि के 11-12 बज जाते थें । हाँ , सत्य तो यह भी है कि माँ के जाने के बाद , फिर किसी उपासना स्थल पर मुझे शांति की अनुभूति नहीं होती है। रही

मखाना खाने की बात , तो वह मुझे पसंद नहीं था। वहाँ ,कोलकाता में तो मेरे लिये काजू बर्फी और मेवा खिलाने के लिये माँ मुझे कितना मनाती-फुसलाती थी।

इन्हीं स्मृतियों में आज नवरात्र के प्रथम दिन सुबह सड़कों पर देवी भक्तों कों देख खोया सा था कि घंटाघर स्थित एक हलवाई की दुकान पर कचौड़ी की सब्जी छौंकने की सुगंध ने अचानक मुझे जागृत कर दिया। मैंने भी देर न करते हुये अपने मन से पूछ ही लिया कि मित्र क्या चलेगा..गरमा गरम हैं। शाम का कटोरा भर दलिया ही तो खाये हो। अब तो रोटी भी ना ले रहे हो। मैंने सोचा कि मन टटोल लूं उसका भी.. कहीं यह न कहे कि भूखे मार रहा है । परंतु प्रति उत्तर जान संतोष हुआ, जब उसने कह दिया कि नहीं भाई चल कर दलिया और मूंग की खिचड़ी बनाई जाए...


खुशहाल परिवार का एक सूत्र है कि अपनों की पसंद और नापसंद का ध्यान रखा जाए। विशेषकर मनमीत को लेकर ...


जो तुमको हो पसंद, वही बात करेंगे

तुम दिन को अगर रात कहो, रात कगेंगे

चाहेंगे, निभाएंगे, सराहेंगे आप ही को

आँखों में दम है जब तक, देखेंगे आप ही को

अपनी ज़ुबान से आपके जज़बात कहेंगे ...


यह मेरा पसंदीदा गीत है और मेरी सोच भी, यदि पुरुष को मुखिया होने का दर्प रहेगा, तो उसकी बगिया में वह सुंगधित पुष्प कभी नहींं खिलेगा, जिससे गृहस्थ जीवन का आनंद लाभ वह उठा सके। ऐसे में परिवार का हर सदस्य सहमा सा रहेगा , फिर एक दिन सब कुछ बिखर जाता है... नहीं मिलता वह मधु कलश , जिसकी तलाश हर बागवान को होती है। जिसका मिसाल मैं स्वयं हूँ, परिवार के सभी सदस्यों के हिस्से में विष ही आता है, ऐसी परिस्थितियों में.. किसी को कम तो किसी को ज्यादा... दोषारोपण करने में ही फिर गुजर जाता है, यह अमूल्य जीवन..

इसी वार्तालाप के क्रम में मेरे भावुक मन ने प्रश्न कर ही दिया ... मित्र ! इस तपोभूमि विंध्य क्षेत्र के समीप रहकर तूने क्या पाया - क्या खोया...?

पारिवारिक संबंधों और स्वास्थ्य सभी तो खो दिया है तुमने .. भोजन की थाली की जगह एक कटोरा भर रह गया है। जिसमें सुबह और शाम दलिया एवं मूंग की खिंचड़ी खाते हो। फिर भी जीवन के इस कुरुक्षेत्र में अभिमन्यु की तरह आठवें द्वार पर आ फंसे हो। जितनी भी नकारात्मक शक्तियाँ हैं, चक्रव्यूह रच घेरे हुये है तुम्हें.. कहीं विजय के पूर्व ही मृत्यु का चयन तो न कर लोगे या अर्जुन की तरह गांडीव की टंकार कर ऐसी नकारात्मक चिन्तन का प्रतिकार करोगे..?

इस तपोस्थली विंध्य क्षेत्र से तुम क्या लेकर प्रस्थान करोंगे। एक विचित्र सी व्याकुलता इस शक्ति साधना पर्व पर मेरे मन में बनी हुई है। कहाँ- कहाँ से लाखों लोग जिनमें संत से लेकर भिक्षुक तक हैं, यहाँ आये हुये हैं। लेकिन, मेरा एक प्रश्न है महामाया के दरबार में आये इस पुरुष समाज से कि इनमें से कितनों ने अपनी अर्धांगिनी में देवी शक्ति को ढ़ूंढने का प्रयास किया अथवा उसे हृदय से बराबरी का सम्मान दिया..? शिव ने अर्धनारीश्वर होना इसलिये तो स्वीकार किया। पुरुष का पराक्रम और नारी का हृदय यह किसी कम्प्यूटर के हार्डवेयर और साफ्टवेयर की तरह ही तो है। एक दूसरे से है, इनका अस्तित्व।

एक सवाल और जो भद्रजन यहाँ आये हैं , वे कन्या भ्रूण हत्या रोकने को लेकर कितने सजग हैं ..?

वैसे मैं तो अपनी माँ से ही सब-कुछ मांगता था, हूँ और रहूँगा। उनका सम्पूर्ण वात्सल्य सिर्फ मेरे लिये ही था , आज भी उनके साथ गुजरे हुये दिन ही मुझे धैर्य प्रदान करता है। अन्यथा प्रेम से वंचित यह पथिक जीवन के इस लम्बे सफर में गिरता, फिसलता, उलझता और सम्हलता ही रह गया है।

जल से निकली उस मीन की तरह हूँ मैं , जो किसी के स्नेह वर्षा से श्वास भर ले रही है, परंतु सत्य तो यही है कि न तो अब उसके लिये जल है ,न ही जीवन...

फिर भी धड़कन तो है न .. ? हृदय का यह स्पंदन बेचैन कर देता है कभी- कभी...


कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है

के जैसे तू मुझे चाहेगी उम्रभर यूही

उठेगी मेरी तरफ प्यार की नजर यूं ही

मैं जानता हूँ के तू गैर है मगर यूं ही...

अगला लेख: जब किसी से गिला रखना



कामिनी सिन्हा
15 अक्तूबर 2018

आप सवाल उचित है .ये पूर्णतः सत्य है की हमारे समाज में दोहरी निति हमेशा से चलती आई है .एक तरफ औरत को देवी के रूप में माँ के रूप में पूजते है और दूसरी तरफ उसका ही निरादर करते है कभी बेटी के रूप में गर्भ में ही मर डालते है तो कभी पत्नी के रूप में उसे अर्धागिनी ना समझ उसपर सिर्फ अपना अधिकार समझते है तो कभी माँ के रूप में उन्हें बृद्धाआश्रम में शरण देते है . सादर नमन

Shashi Gupta
15 अक्तूबर 2018

आभार आपका

रेणु
12 अक्तूबर 2018

प्रिय शशि भाई -- जीवन के संघर्षों से गुजर कर आपने जो अभिमन्यु सरीखी फितरत पायी है वह बड़े बड़े कर्मयोगियों में भी नहीं पायी जाती |माँ की यादों की छाव में विकल मन की अनंत जीवटता बहुत ही प्रेरक है | अपनी पीड़ा को भीतर दबाकर जीना आसान नहीं | फिर भी आपने बहादुरी से जीवन का मोर्चा संभाल रखा है | आपने बहुत ही उचित प्रश्न किया है -- देवीदर्शन को आतुर पुरुष समाज के साथ महिला समाज से ये प्रश्न करना ही चाहिए कि उन्होंने घर की नारियों और बेटियों को कितना सही स्थान दिया है | यदि उन्होंने किसी भी रूप में अर्धांगिनी और बिटिया से तनिक भी अन्याय किया है तो उन्हें देवी पूजन , वन्दन का कोई अधिकार नही | और हर समय मौत का चिंतन उचित नही | ईश्वर ने जितनी सांसे दी है उन्हें इस चिंतन को भूल स्वीकार कर जियें |जो लोग पुर्णतः स्वस्थ हैं उनका दाना पानी भी पल भर में उठ जाता है दुनिया से | बस खुश रहने की कोशिश करें | भले ये आसान भी नहीं किसी भी तरह से | बेहतरीन लेख मन को छूता हुआ हमेशा की तरह | सस्नेह --

Shashi Gupta
12 अक्तूबर 2018

जी दी आभार आपका मार्गदर्शन के लिये

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