दीपावली :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

06 नवम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (28 बार पढ़ा जा चुका है)

दीपावली :---- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*शुभम् करोति कल्याणम्, आरोग्यं सुख - सम्पदा |* *शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीपज्योति नमोस्तुते ||* 💥☄💥☄💥☄💥☄💥☄💥 *दीपावली ज्योतिपर्व होने के साथ-साथ लक्ष्मी पूजन का दिन भी है | कौन नहीं चाहता अपने जीवन में सुख और समृद्धि | चिंता का विषय यह है कि आज संबंध की परिभाषा बदल चुकी है इसका पैमाना धन ही रह गया है | इसलिए हमारे जीवन से सुख और संतोष का लोप हो रहा है | कभी यह स्वीकार करते थे कि विद्या ही अक्षय धन है इसमें भी किसी को संदेह नहीं था कि यह भी कंचन की तरह अर्जित किया जाता है | रस को सिद्ध करने वाले कभी कलाकार की तुलना ईश्वर से की जाती थी | पारंपरिक ज्ञान यही सिखलाता था कि संकट के समय पूर्व अर्जित पुण्य ही हमारी रक्षा करते हैं अर्थात धन दौलत संपत्ति के कई स्वरूप थे | किसी को एक दूसरे से कम नहीं आंका जा सकता | सबसे महत्वपूर्ण यह समझ लेना है कि विद्या जैसा धन बांटने से घटता नहीं ना ही कोई उसको चुरा सकता है | यश काया को तो अजर अमर कहा जाता रहा है | इसका प्रभामंडल निर्माण करने में कई चीजों का योगदान रहता है | किसी निर्धन की पूंजी उसका चरित्र होती है तो किसी की अनमोल निधि कला कौशल | परोपकारी स्वभाव ऐसा धन है जिसके व्यय से अपार संतोष का अनुभव अनायास होता है |* *आज के वर्तमान युग में तमाम ऐसे धनकुबेर हैं जिन की चर्चा अपनी अकूत संपत्ति को दोनों हाथों से लुटाने के लिए भी होती है | ऐसा क्यों करते हैं ?? इसका उत्तर एक ही हो सकता है -"संतोषम परमं सुखम्" | सुख संपत्ति का उल्लेख साथ साथ करने का प्रयोजन यही जान पड़ता है कि हम इस रिश्ते को कभी नहीं भूलें | संतोष के अभाव में संसार का सबसे धनवान व्यक्ति आजीवन मानसिक दरिद्रता से पीड़ित मरीचिका में फंसा अतृप्त प्रेत पिशाच ही रहता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" अब तक जो जान पाया हूँ उसके अनुसार - लक्ष्मी स्वभाव से चंचला है , भौतिक धन-संपत्ति स्थाई नहीं है | यही सीख संतों की है यही भक्त कवियों की कि - साईं इतना दीजिए जामे कुटुंब समाय | मैं भी भूखा न रहूँ अतिथि न भूखा जाय || जिस घर से अतिथि - याचक भूखा नहीं लौटता है उसी को वास्तव में धनवान तथा संपन्न समझना चाहिए | आज अपसंस्कृत के जहर का संक्रमण सभी जगह हो चुका है व्यक्तिगत सुख ही सर्वोपरि रखा जाने लगा है | इस स्थिति में संतोष दुर्लभ है | अंत में यह समझना परमावश्यक है कि हमारे लिए कुबेर बनना या उसकी कामना करना व्यर्थ है | जिस तरह दीपावली का हर दिया अपने आसपास का अंधेरा दूर करता है टिमटिमाता हुआ ही सही | वैसे ही हम अपनी सामर्थ्य पर अपनी धन दौलत को दूसरों के साथ साझा कर सकते हैं और प्रकाश फैला सकते हैं | चाहे यह कला-कौशल की पूंजी हो या ज्ञान की | कभी यह नहीं भूले कि दीपावली शब्द का अर्थ है दीपमालिका | जब नन्हे नन्हे दिए एक सूत्र में गुंथते हैं तो उनका उजियारा कई गुना बढ़ जाता है |* *दीए का रूपक बहुत प्रेरक है | प्रकाश के लिए पात्र कोई गढता है , उस में तेल बाती रखने वाला कोई दूसरा होता है , तो बाती तैयार करने वाले कोई दूसरा | पारंपरिक आलोक पर्व इन सभी बातों का स्मरण अनायास कराता था |*

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