दर्द-ए-महफिल सजा,अपने जख्मों को ताजा करती रही ा

18 अक्तूबर 2018   |  आयेशा मेहता   (84 बार पढ़ा जा चुका है)

दर्द-ए-महफिल सजा,अपने जख्मों को ताजा करती रही ा  - शब्द (shabd.in)

दर्द-ए-महफिल सजा,अपने जख्मों को ताजा करती रही ,

किसी बेचैन दिल को नगमा सुना,मैं रोज मरहम बनती रही

अंदर-ही-अंदर जो टूटता रहा,वही नज्म मैं गुनगुनाती रही,

नम आँखों के दर्द को समझे न मेरा महबूब ,

अपने यार की दीवानी कह ,दुनिया वाह! वाह! करती रही



साथ रहकर भी वर्षों ,मोहब्बत होती नहीं दिल से ,

पहली नज़र देखी थी उसको ,

सिवाय उसके मोहब्बत हुई नहीं किसी से ,

ये इश्क भी कमाल की चीज़ होती है ,

जिसे पा न सके कभी,बेपनाह इश्क हो जाता है उसी सेा



है आँखों में दर्द इतना,बह जाए तो सैलाब आ जायेगा ,

जुबान से जो उसे पुकार लूँ,पूरा कायनात काँप जायेगा ,

खामोश हूँ क्योंकि ,परवाह करती हूँ मैं उसकी ,

उसके नाम से गर मेरा नाम जुड़ जाएं तो ,

इश्क की बदनाम गली में बेबजह वो बदनाम हो जायेगा

अगला लेख: दिल मेरा एक मंदिर है ,इसकी पुजा हो तुम



रेणु
19 अक्तूबर 2018

खामोश हूँ क्योंकि ,परवाह करती हूँ मैं उसकी ,
सके नाम से गर मेरा नाम जुड़ जाएं तो ,
श्क की बदनाम गली में बेबजह वो बदनाम हो जायेगा -- प्रिय आयेशा -- प्रेम के चरमोत्कर्ष को छूती ये रचना बहुत ही मर्मस्पर्शी है | छोटी सी उम्र में इस तरह का मार्मिक लेखन अपने आप में एक मिसाल है | लिखती रहो माँ सरस्वती अपनी कृपा आप पर बनाये रखे | मेरा प्यार |

आयेशा मेहता
03 जनवरी 2019

इस प्यार और आशीर्वाद का हमेशा मैं आभारी रहूंगी रेणु मैम

कामिनी सिन्हा
19 अक्तूबर 2018

कितनी मार्मिक रचना है ,आप को ढेर सारा प्यार

आयेशा मेहता
03 जनवरी 2019

आप हमेशा मेरा उत्साह बढाती हैं कामिनी जी ा इसी तरह अपना आशीर्वाद मेरे ऊपर बनाये रहिएगा मैम

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