रस्म-ए- उल्फ़त को निभाएं तो निभाएं कैसे

01 नवम्बर 2018   |  Shashi Gupta   (47 बार पढ़ा जा चुका है)

रस्म-ए- उल्फ़त को निभाएं तो निभाएं कैसे

रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएं तो निभाएं कैसे..


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एक बात मुझे समझ में नहीं आती है कि इस अमूल्य जीवन की ही जब कोई गारंटी नहीं है, तो फिर क्यों इन संसारिक वस्तुओं से इतनी मुहब्बत है। खैर अपना यह जीवन आग और मोम का मेल है, कभी यह सुलगता है, तो कभी वह पिघलता है...

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दर्द में डूबे हुए नग़मे हज़ारों हैं मगर -

साज़-ए-दिल टूट गया हो तो सुनाए कैसे

रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएं तो निभाएं कैसे

बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते

ज़िंदगी बोझ बनी हो तो उठाएं कैसे

रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएं...


परिस्थितिजन्य कारणों से जब ऐसा मनोभाव हो और इस रंगीन दुनिया की खूबसूरत तस्वीरें भी आँखों को चुभन देती हो, तो क्या किया जाए कि जिंदगी बोझ न बने , हृदय में जो स्नेह का उबाल है, वह पीड़ा न दे। अपने आशियाने के बंद कमरे में मैं इसी सवाल का जवाब ढूंढता हूँ, अकसर इन तन्हा रातों में ..।

जब कभी यह मन अनुशासन का बंधन तोड़ने को बेताब होता है, वह स्वछंदता की ओर आकृष्ट होता सा जान पड़ता है, दो पल की खुशियों के लिये हर चहारदीवारी फांदने को बेताब होता है। तब उसे बार-बार यह याद दिलाना पड़ता है कि ये मासूम दोस्त हर किसी को भला कहाँ नसीब है वह मनमीत, जैसा तूने सोचा था । ख्वाबों का महल बना लिया और तू स्वयं यादों के पिंजड़े में कैद है , इससे स्वयं को आजाद करों और कर्मपथ की शेष दूरियों को पार करो...।

पर मेरी मंजिल क्या है बंधु, जरा यह भी तो बतला दो न.. ?

इस पथिक को अब पत्रकार बनना नहीं, लेखक बनना नहीं, जोगी बनना नहीं और गृहस्थ बनने का भी कोई सवाल नहीं, तो फिर किस राह पर चलना चाहते हो । कोई जवाब नहीं है अभी इस सवाल का मेरे पास, पर हाँ इतना जानता हूँ कि कहाँ दलदल है, कहाँ चट्टान और कहाँ उपवन है...।

दीपावली पर्व है , सो बजारों में खासी भीड़ है। हर सामग्री चूना-पेंट तक गारंटी- वारंटी वाली हो गयी है। साहब , एक बात मुझे समझ में नहीं आती है कि इस अमूल्य जीवन की ही जब कोई गारंटी नहीं है, तो फिर क्यों इन संसारिक वस्तुओं से इतनी मुहब्बत है..। खैर अपना यह जीवन आग और मोम का मेल है, कभी यह सुलगता है, तो कभी वह पिघलता है।

जब कोई खास अपना न हो , कोई मनमीत न हो, तो दिल के झरोखे को बंद किये रहना बड़ी चुनौती होती है एकाकीपन में , इसलिये बंद कमरे के बाहर की रंगीन दुनिया में झांक ताक करना कब का बंद कर चुका हूँ। अन्यथा यह भाव मन में उबाल ला सकता है..


बुझी-बुझी सी नज़र में तेरी तलाश लिये

भटकते फिरते हैं हम आज अपनी लाश लिये

यही ज़ुनून यही वहशत हो और तू आये

हम इंतज़ार करेंगे तेरा क़यामत तक...


फिर भी कभी- कभी बंद कमरे से बाहर कुछ अपने शुभचिंतकों से मुलाकात हो ही जाती है। अभी पिछले ही दिनों रास्ते में कामरेड मो० सलीम भाई मिल गये। भकापा (माले) के बड़े स्टार प्रचारकों में से हैं, जेएनयू के प्रोडक्ट हैं और हम उम्र भी। वे किसी अन्य प्रान्त में रहने वाले गंभीर रोग से पीड़ित अपने एक कामरेड भाई का आर्थिक सहयोग करने बैंक गये थें। राजनेताओं में इतनी सम्वेदना होनी ही चाहिए कि यदि उसका कोई साथी किसी कारण संकट में हो, तो उसे अकेला न छोड़ दिया जाए। आज के स्वार्थपरक राजनीति में ऐसा कहाँ देखने को मिलता है..? पर अपने सलीम भाई कुछ अलग हैं, वे पहले इंसान हैं फिर नेता..। सो, मुझे कभी- कभी उनके साथ समय गुजारना और साथ ही आमना जी ( भाभी जी) के हाथों का बना भोजन पसंद है। लिहाजा, मैं उनके साथ हो लिया। घर पर पहले दूध, शहद और चूड़ा मिला, फिर ताजी रोटी और बेहद स्वादिष्ट सब्जी। वैसे तो मेरा संकल्प है कि एक ही सब्जी लूंगा, पर जब ऐसा नहीं हो पाता तो दोनों ही सब्जियों को आपस में मिला देता हूँ मैं। सलीम भाई एक प्याले में मिश्रित दालों से बना विशेष तरह का दाल वड़ा भी ले आये। आमना जी का निर्देश था कि वह मेरे लिये तत्काल बनाया गया है, ऐसे में आनाकानी कैसे कर सकता था..? भोजन की थाली संग ऐसा ही कुछ स्नेह अगले दिन पुनः मेरे सबसे पुराने मित्र डा० योगेश सर्राफा के घर पर मिला। वहाँ भी भाभी जी ने कहा कि रोटी तो नहीं मिलेगी, शुद्ध देशी घी के पराठे आपको खाना होगा। महीनों बाद जो गया था, सो डाक्टर साहब बेहद खुश थें। होम्योपैथ के अच्छे डाक्टर हैं वे, मेरे स्वास्थ्य को लेकर वे भी चिन्तित रहते हैं। वर्ष 1998 में उन्हीं के समक्ष मलेरिया हुआ था, मुझे

ठीक करने का हर सम्भव प्रयास किया, परंतु पड़ोसी चिकित्सक ने जो एक माह तक टाइफाइड की अंग्रेजी दवा क्या चला दी कि फिर ठीक आज तक न हो सका। डा० सर्राफा ने भी मुझे काढ़ा लेते रहने को कहा है।

दोस्तों, पत्रकारिता जगत में यहाँ आने के बाद यही मेरी कमाई है कि जहाँ भी जाता हूँ, सम्मान पाता हूँ। अकसर सुबह चाय कि दुकानों पर स्नेहीजन मेरा इंतजार करते हैं ।

हाँ , दावत से जुड़े विभिन्न समारोह और क्लब में जाना मुझे तनिक भी पसंद नही है। एक कार्य मुझसे और बिल्कुल भी नहीं हो पाता वह किसी के विवाह- बारात में सम्मिलित होना, ऐसा करने से मुझे अपनों की याद सताती है। इस व्यथित हृदय को बार - बार जख्म मैं नहीं देना चाहता। जबकि किसी के निधन पर सहभोज का औचित्य मेरी समझ से परे है। मेरे विचार से यह अवसर सामूहिक रुप से मौन रह कर मृत्यु से साक्षात्कार का है, न कि गुलाब जामुन और मालपुआ खाने का। खैर मैं किसी धार्मिक कर्मकांड पर सवाल खड़ा नहीं करना चाहता, बस मुझे व्यक्तिगत नहीं पसंद है यह सब। मेरे विचार से एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम के माध्यम से मृत व्यक्ति के सतकर्मों की चर्चा होनी चाहिए। ताकि समाज तक एक संदेश जाए। इंसान चाहे जितना भी बुरा हो , उसमें कोई अच्छाई निश्चित ही होती है। ऐसे कार्यक्रम में उसे प्रकट कर मृत आत्मा को सम्मान दिया जाए।

दिवंगत पत्रकार तृप्त चौबे की श्रद्धांजलि सभा में एक बात मुझे समझ में नहीं आयी कि दो प्रमुख विशिष्ट जनों ने यह क्या कह दिया..? दरअसल, इन दोनों का कथन रहा कि तृप्त भाई ने उनसे कह रखा था कि उनके और उनके कामकाज के विरुद्ध वे अपनी कलम से कुछ न लिखेंगे..। मैं इससे सहमत नहीं हूँ । घोड़े और घास में दोस्ती हो जाए,तो फिर हम अपना पत्रकारिता धर्म कैसे निभाएंगे। मैं छोटा सा बैनर लेने बावजूद अपनी पहचान इसीलिये तो बना पाया हूँ कि सभी जानते थें तब कि शशि है, तो दबाये , छिपाये बिना लिखेगा जरुर .. । हम अपने कर्म से कैसे पीछे हट सकते हैं , हालांकि अब मुझे पत्रकारिता में कोई रूचि नहीं है, यह बात साफ कर दूँ । जब अपने घर में ही विभीषण और जयचंद्र हो, तो फिर बाहरी शत्रुओं का मनोबल बढ़ेगा ही और हम जैसे पत्रकार अपने पेशे से विरक्त होते जाएंगे।

जीवन के ऐसे मोड़ पर मैं खड़ा हूँ , जहाँ कृत्रिमता सम्भव नहीं है मुझसे, मैं तो वेदनाओं और सम्वेदनाओं की नगरी का व्याकुल पथिक हूँ और यह सम्वेदना किसके पास है? उन राजनेताओं के पास जो कि वादाखिलाफी में हीरो नंबर वन हैं अथवा सलीम भाई की तरह की कि बीमार किसी अपरिचित

रिक्शेवाले के लिये दो वक्त की रोटी की व्यवस्था अपने घर से कर रहे हैं। ऐसे सादगीपसंद राजनेताओं की मीडिया भी कहाँ खोज खबर लेती है।

इस झूठी माया नगरी से तो यह अपना बंद कमरा ही बेहतर है। मैं तो अपने लिये एक विकल्प की तलाश में हूँ। काश ! कोई ऐसा हो जो मेरी भावनाओं का कद्र करता हो। जरा कठिन है ऐसे किसी स्नेहीजन की तलाश, यह भी नसीब की ही बात है, पर एक विकल्प तो निश्चित है।


इसीलिए तो रेणु दी की एक कविता की ये पंक्तियाँ मुझे बेहद पसंद है..


साथ ना चल सको -

मुझे नहीं शिकवा कोई ,

मेरे समानांतर ही कहीं -

चुन लेना सरल सा पथ कोई ;

निहार लूंगी मैं तुम्हे बस दूर से -

मेरी आँखों से कभी- ओझल ना हो जाना तुम ! !


प्रत्यक्ष न सही , आभासीय जगत में ही कोई एक तो ऐसा हो..? मन की पिघलती वेदनाओं को जो थाम ले ..। जीवन साथी न सही कोई शखा ही मिल जाए, जो स्वयं ही बिना आला लगाये मर्ज जान ले। हाँ, जब ये भी न हो तो दूसरा विकल्प है, जो हमारे पास वह लेखन, अध्ययन और सतसंग, मेरे लिये तो अपना यह ब्लॉग है। जब उदासी चरम पर होती है, ऐसे शब्द मरहम बन जाते हैं।

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