पूजा कैसे करें ;----- आचार्य अर्जुन तिवारी

30 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (35 बार पढ़ा जा चुका है)

पूजा कैसे करें ;----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन हिन्दू धर्म में पूजा - पाठ का विशेष महत्व है | पूजा कोई साधारण कृत्य नहीं है | यदि आध्यात्मिकता की दृष्टि से देखा जाय तो पूजा करने का अर्थ है स्वयं को परिमार्जित करना | पूजा में सहयोग करने वाली सामग्रियों पर यदि ध्यान दिया जाय तो उनकी अलौकिकता परिलक्षित हो जाती है | किसी भी पूजन में आसन का विशेष महत्व है , यह मात्र चटाई का टुकड़ा नहीं अपितु यह मानना चाहिए कि साधक इस समय कर्तव्य की कठोर प्रतिज्ञा के ऊपर आरूढ होकर इसी स्थान पर अविचल भाव से बैठकर सत्य को प्राप्त करने के लिए सतत् प्रयासरत होता है | साधक को यह ध्यान में रखना चाहिए कि मैं एक तरफ से प्रलोभनों का ताना तो दूसरी ओर से कठिनाईयों का बाना डालकर बने हुए इस सांसारिक घटनाक्रम रूपी यह आसन मेरे पैरों के नीचे रहेगा , और मैं इसे दबाये रखने में सक्षम हूँ | ऐसा विचार एवं प्रतिज्ञा करके जब साधक कोई पूजा करने बैठता है तो उसका आसन कभी विचलित नहीं हो सकता | किसी भी पूजा में दूसरा विशेष पदार्थ होता है चंदन | चंदन को कभी ध्यान से देखा जाए तो यही मिलता है जैसे-जैसे वह घिसता जाता है वैसे वैसे उसका भार हल्का होता जाता है | प्रायः लोग यह समझते हैं कि भगवान की भक्ति करके चंदन तो समाप्त हो गया ! उसका घाटा हो गया !! परंतु यदि आध्यात्मिकता की दृष्टि से देखा जाए चंदन का कोई घाटा नहीं हुआ , बल्कि वह पूज्य द्रव्य बन कर भगवान के मस्तक पर विराजमान हो जाता है | जिस प्रकार बिना घिसे चंदन को भगवान के मस्तक पर विराजने का सौभाग्य नहीं प्राप्त होता है उसी प्रकार मनुष्य को भी सांसारिक वासनाओं को भूलकर भगवद्भक्ति में घिसना एवं पिसना होता है तब उसे भगवान का सान्निध्य प्राप्त होने का अवसर मिल सकता है |* *आज के परिवेश में प्राय: लोग यह कहते हुए सुने जाते हैं कि ---- मैं इतना पूजा - पाठ करता हूँ , ईश्वर को मानता हूँ फिर भी परेशानियां घेरे ही रहती हैं | फिर पूजा - पाठ करने से क्या फायदा ???? वास्तविकता यह है कि हम यह जानते ही नहीं कि पूजा क्या है और कैसे किया जाय | जबकि ईश्वर पूजा के स्थूल उपकरणों का सूक्ष्म आध्यात्मिक महत्व है | उस सूक्ष्म तथ्य को समझे बिना जो लोग केवल मात्र भौतिक कर्मकाण्डों के बाह्य आडंबरों तक ही अपनी दृष्टि सीमित रखते हैं, वे पूजा के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाते और न उसके सच्चे लाभ को ही प्राप्त कर पाते हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इन शिकायत कर्ताओं से पूंछना चाहता हूँ कि जब वे भगवान के समूप दीप प्रज्वलित करते हैं तो क्या वे अपने ज्ञान का दीपक भी जलाते हैं ?? क्योंकि बिना ज्ञानदीपक प्रज्वलित किये अंतर्प्रकाश का विस्तार नहीं हो सकता है | क्योंकि यह सत्य है कि यही ज्ञान का प्रकाश ही आत्मा को परमात्मा से मिलाने में सहायक सिद्ध होता है | कौन है जो इस विधान के अनुसार आज पूजन कर रहा है | भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य जल्दी - जल्दी भगवान का पूजन करके मात्र खानापूर्ति कर रहा है और पूजन का पूर्ण फल पाने की इच्छा रखता है | और कार्य न होने पर भगवान से पूजा करने का उलाहना देते हुए शिकायत करने लगता है | क्या सारा दोष भगवान का ही है | यह मान लीजिए कि यदि नदी पार करने की इच्छा है तो नाविक की इच्छानुसार आपको नाव पर बैठना ही होगा , ठीक उसी प्रकार यदि पूजन से फल प्राप्त करने की इच्छा है तो उपरोक्त कर्म करके ही प्राप्त किया जा सकता है |* *इसे आध्यात्मिक पूजा कहा जाता है | ऐसी पूजा करके मनुष्य जीवन की परेशानियों से मुक्ति पा सकता है |*

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