गज़ल

14 अक्तूबर 2018   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (39 बार पढ़ा जा चुका है)

किसी की शान में झूठे क़सीदे मत पढो,
लड़ाएंगे तुम्हें आपस में हरगिज़ मत लड़ो।

चलो तो यूँ चलो की रास्ते भी राह दें,
झुकाओ आसमानों को सँभल के मत डरो।

अधिकतर भेड़िये खद्दर पहन कर आये हैं,
शिकारी कूकरों के जाल में तुम मत फंसो।

फंसी गुमराहियों के दौर में क़ाबिल जवानी,
संवारो तुम इन्हें अपना-पराया मत करो।

भुला दो तल्खियां शिक़वे-गिले भी भूल जा,
समय को आज़माने की अभी ज़िद मत करो।

पलट कर आएगी ताज़ा हवाओं की लहर,
खुले रखना झरोखे बन्द दर-घर मत करो।

बना 'अनुराग' दुनिया में मुहब्बत के लिए,
मगर तुम बेवजह रंजिश अदावत मत करो।
***
'अनुराग'

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