पूजा प्रतीकों का रहस्य :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

02 नवम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (55 बार पढ़ा जा चुका है)

पूजा प्रतीकों का रहस्य :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*संसार के सभी धर्मों का मूल सनातन धर्म को कहा जाता है | सनातन धर्म को मूल कहने का कारण यह है कि सकल सृष्टि में जितनी भी सभ्यतायें विकसित हुईं सब इसी सनातन धर्म की मान्यताओं को मानते हुए पुष्पित एवं पल्लवित हुईं | सनातनधर्म की दिव्यता का कारण यह है कि इस विशाल एवं महान धर्म समस्त मान्यतायें एवं पूजा पद्धतियाँ स्वयं में वैज्ञानिकता को समेटे हुए हैं | सनातन धर्म की कोई भी मान्यता ऐसी नहीं है जिसमें वैज्ञानिकता के दर्शन न मिलते हों | सनातन धर्म के किसी भी शुभकार्य में पूजा करना शुभ माना जाता है | किसी भी पूजन में ॐ का उच्चारण , स्वास्तिक का निर्माण एवं कलश का स्थापन प्रमुखता से किया जाता है | बिना इनका प्रयोग किये कोई भी पूजा / अनुष्ठान सफल नहीं कहा जाता है | किसी भी पूजा के प्रारम्भ में ब्राह्मण चौक बनाता है ! जिसे आज के आधुनिक रंगोली भी कहते हैं | चौक बनाना मंगलसूचक माना गया है | यजमान सर्वप्रथम आचमन करके तिलक धारण करता है जिसका अर्थ स्वयं को ध्यानस्थ करते हुए ब्रह्माण्ड में स्थापित करना | यजमान द्वारा शिखाबन्धन करके अपनी ऊर्जा को एकत्रित किया जाता है | तब ब्राह्मण स्वस्तिवाचन करता है | नाम से ही प्रतीत होता है कि ब्राह्मण द्वारा किया गया स्वस्तिवाचन यजमान के कल्याण एवं ग्रहों की शान्ति के लिए किया गया मंगलपाठ है | यजमान द्वारा पूजन का संकल्प लेना यह प्रकट करता है कि यजमान पूजा काल में स्वयं को स्थितिनुसार रखेगा | यह यजमान की प्रतिज्ञा होती है | प्रतिज्ञा संकल्प के बाद सर्वप्रथम आधारशक्ति (पृथ्वी) का पूजन करते हुए जीवन में या पूजा में आने वाले विघ्नों का विनाश करने हेतु विघ्नविनाशक भगवान गणेश एवं मंगलकारी मंगलागौरी का पूजन किया जाता है |* *आज यह जान लेना बहुत आवश्यक है कि कि किसी भी मंत्र के पहले ॐ का उच्चारण क्यों किया जाता है ?? क्योंकि ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है | यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है | कलश में बना हुआ स्वास्तिक चारों युगों का भान कराते मनुष्य की चारों अवस्थाओं (शैशवावस्था , युवावस्था , प्रौढावस्था एवं वृद्धावस्था का) भान कराता है | समुद्र मंथन की कथा बहुत प्रसिद्ध है | समुद्र जीवन और तमाम दिव्य रत्नों और उपलब्धियों का स्रोत है | देवी अर्थात्‌ रचनात्मक और दानवी अर्थात्‌ ध्वंसात्मक शक्तियाँ इस समुद्र का मंथन मंदराचल शिखर पर्वत की मथानी और वासुकी नाग की रस्सी बनाकर करती हैं | जीवन का अमृत तभी प्राप्त होता है, जब हम विषपान की शक्ति और सूझबूझ रखते हैं | उसी प्रकार कलश का पात्र जलभरा होता है | जीवन की उपलब्धियों का उद्भव आम्र पल्लव, नागवल्ली द्वारा दिखाई पड़ता है | जटाओं से युक्त ऊँचा नारियल ही मंदराचल है तथा यजमान द्वारा कलश की ग्रीवा (कंठ) में बाँधा कच्चा सूत्र ही वासुकी है | यजमान और ऋत्विज (पुरोहित) दोनों ही मंथनकर्ता हैं | कलशस्थापन मंत्र से ही कलश का महत्व परिभाषित हो जाता है :--"'कलशस्य मुखे विष्णु कंठे रुद्र समाश्रिताः ! मूलेतस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मात्र गणा स्मृताः !! कुक्षौतु सागरा सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा ! ऋग्वेदो यजुर्वेदो सामवेदों ह्यथर्वणाः !! अङेश्च सहितासर्वे कलशे तु समाश्रिताः ! अत्र गायत्री सावित्री शान्ति: पुष्टिकरी तथा !!'" अर्थात्‌ सृष्टि के नियामक विष्णु, रुद्र और ब्रह्मा त्रिगुणात्मक शक्ति लिए इस ब्रह्माण्ड रूपी कलश में व्याप्त हैं | समस्त समुद्र, द्वीप, यह वसुंधरा, ब्रह्माण्ड के संविधान चारों वेद इस कलश में स्थान लिए हैं | इसका वैज्ञानिक पक्ष यह है कि जहाँ इस घट का ब्रह्माण्ड दर्शन हो जाता है, जिससे शरीर रूपी घट से तादात्म्य बनता है, वहीं ताँबे के पात्र में जल विद्युत चुम्बकीय ऊर्जावान बनता है | ऊँचा नारियल का फल ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का ग्राहक बन जाता है | जैसे विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए बैटरी होती है, वैसे ही मंगल कलश ब्रह्माण्डीय ऊर्जा संकेंद्रित कर उसे बहुगुणित कर आसपास विकिरित करने वाली एकीकृत कोषा है, जो वातावरण को दिव्य बनाती है |*

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