कालरात्रि :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

20 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (25 बार पढ़ा जा चुका है)

कालरात्रि :---- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*एकवेणी जपाकर्ण , पूर्ण नग्ना खरास्थिता,* *लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी , तैलाभ्यक्तशरीरिणी।* *वामपादोल्लसल्लोह , लताकण्टकभूषणा,* *वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा , कालरात्रिर्भयङ्करी॥-------* *नवरात्र की सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि की उपासना का विधान है। पौराणिक मतानुसार देवी कालरात्रि ही महामाया हैं और भगवान विष्णु की योगनिद्रा भी हैं। काल का अर्थ है (कालिमा यां मृत्यु) रात्रि का अर्थ है निशा, रात व अस्त हो जाना। कालरात्रि का अर्थ हुआ काली रात जैसा अथवा काल का अस्त होना। अर्थात प्रलय की रात्रि को भी जीत लेना | एक नारी को कालरात्रि की संज्ञा इसलिए दी जा सकती है क्योंकि वह अपनी सेवा, त्याग, पातिव्रतधर्म का पालन करके काल को भी जीतने की क्षमता रखती है | हमारे भारतीय वांग्मय में ऐसी महान नारियों की गाथायें देखने को मिलती हैं | सती सावित्री ने किस प्रकार पतिसेवा के ही बल पर अपने पति के प्राण यमराज से वापस ले लिया , अर्थात उस प्रलय की रात्रि पर विजय प्राप्त की | सती नर्मदा ने सूर्य की गति को रोक दिया | और सबसे आश्चर्यजनक एवं ज्वलंत उदाहरण सती सुलोचना का है, जिसके पातिव्रतधर्म में इतना बल था कि पति का कटा हुआ सर भी रामादल में हंसने लगता है | सतियों में सर्वश्रेष्ठ माता अनुसुइया को कैसे भुलाया जा सकता है जिन्होंने ॐ पति परमेश्वराय का जप करके त्रिदेवों को भी बालक बना दिया |* *आज के परिप्रेक्ष्य में यदि देखा जाय तो नारी अपने बल को भूलती हुई दिख रही है क्योंकि वह पतिसेवा व पातिव्रतधर्म को वह किनारे पर करके तमाम सुख, ऐश्वर्य व परिवार की सुखकामना के लिए स्वयं में विश्वसनीय न होकर अनेक प्रकार के पूजा-पाठ, यंत्र-मंत्र-तंत्र के चक्कर में पड़कर स्वयं व परिवार को भी अंधकार की ओर ही ले जा रही है | जबकि नारियों के धर्म के विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी मानस में बताते हैं----- एकइ धर्म एक व्रत नेमा | कायं वचन मन पति पद प्रेमा || नारियों का एक धर्म एक ही नियम एवं ही पूजा होनी चाहिए कि मन, वचन, कर्म से केवल पति की सेवा करें तो समझ लो कि ३३कोटि देवताओं का पूजन हो गया | ऐसा करने पर आज की नारी भी काल को जीतने वाली "कालरात्रि" बन सकती है | एवं एकबार यमराज से भी लड़कर पति को जीवित करा सकती है | नारियां सदैव से महान रही हैं | सृष्टि के सम्पूर्ण गुण एवं अवगुण नारी में विद्यमान हैं , आवश्यकता है अवगुणों को छोड़कर सद्गुणों को अपनाने की | परंतु दुर्भाग्य है पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध में आज नारी भ्रमित होकर अपने आदर्शों, कर्तव्यों को भूलती दिख रही है | वह पति की सेवा करने के बजाय मन्दिरों,मठों एवं संतो-महन्थों के चक्कर लगा रही है | और ऐसा करके वह स्वयं के साथ-साथ पूरे परिवार को संकट की ओर ले जा रही है |* *आज नारियों को आवश्यकता है स्वयं को पहचानने की | अपने अन्दर काल को भी जीतने की क्षमता को पुनर्स्थापित करने की | ऐसा करके वह परिवार के ऊपर छायी "प्रलय की रात्रि" को भी हरा करके "कालरात्रि" बन सकती है |*

अगला लेख: सर्वपितृ अमावस्या पर अवश्य करें श्राद्ध :---- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
01 नवम्बर 2018
महिलाओं के लिए ये कैसी लड़ाई जिसे महिलाओं का हीसमर्थन नहीं मनुष्य की आस्था ही वो शक्ति होती है जो उसे विषम से विषम परिस्थितियों से लड़कर विजयश्री हासिल करने की शक्ति देती है। जब उस आस्था पर ही प्रहार करने के प्रयास किए जाते हैं, तो प्रयास्कर्ता स्वयं आग से खेल रहा होता है।क्योंकि वह यह भूल जाता है कि
01 नवम्बर 2018
07 अक्तूबर 2018
*चौरासी योनियों में सर्वश्रेष्ठ एवं सबसे सुंदर शरीर मनुष्य का मिला | इस सुंदर शरीर को सुंदर बनाए रखने के लिए मनुष्य को ही उद्योग करना पड़ता है | सुंदरता का अर्थ शारीरिक सुंदरता नहीं वरन पवित्रता एवं स्वच्छता से हैं | पवित्रता जीवन को स्वच्छ एवं सुंदर बनाती है | पवित्रता, शुद्धता, स्वच्छता मानव-जीवन
07 अक्तूबर 2018
07 अक्तूबर 2018
*इस सकल सृष्टि में हर प्राणी प्रसन्न रहना चाहता है , परंतु प्रसन्नता है कहाँ ???? लोग सामान्यतः अनुभव करते हैं कि धन, शक्ति और प्रसिद्धि प्रसन्नता के मुख्य सूचक हैं | यह सत्य है कि धन, शक्ति और प्रसिद्धि अल्प समय के लिए एक स्तर की संतुष्टि दे सकती है | परन्तु यदि यह कथन पूर्णतयः सत्य था तब वो सभी जि
07 अक्तूबर 2018
12 अक्तूबर 2018
*पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।* *प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥* *हमारे सनातन धर्म में नवरात्र पर्व के तीसरे दिन महामाया चंद्रघंटा का पूजन किया जाता है | चंद्रघंटा की साधना करने से मनुष्य को प्रत्येक सुख , सुविधा , ऐश्वर्य , धन एवं लक्ष्मी की प्राप्
12 अक्तूबर 2018
11 अक्तूबर 2018
*पराम्बा जगदंबा जगत जननी भगवती मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप है ब्रह्मचारिणी | जिसका अर्थ होता है तपश्चारिणी अर्थात तपस्या करने वाली | महामाया ब्रह्मचारिणी नें घोर तपस्या करके भगवान शिव को अपने पति के रुप में प्राप्त किया और भगवान शिव के वामभाग में विराजित होकर के पतिव्रताओं में अग्रगण्य बनीं | इसी प्र
11 अक्तूबर 2018
07 अक्तूबर 2018
*सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि को गतिमान करने के लिए कई बार सृष्टि की रचना की , परंतु उनकी बनाई सृष्टि गतिमान न हो सकी , क्योंकि उन्होंने प्रारंभ में जब भी सृष्टि की तो सिर्फ पुरुष वर्ग को उत्पन्न किया | जो भी पुरुष हुए उन्होंने सृष्टि में कोई रुचि नहीं दिखाई | अपनी बनाई हुई सृष्टि क
07 अक्तूबर 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x