नर - नारी मिलकर ही सृजन करते हैं :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

27 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (27 बार पढ़ा जा चुका है)

नर   - नारी मिलकर ही सृजन करते हैं :--- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*यह सम्पूर्ण सृष्टि नर नारी के संयोग से ही गतिमान है | दोनों को एक दूसरे का पूरक माना गया है ! पूरक इसलिए माना गया है क्योंकि एक दूसरे के बिना जीवन नीरस एवं अर्थहीन अर्थात व्यर्थ हो जाता है | संतानोत्पत्ति नर - नारी के मधुर मिलन के बाद ही संभव है | पुरुष को बलवान बनाने में यदि एक नारी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है तो जीवन पर्यंत नारी का संरक्षण करने की भूमिका पुरुष को निभानी पड़ती है | समय-समय पर एक पुत्री , बहन , पत्नी व मां बन कर के नारी पुरुष के जीवन में अनेकों प्रकार के रंग भरती है ! ठीक उसी प्रकार पुरुष भी नारी के जीवन को सतरंगी रंगों में रंगने का कार्य करता है | सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार जहां एक नारी पुरुष के सुख , ऐश्वर्य एवं लंबी आयु के लिए अनेक व्रत उपवास रखती है वहीं पुरुष भी समय-समय पर नारी के संरक्षण की प्रतिज्ञा करता है | कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार ताली बजाने के लिए दोनों हाथों का मिलना आवश्यक है उसी प्रकार इस समाज को आगे बढ़ाने के लिए नर नारी दोनों में सामंजस्य का रहना बहुत ही आवश्यक है | जहां यह सामंजस्य नहीं बनता है वह परिवार , समाज एवं राष्ट्र कभी भी विकास नहीं कर सकता है | एक नारी का जीवन पुरुषों के आसपास ही बीत जाता है | कभी वह पुत्री बन करके पिता का स्वाभिमान बनती है , तो कभी बहन बन करके भाई का गौरव बनती है , और पत्नी बन कर के वह एक पुरुष को इस संसार का समस्त सुख ऐश्वर्य प्रदान करते हुए स्वयं को निछावर कर देती है | नारी जब मां बनती है तो उसकी महानता एवं अनुपम त्याग का वर्णन कर पाना शायद मेरी लेखनी के बस में नहीं है |* *आज त्याग एवं तपस्या का अनूठा व्रत है जिसे करवा चौथ के नाम से जाना जाता है | दिन भर अपने पति के नाम पर अन्न एवं जल का त्याग कर के महिलाएं यह दर्शाने का प्रयास करती हैं कि हमें अपने पति के लिए सर्वस्व त्याग करने में भी कोई कठिनता नहीं आ सकती है | आज भले ही आधुनिकता के रंग में यह व्रत रंग गया हो परंतु पति - पत्नी को समीप लाने का यह अलौकिक का पर्व है | परंतु आज कुछ लोग यह भी कहते हुए सुने जाते हैं की पत्नी यह व्रत पति की दीर्घायु के लिए नहीं वरन् अपने स्वार्थ बस करती है क्योंकि पति उसका पालन-पोषण करता है | पति के बिना पत्नी का कोई अस्तित्व नहीं है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" ऐसे सभी विद्वानों से पूछना चाहता हूं कि यदि पति के बिना पत्नी का अस्तित्व नहीं है तो पत्नी के बिना पति का ही क्या अस्तित्व है ?? ऐसे विद्वानों का ध्यान उन विधुरों की ओर आकर्षित करना चाहूंगा जिनकी पत्नियां असमय में उनका साथ छोड़ कर के परलोक पधार चुकी है | आज उनसे जाकर कोई पूछे कि बिना पत्नी की उनकी क्या दशा / दुर्दशा है ?? कहने का तात्पर्य है कि यदि पत्नी का पोषण और रक्षण पति करता है तो पत्नी भी पति की अर्धांगिनी बनके पति के लिए समर्पित होकर उसका पालन करती है | किसी भी विद्वान के द्वारा यह कह देना की नारियां यह व्रत स्वार्थवश करती हैं कतई उचित नहीं माना जा सकता | यह सत्य है कि संसार में निस्वार्थ भाव किसी का नहीं है परंतु इसमें पुरुष भी सम्मिलित है |* *हमारे विद्वानों ने हमको ही शिक्षा दी है कि यदि सम्मान पाने की भूख है तो सम्मान करना सीखना होगा | चाहे वह हमारी पत्नी हो , बहन हो या फिर माँ हो क्योंकि हम जो बाटेंगे वही हमको प्राप्त हो सकता है |*

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