गीत

05 नवम्बर 2018   |  अलोक सिन्हा   (71 बार पढ़ा जा चुका है)

मुंडेरी मुंडेरी दिये जगमगाये |

कहीं अल्पना हैं , कहीं पुष्प लड़ियाँ , ( रंगोली )

नृत्य गान घर घर , भव्य पन्थ गलियाँ |

यही दृश्य होगा उस दिन अवध में ,

जब राम चौदह बरस बाद आये |

मुंडेरी मुंडेरी दिए जगमगाए |

निशा आज जैसे नख-शिख सजी है ,

खुशियों की मन में वंशी बजी है |

हर ओर उत्सव , उमड़ती उमंगें ,

अब ये खुशी काश पल भर न जाये |

मुंडेरी मुंडेरी दिए जगमगाए |

चलो वहाँ देखें क्यों है अँधेरा ,

क्यों सब हैं गुमसुम , दुःख का बसेरा |

यदि कुछ तिमिर हम औरों का बाँटें ,

धरा ये सूनी कहीं रह न पाये |

मुंडेरी मुंडेरी दिए जगमगाए |

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sweta
30 नवम्बर 2018

बेहद सुंदर रचना..सराहनीय शब्द श्रृंगार👌

अलोक सिन्हा
02 दिसम्बर 2018

बहुत बहुत धन्यवाद

sweta
30 नवम्बर 2018

बेहद सुंदर रचना..सराहनीय शब्द श्रृंगार👌

अलोक सिन्हा
02 दिसम्बर 2018

बहुत बहुत धन्यवाद

sweta
30 नवम्बर 2018

बेहद सुंदर रचना..सराहनीय शब्द श्रृंगार👌

अलोक सिन्हा
02 दिसम्बर 2018

बहुत बहुत धन्यवाद ,

रेणु
11 नवम्बर 2018

आदरणीय आलोक जी -- ये सुंदर गीत उसी दिन पढ़ लिया था परलिख ना पायी | दीपों की जगमगाहट भरे इस गीत को पढ़कर बहुत ही सुखद अनुभूति हुई |
चलो वहाँ देखें क्यों है अँधेरा ,
क्यों सब हैं गुमसुम , दुःख का बसेरा |
यदि कुछ तिमिर हम औरों का बाँटें ,
धरा ये सूनी कहीं रह न पाये |
मुंडेरी मुंडेरी दिए जगमगाए |!!!!!!!!!!!
सचमुच दीवाली के उजालों का यही अनुपम संदेश है | आपको हार्दिक बधाई और शुभकामनायें | सादर -

अलोक सिन्हा
12 नवम्बर 2018

बहुत बहुत धन्यवाद |

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