गीत

30 अक्तूबर 2018   |  अलोक सिन्हा   (36 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं तो ऐसा दीप कि जिसको , झंझावातों में जलना है |

मुझे दिया अभिशाप किसी ने ,

जीवन भर जलते रहने का |

हर तारा सूरज बनने तक ,

सब सुख दुःख सहते रहने का

जीवन की अंतिम सरगम तक , तूफानों में ही पलना है |

सूरज ने भी हार मानली ,

जिस कुटिया के अंधियारे से |

लेकिन आज अंधेरी कुटिया ,

जगमग मेरे उजियारे से |

दीवाली लाने को हर घर - मुझे अँधेरे से लड़ना है |

तब तक तो निश्चय चलना है ,

जब तक शेष तेल औ बाती |

थक जाऊंगा , सो जाऊंगा ,

हार नहीं मानूंगा साथी |

लेने पड़ें जन्म कितने ही , मुझे अँधेरे को दलना है |

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