घुला है ज़हर

15 अक्तूबर 2018   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (51 बार पढ़ा जा चुका है)

घुला है ज़हर नदियों में तो पावनता कहाँ ढूंढूं,
लगी है आग घर-घर में तो शीतलता कहाँ ढूंढूं।

सुना है भूख की लोरी सुनी फिर सो गए बच्चे,
बहुत मजबूर है मैया मेंरी ममता कहाँ ढूंढूं।

उड़ाए बोझ सपनों का खड़े बाज़ार में बच्चे,
मैं बचपन की शरारत और चंचलता कहाँ ढूंढूं।

यहाँ हर आदमीं मगरूर या वहशी नज़र आये,
सभी के हाथ में खंज़र मैं मानवता कहाँ ढूंढूं।

मनुजता हो गई घायल सभी नफरत उगाते हैं,
निलय पत्थर हृदय पत्थर है कोमलता कहाँ ढूंढूं।

फ़क़त ये स्वछता केवल दिखावा आवरण सा है,
विचारों में प्रदूषण है तो निर्मलता कहाँ ढूंढूं।

बदल लें कब हवाएं रुख पता चलता नहीं यारो,
वो महकी ताज़गी विधुत की तत्परता कहाँ ढूंढूं।
***
'अनुराग'

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