सतसंग :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

20 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (54 बार पढ़ा जा चुका है)

सतसंग :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में संगति का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है | जिस प्रकार मनुष्य कुसंगत में पड़कर के नकारात्मक हो जाता है उसी प्रकार अच्छी संगति अर्थात सत्संग में पढ़कर की मनुष्य का व्यक्तित्व बदल जाता है | सत्संग का मानव जीवन पर इतना अधिक प्रभाव पड़ता है कि इसी के माध्यम से मनुष्य को समस्याओं का समाधान तो मिल ही जाता है साथ ही उसे जीवन में आगे बढ़ने का मार्गदर्शन भी प्राप्त होता रहता है | मनुष्य का मन आग की तरह होता है जिस प्रकार अग्नि में दुर्गंधयुक्त प्लॉस्टिक या रबर डालने से उस की दुर्गंध चारों ओर फैल जाती है उसी प्रकार यदि अग्नि में सुगंधित चंदन डाल दिया जाए तो चारों तरफ सुगंधी फैल जाती है | ठीक उसी प्रकार हमारे मनरूपी हवनकुंड में कैसी सामग्री पड़ रही है ? कैसे विचार उत्पन्न हो रहे हैं ? उसी के अनुसार हमारा जीवन नकारात्मक एवं सकारात्मक बनता चला जाता है | यदि हमारे मन में अच्छे विचार पड़ रहे हैं तो जीवन आनंदित होगा , और यदि नकारात्मक विचार आ रहे हैं तो जीवन में चिंता , तनाव आदि का प्रभाव फैलने लगता है | मनुष्य का जीवन उसके परिवार के परिवेश के ऊपर आधारित होता है | जिस परिवार के लोग सत्संग किया करते हैं उस परिवार का बालक भी सत्संग करने वाला बनता है , और जिस परिवार में सदैव लड़ाई - झगड़े एवं तनाव होता है वहां का बालक सत्संग से विमुख होकर के तनावग्रस्त रहने लगता है और उसे चारों ओर से समस्याएं घेरने लगती हैं |* *आज प्राय: लोग सत्संग करने का मतलब सिर्फ कथा एवं प्रवचन प्रवचन सुनने से लगाने लगे हैं | जबकि मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि सत्संग करने का मतलब सिर्फ प्रवचन सुनना नहीं हुआ , बल्कि सत्संग का अर्थ है कि :- आप किस तरह की पुस्तके पढ़ रहे हैं ? किस तरह की बातें सोच रहे हैं ? किस प्रकार के लोगों से मिल रहे हैं ? और जो भी कार्य कर रहे हैं उसका हमारे जीवन पर कैसा प्रभाव पड़ रहा है ? वह सभी संग - सानिध्य - संपर्क के अंतर्गत आते हैं | यदि संगति का प्रभाव सकारात्मक पड़ा है तो सत्संग हुआ , और यदि संगति का प्रभाव नकारात्मक रूप से पड़ रहा है तो वह कुसंग कहा जाएगा | मानव जीवन में सत्संग का प्रभाव इतना प्रभावशाली होता है कि इससे व्यक्ति के जीवन की दिशा धारा को पूर्णत: बदला जा सकता है | केवल अध्यात्म क्षेत्र में ही नहीं बल्कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए सत्संग चाहिए , क्योंकि कुसंग से व्यक्ति भटक जाता है और मनोवांछित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता |सत्संग का ही प्रभाव है कि व्यक्ति थोड़े से समय के लिए भी यदि किसी महापुरुष की संगति में आ जाता है तो उसका जीवन परिवर्तित हो जाता है | बाबा जी लिखते हैं :- एक घरी आधी घरी आधिहुं में पुनि आध ! तुलसी संगत साधु की हरइ कोटि अपराध !! अत: मनुष्य को सतसंग करते रहना चाहिए |* *मनुष्य को यह सदैव याद रखना चाहिए कि हम जिन लोगों की संगति में बैठ रहे हैं वे हमें हमारे सक्ष्य तक ले जा रहे बैं या हमें भटका रहे हैं | इस पर विचार करते हुए मनुष्य को सतसंग करते रहना चाहिए |*

सतसंग :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

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