जीवन का आधार है माँ :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

15 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (110 बार पढ़ा जा चुका है)

जीवन का आधार है माँ :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*नवरात्र के पाँचवे दिन स्कन्दमाता का पूजन किया जाता है ! कार्तिक कुमार का एक नाम स्कंद भी है इसीलिए भगवती को "स्कन्दमाता" कहा गया है | माता शब्द ऐसा है जिसका वर्णन कर शायद किसी के वश की बात नहीं है | मानव जीवन में माता का सर्वोच्च स्थान है | जीव के गर्भ में आते ही एक माता उसके प्रति कर्तव्य प्रारम्भ हो जाता है | गर्भ में पल रहे बच्चे के प्रति माता सजग हो जाती है और गर्भ में बालक को पौष्टिकता प्रदान करने के लिए अनुकूल आहार का सेवन प्रारम्भ कर देती है | मनुष्य के सम्पूर्ण जीवनकाल में वैसे तो अनेक गुरु / सद्गुरु मिलते हैं परंतु प्रथम गुरु होने का सौभाग्य माँ को ही प्राप्त होता है | जन्म लेने के बाद अनवरत पाँच वर्षों तक बालक सबसे ज्यादा अपनी माँ के निकट रहता है , इन्हीं पाँच वर्षों में माँ का कर्तव्य होता है कि वह बच्चों में संस्कारों की नींव डाल दे | हमारे देश के इतिहास में यदि महापुरुषों ने कीर्तिमान स्थापित किये हैं तो उनके पीछे माँ के द्वारा प्रदत्त संस्कारों का विशेष स्थान रहा है | माता कौशल्या , मदालसा एवं सुमित्रा के चरित्रों को भुलाया नहीं जा सकता , जिन्होंने अपने पुत्रों में संस्कारों का ऐसा आरोपण किया था कि उनके पुत्र तो अमर हो ही गये साथ ही इन दिव्य माताओं का नाम भी स्वर्णाक्षरों में लिख गया | जीवन में माँ का वह स्थान है कि माँ चाहे तो अपने बालक को राम बना दे चाहे रावण | महाराज उत्तानपाद की बड़ी महारानी सुनीति ने विमाता के द्वारा दुत्कारे गये अपने पाँच वर्षीय पुत्र को "बालक ध्रुव" को ऐसी शिक्षा दी कि वह सीधे परमपिता परमात्मा की गोद में बैठने का अवसर पाकर ध्रुवलोक का अधिकारी हो गया | मानव जीवन की आधारशिला माँ के द्वारा ही रखी जाती है |* *आज जिस प्रकार सारे संसार को आधुनिकता ने अपने शिकंजे पर जकड़ लिया है इस आधुनिकता से आज की माँ भी नहीं बच पाई है | आज व्यस्ततम जीवनशैली के चलते एक माँ अपने ही बालक को समय नहीं दे पाती है | जिसका परिणाम आज देखने को मिल रहा है | यह सबके लिए तो नहीं कहा जा सकता परंतु अधिकतर यह देखने को मिल रहा है कि आज की मातायें शारीरिक सौंदर्य बिगड़ जाने के भय से अपने बच्चों को स्तनपान तक नहीं कराती हैं | महानगरों में जन्म लेने के बाद से ही माँ की कार्यालयीय व्यस्तताओं के चलते बच्चा आयाओं के भरोसे हो जाता है | बच्चे का पालन तो किसी तरह हो जाता है परंतु वह बच्चा माँ की ममता , वात्सल्य , एवं संस्कारों से वंचित होकरके कुंठित मानसिकता का शिकार हो जाता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह देख रहा हूँ कि आज के इंटरनेट ने भी माताओं को बच्चों से दूर करने में सहयोग प्रदान किया है | बालक भूख से रो रहा है , वह चाहता है कि माँ अपने हाथों से भोजन करा दे , परंतु माँ अतिव्यस्तता के कारण घर में काम कर रही आया को बच्चे को भोजन कराने का आदेश देकर पुन: व्यस्त हो जाती है | आज जब माँ का यह व्यवहार अपने बच्चे के बचपन के साथ होता है तो बच्चा भी बचपन में इनके प्यार से वंचित हो के बड़ा होकर अपने माता पिता से अजनबियों की तरह व्यवहार करता है | विचार कीजिए कि जब बच्चे ने माँ का दुग्धपान ही नहीं किया होता है तो उसके हृदय में माँ के लिए प्रेम एवं अपनत्व भला कैसे हो सकता है | आज अपने बच्चों की शिकायत कपने वाली आधुनिक माताओं को आत्ममंथन की आवश्यकता है कि आखिर उनसे भूल कहाँ हो रही है |* *मनुष्य के जीवन की आधार है माँ | माँ के चरित्र का बालक विशेषकर पुत्रियों के जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ता है | अत: माताओं को अपने बच्चों के समक्ष उचित व्यवहार का प्रदर्शन करना चाहिए |*

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रेणु
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सारगर्भित लेख आदरणीय आचार्य जी -- जय माँ !!!!

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