आया है सो जायेगा :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

20 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (36 बार पढ़ा जा चुका है)

आया है सो जायेगा :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आश्विन मास के शुक्लपक्ष में प्रतिपदा से महानवमी तक पराअम्बा जगदम्बा जगतजननी भगवती दुर्गा जी के नौ रूपों की पूजा भक्तों के द्वारा की जाती है | दसवें दिन (विजयादशमी के दिन) हर्षोल्लास के साथ भक्तजन महामाया की भव्य शोभायात्रा निकालकर उनका विसर्जन नदियों , सरोवरों आदि में करते हैं | जगदम्बा का वास तो प्रकृति के कण - कण में हैं , उनका कभी विसर्जन नहीं हो सकता परंतु पर्व विशेष पर उनका आवाहन एवं विसर्जन मृत्युलोक के सत्य को दर्शाता है | इस मृत्युलोक में जिसका भी आगमन हुआ है एक निश्चित समयावधि के उपरान्त उसकी विदाई भी हुई है | यहाँ सदा - सदा के लिए किसी भी जीव या पदार्थ का सृजन नहीं हुआ है ! इसी प्रकार कोई भी दैवीय शक्ति भी इसी कालचक्र के अनुरूप आचरण करके समस्त सृष्टि को यह संदेश देती प्रतीत होती है कि यहाँ स्थायित्व नहीं है | अब तक अनेकानेक महापुरुष हुए हैं जो यदि चाहते तो इस पृथ्वीलोक में अब तक विचरण करते रहते | राम कृष्ण आदि जो कि ब्रह्म होते हुए भी इस विधान का पालन करते हुए पूर्व निर्धारित समय के अनुसार अपनी लीलाओं के माध्यम से समस्त संसार को धर्मपथ पर लगाकर निज लोक को चले गये | कहने का तात्पर्य यह है कि जब देवी देवताओं के अंशावतार इस समयावधि का उल्लंघन नहीं कर पाये तो साधारण मनुष्य कैसे कर पायेगा | प्रत्येक मनुष्य को यह विचार करना चाहिए कि हम इस संसार में उसी तरह आये हैं जैसे कहीं पर किराये का घर लेकर रहा करते हैं | मकान मालिक किराया पूरा होने पर आपको मकान से निकाल देता है | जब हम किराये के मकान में हैं तो उस घर से मोह करना मूर्खता के अतिरिक्त क्या कहा जा सकता है |* *आज धन , सम्पत्ति , अनेक सम्पदाओं एवं जमीन के कुछ टुकड़ों के लिए मनुष्य ही मनुष्य का दुशमन बना बैठा है | मनुष्य इस संसार में इस प्रकार का व्यवहार करता है जैसे उसे अब इस पृथ्वीलोक से कहीं जाना ही नहीं है , जबकि परमात्मा की ओर से गिनती की कुछेक साँसें ही सबको मिली हुई हैं | कब किसका समय पूरा हो जायेगा यह कोई नहीं जानता है | परमात्मा द्वारा पूर्वनिर्धारित समय के अतिरिक्त एक क्षण भी हम जीवित नहीं रह सकते हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" ध्यानाकर्षण कराना चाहूँगा कि हमारे शास्त्रों में लिखा है कि :-- "आयु वित्तं च धर्मम् च , विद्या निधनमेव च ! पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थ्यैव हि देहिन: !! अर्थात :- मनुष्य को आयु , धन , एवं विद्या कितनी प्राप्त होगी , उसके द्वारा धर्म कितना होगा , और उसका निधन कब होगा यह सब गर्भ में ही निश्चित हो जाता है | आश्चर्य की बात यह भी है कि प्राय: सभी यह जानते भी हैं फिर भी उनका व्यवहार इस प्रकार का होता है | मनुष्य को सदैव ऐसे कर्म करने चाहिए कि मृत्यु हो जाने के बाद भी यह संसार उसको याद करता रहे | जन्म लेने के बाद ही जीव पल - पल अपनी अपनी मृत्यु की ओर बढने लगता है | प्रत्येक मनुष्य को यह करना चाहिए कि जो निश्चित समयावधि हमें मिली है इसी समयावधि में हमें अच्छे कर्म करके अपने जीवित रहते हुए ही अपने सत्कर्मों की सुगन्धि से चतुर्दिश सुगन्धित करन देना चाहिए | ऐसा करके ही मनुष्य की कीर्ति युगों तक अक्षुण्ण रह सकती है |* *इस मृत्युलोक में जो भी आया है उसे एक दिन जाना ही है यह विचार सतत् ध्यान में रखते हुए कर्म करने वाला मनुष्य अमर हो जाता है |*

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