करती रही दुनिया

17 अक्तूबर 2018   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (46 बार पढ़ा जा चुका है)

करती रही दुनिया

लकीरों के फकीरों को नमन करती रही दुनिया,
हुनर की आहुति देकर हवन करती रही दुनिया।

शतानन हो गया है अब दशानन हर किसी में है,
अभी तक कौन सा रावण दहन करती रही दुनिया।

अभी तक भर रहा हूँ आपके खोदे हुए गड्ढ़े,
वतन को बेचकर जो घर चमन करती रही दुनिया।

दिलासा कैसे दूँ दिल को मेरे अपने ही क़ातिल हैं,
हमेशा राम का ही वन गमन करती रही दुनिया।

तिज़ारत की सनक में आप ने क्या कुछ नहीं बेचा,
लगा कर मोल रिश्तों का दमन करती रही दुनिया।

सलीबों पर लटकती ज़िन्दगी देखो ज़रा तुम भी,
दिखा कर खौफ़ साँसों को रहन करती रही दुनिया।

सिकन्दर और बाबर की नस्ल मौज़ूद है अब भी,
मुझे मालूम है क्या-क्या गबन करती रही दुनिया।

महल हम भी बना लेते अगर तुम नीव रख जाते,
मिटाने के लिए सौ-सौ जतन करती रही दुनिया।

पलट कर आएंगी'अनुराग'शायद आँधियाँ फिर से,
हवाओं की शरारत क्यों सहन करती रही दुनिया।
***
'अनुराग '

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