जीवन एक यात्रा :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

03 नवम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (75 बार पढ़ा जा चुका है)

जीवन एक यात्रा :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*जीवन एक यात्रा है | इस संसार में मानव - पशु यहाँ तक कि सभी जड़ चेतन इस जीवन यात्रा के यात्री भर हैं | जिसने अपने कर्मों के अनुसार जितनी पूंजी इकट्ठा की है उसको उसी पूंजी के अनुरूप ही दूरी तय करने भर को टिकट प्राप्त होता है | इस जीवन यात्रा में हम खूब आनंद लेते हैं | हमें इस यात्रा में कहीं नदियां घाटियां सुरम्य स्थान देखने को मिलते हैं तो कहीं रेगिस्तान भयावह जंगल आदि | यह सब देखता हुआ मनुष्य एक यात्री की भांति चलता रहता है | यात्रा रुकती नहीं है | इस यात्रा में आपके पहले से कुछ यात्री उपस्थित रहते हैं | जैसे - माता पिता चाचा ताऊ , आदि , तो कुछ यात्री आपको बीच में मिलते हैं जैसे :- पत्नी , पुत्र या अन्य नये रिश्तेदार या मित्र आदि | जब जिसका स्टेशन आता वह इस यात्रा में सम्मिलित हो जाता है | और जिसका गंतव्य आ गया उसकी यात्रा पूरी हो गयी उसे उतर कर जाना ही होता है | और मनुष्य इन आने - जाने वालों को देखता भर रह जाता है | न भगा सकता है और न ही रोकने की क्षमता है | क्योंकि आने वाला टिकट लेकर आया है और जाने वाले का टिकट पूरा हो गया है | इस पूरी यात्रा में हम अपने सहयात्रियों के साथ इतने मगन हो जाते हैं कि इस जीवनरूपी गाड़ी को चलाने वाले चालक का हमें ध्यान ही नहीं रह जाता है | अपने मस्ती में मस्त हम अपनी अपनी यात्रा का आनंद व कष्ट झेल रहे होते हैं , परंतु चालक एवं परिचालक को भूल जाते हैं | और जब हम चालक की ओर ध्यान देना बंद कर देते हैं तो वह चालक भी हमारी ओर से उदासीन हो जाता है और जिसका परिणाम होता है -- दुर्घटना | वह चालक कौन है ?? हमारी जीवनरूपी गाड़ी को चलाने वाला है परमपिता परमात्मा | और हम उसे ही भुलाकर दुर्घटनाओं को निमंत्रण देते रहते हैं |* **आज हम इस जीवनरूपी यात्रा के चालक (परमात्मा) को भूलते जा रहे हैं ! यही कारण है कि प्राय: अनचाही दुर्घटनायें हमारे समक्ष प्रस्तुत हो रही हैं | जबकि यदि हम चालक पर ध्यान रखते हुए यात्रा का आनंद लेंगे तो यात्रा सुखमय होगी | अक्सर लोग यात्रा पूरी होने के समय अर्थात अपना गंतव्य नजदीक आने पर या दुर्घटना हो जाने पर ही चालक की ओर देखते हैं | जबकि यदि प्रारम्भ से ही चालक को देखते रहें तो शायद दुर्घटना हो ही न | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" कहना चाहूँगा कि इस यात्रा में हम सब को कुछ विशिष्ट समय मिलता है जिसमें हम अपने जीवन के विभिन्न कार्य कलापों का निर्वाह करते हैं | आयु कितनी भी लम्बी क्यों ना हो, हम कभी भी संतुष्ट नही होते और जीवन जीने के लिये अतिरिक्त वर्षों की कामना करने लगते हैं | जीवन का यह खेल अद्भुत और निराला है |मनुष्य पहले पच्चीस वर्ष अपना भविष्य बनाने में लगा देता है फिर पचास वर्ष की आयु तक गृहस्थ बनकर गदहे की भांती परिवार का बोझ उठाता है | जब परिवार को उसकी ज़रूरत नही लगती तो वह घर में केवल कुत्ते की भांति रखवाली करने के लिये छोड़ दिया जाता है | फिर बारी आती है उल्लू समान जीवन जीने की यानी नींद कम आती है और रातें भी जाग कर काटनी पड़ती हैं | जीवन की प्रत्येक अवस्था में कुछ ना कुछ लगा ही रहता है पर फिर भी हम हैं की सुधरते ही नहीं | यह सब देखकर, बेहतर यह है की हम शुरु से ही अपने सांसारिक कार्य करते हुए भी भगवान के साथ जुड़े रहें | | अपनी सांसारिक ज़िम्मेदारियों में इतना ना उलझें की अपने जीवन की कोई खबर ही ना रहे |* *शुरु से ही जीवन में संतुलन लायें और केवल संसार से अपना मन हटा कर भगवान को भी याद करते रहें....यदि हम ऐसा करते हैं तो जीवन की अंतिम चरण की यात्रा सुखद और शांत हो सकती है |*

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