मेरे ही अंदर का उजड़ा हुआ बाग निकला

19 अक्तूबर 2018   |  आयेशा मेहता   (56 बार पढ़ा जा चुका है)

मेरे ही अंदर का उजड़ा हुआ बाग निकला  - शब्द (shabd.in)

मैं अपने कमरे में बैठी हुई ,

खिड़की से बाहर देख रही थी ,

बाहर कितना खालीपन और सन्नाटा था ,

हवाओं में कोई हलचल नहीं ,

न ही किसी पंछी का शोर था ,

आसमा का चंचल नील नयन ,

आज उदास बहुत था ,

मालूम हो रहा था जैसे कोई तूफान आके ,

इस गुलज़ार प्रकृति को उजाड़ गया हो ा


...... अचानक से स्वयं का ख्याल आया ,

गौर से बाहर देखी तो एहसास हुआ ,

ये और कुछ भी नहीं था ,

मेरे ही अंदर का उजड़ा हुआ बाग़ निकला ा

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