नारियों को नहीं रखने चाहिए खुले बाल :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

13 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (85 बार पढ़ा जा चुका है)

नारियों को नहीं रखने चाहिए खुले बाल :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*नवरात्र के पावन पर्व पर आदिशक्ति भगवती दुर्गा के पूजन का महोत्सव शहरों से लेकर गाँव की गलियों तक मनाया जा रहा है | जगह - जगह पांडाल लगाकर मातारानी का पूजन करके नारीशक्ति की महत्ता का दर्शन किया जाता है | माता जगदम्बा के अनेक रूप हैं , कहीं ये दुर्गा तो कहीं काली के रूप में पूजी जाती हैं | जहाँ दुर्गा जी स्वरूप महिषासुर का वध करते हुए भी सौम्य एवं मनमोहक दिखाई पड़ता है वहीं महाकाली का वीभत्स स्वरूप भक्तजन देखते हैं | दुर्गा जी की मूर्ति प्राय: प्रत्येक घर में प्राप्त हो सकती है परंतु काली जी का स्थान प्राय: तंत्रसाधकों के साधनास्थल पर या फिर गाँव के बाहर किसी नीम के छाँव में मिलता है | इस तथ्य पर विचार किया जाय तो यही प्राप्त होता है कि जहाँ दुर्गा जी सभी श्रृंगारों से से युक्त होती हैं वहीं महाकाली का बिना श्रृंगार के खुले बालों के साथ दर्शन होता है | हमारे शास्त्रों ने महिलाओं के खुले बाल को विनाशक एवं दुर्भाग्य को निमंत्रण देने वाला बताया गया है | स्त्रियों को बालों का बांधकर रखना चाहिए, इनको खोलकर रखना अशुभ होता है | स्त्रियों के बालों से जुड़ी अनेक मान्यताएं हैं, जिन्हें आज लोग अंधविश्वास मानते हैं | केश महिलाओं का श्रृंगार होते हैं जो उनको भव्यता प्रदान करते हैं | इसीलिए पहले महिलाएं किसी विशेष अवसर पर ही बाल खोलती थीं, अधिकतर उन्हें बांध कर रखा जाता था क्योंकि खुले बाल रखना शोक की निशानी माना जाता है | द्रौपदी के खुले बालों की कथा लगभग सभी जानते हैं जिन्होंने महाभारत जैसे विनाशक युद्ध की पटकथा तैयार कर दी | अत: स्त्रियों को सदैव अपने बाल बाँधकर रखना चाहिए अन्यथा खुले बाल दुर्भाग्य को निमंत्रण देने वाले ही होते हैं |* *आज आधुनिकता के परिवेश में लगभग सभी लोग प्राचीन मान्यताओं से किनारा कर रहे हैं | जहाँ नारियों के बंधे बाल उनके आकर्षण को बढाते थे वहीं आज के फैशन में बाल खुले ही रखने का चलन सा होता जा रहा है | प्राचीन मान्यताओं को अंधविश्वास बता करके आज का समाज अपने अनुसार नियम बनाता है और उसी नियम पर चलता है | आज समाज में जिस प्रकार व्यभिचार फैला है लोग अंधे से होते जा रहे हैं ऐसे समय में नारियों को प्राचीन मान्यताओं को आत्मसात करते हुए ही चलना चाहिए | आज प्राय: ९९% नारियाँ बालों को खोलकर यत्र तत्र भ्रमण करती दिखाई पड़ती हैं | यदि किसी संस्कारवान परिवार की बेटी का विवाह आधुनिक परिवार में हो जाता है तो उसके पति को अपनी पत्नी के बंधे बाल नहीं भाते और विवशता में बेचारी को बाल खुले ही संवारकर पार्टियों में जाना पड़ता है | हो सकता है कि कुछ लोग मेरी बात को न पचा सकें परंतु मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का कहना है कि यदि सनातन धर्म में किसी बात को वर्जित किया गया है तो उसमें वैज्ञानिक कारण भी निहित है , क्योंकि सनातन धर्म की मान्यतायें वैज्ञानिकता से ओतप्रोत हैं | किसी भी मान्यता को मानने की जितनी जिम्मेदारी नारी की है उससे अधिक पुरुष की भी है | पुरानी मान्यताओं से किनारा करके मनुष्य सुखी भी नहीं है | जिस माँ को अपनी बच्चियों को शिक्षा देनी चाहिए वह स्वयं बालों को खुले रखकर पारिवारिक कलह एवं दुर्भाग्य को निमंत्रण दे रही है |जब खुले बालों के कारण महाकाली का स्थान गाँव बाहर निश्चित कर दिया गया है तो साधारण मनुष्य को इस पर विचार अवश्य करना चाहिए |* *नारियों को सदैव बालों को बाँधकर ही रखना चाहिए ! जिससे कि जीवन में समरसता , सौभाग्य की अभिवृद्धि निरंतर होती रहे |*

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