शक्ति के समस्त रूप नारी में ;---- आचार्य अर्जुन तिवारी

22 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (33 बार पढ़ा जा चुका है)

शक्ति के समस्त रूप नारी में ;---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर जब-जब ईश्वर ने अवतार लिया है तब-तब उनकी शक्ति, उनकी माया उनके साथ आई है | यह माया नहीं होती तो अध्यात्म कैसे होता | ईश्वर स्वयं शक्ति को मानते हैं क्योंकि बिना शक्ति के ईश्वर का भी अस्तित्व नहीं है | इसी शक्ति में जब वीर गुण होता है तो यह "महादुर्गा" हो जाती हैं | जब रजोगुण होता है तो वह "महालक्ष्मी" हो जाती है | तमोगुण को प्रखर करती हई वही "महाकाली" कहलाती हैं और सतोगुण की अधिकता में वह ज्ञान प्रदान करने वाली "महासरस्वती" के रूप में दर्शन देती है | आदिशक्ति के नौ रूपों में ही एक नारी का सम्पूर्ण जीवन निहित है | जन्म लेने के बाद प्रत्येक कन्या में "शैलपुत्री" के दर्शन होते हैं | शिक्षा ग्रहण करके कठिन परीक्षाओं की तैयारी (तपस्या) करती हुई प्रत्येक कन्या "ब्रह्मचारिणी" स्वरूपा होती है | अपने रूप लावण्य से माता - पिता का मन मोहने वाली "चन्द्रघण्टा" विवाहोपरान्त जब गर्भ धारण करती है तो "कूष्माण्डा" का दर्शन कराती है | एक नारी के सबसे बड़े सुख को प्राप्त करते हुए जब नारी सन्तान को जन्म देती है तो वह "स्कन्दमाता" के तुल्य हो जाती है | परिवार को वरदान स्वरूप कन्या प्रदत्त करके कन्यादान करने का सौभाग्य दिलाने वाली नारी "कात्यायनी" का स्वरूप है | अपने परिवार पर आई हुई प्रलय की रात्रि का दृढता से सामना करने वाली "कालरात्री" बन जाती है | बहू आ जाने के बाद पूरे परिवार पर ममता लुटाने वाली "महागौरी" अन्त समय में अपना सब कुछ परिवार को देकर संसार से विदा लेते समय वह "सिद्धिदात्री" के रूप में सब प्रदान करके चली जाती है | इस प्रकार आदिशक्ति जगदम्बा का प्रत्येक रूप नारी में ही समाहित है | आवश्यकता है यथारूप दर्शन करने की |* *आज मनुष्य की मानसिकता बदल गयी है | जैसा कि दीपक की तलहटी में सदैव अंधेरा ही रहती है ठीक उसी प्रकार मनुष्य को अपने घर में रह रही शक्तिस्वरूपा अपनी माँ , बहन , पत्नी व कन्या में उस परमशक्ति का आभास नहीं होता है और वह उनको त्रास देता हुआ मंदिरों में जाकर आदिशक्ति की कृपा प्राप्त करना चाहता है | समाज में आज न तो शैलपुत्री (कन्या) सुरक्षित दिख रही है और न ही "ब्रह्मचारिणी" (छात्रा) | जगह - जगह इनको कुदृष्टि से देखने वालों की संख्या अधिक हो गयी है | आज भगवती दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों का पूजन करना एवं उनके लिए व्रत करना तभी सार्थक हो सकता है जब उनके स्वरूप में हमारे आसपास विचरण कर रही अनेकानेक कन्याओं / युवतिओं को भी उसी भाव से देखते हुए सम्मान दिया जाय , अन्यथा कोई लाभ नहीं मिलने वाला है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज अनेकानेक दुर्गापूजा समितियों के नवयुवकों का आवाहन करता हूँ कि :-- आज समय की माँग है कि हम मात्र नौ दिनों के लिए ही भक्तिमय न होकर वर्षपर्यन्त भगवती के विभिन्न स्वरूपों को आदर सम्मान करते हुए उनके साथ उचित व्यवहार करें | ऐसा करने से मात्र हमारी मानसिकता ही नहीं वरन् हमारा जीवन एवं समाज भी परिवर्तित हो जायेगा , और जब नारीशक्ति (कन्या से लेकर वृद्धा तक) स्वयं को सुरक्षित मानने लगेगी तब उनके आशीर्वाद से समाज निरन्तर पुष्पित - पल्लवित होता रहेगा | सही मायनों में हमारा "दुर्गापूजा" तभी सार्थक भी कहा जा सकता है |*

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