दीपावली का अर्थ :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

08 नवम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (70 बार पढ़ा जा चुका है)

दीपावली का अर्थ :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*भारत त्यौहारों का देश है यहां समय-समय पर भांति भांति के त्यौहार मनाए जाने की परंपरा रही है | सनातन हिंदू धर्म में वैसे तो नित्य त्योहार मनाए जाते हैं परंतु होली , विजयदशमी एवं दीपावली मुख्य पर्व के रूप में आदिकाल से मनाए जाते रहे हैं | दीपावली संपूर्ण विश्व में अनेक नामों से मनाया जाने वाला त्यौहार है | यह "असतो मा सद्गमय , तमसो मा ज्योतिर्गमय" अर्थात असत्य से सत्य की ओर एवं अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का पर्व है | दीपावली जहां मानवीय सभ्यता एवं संस्कृति का उदाहरण है वहीं इस पर्व से अनेकों कथाएं जुड़ी हुई हैं , जिनके अनुसार यह पर्व मानव जीवन में प्रकाश फैला कर के बुराइयों एवं अंधकार का विनाश करने वाला माना जाता है | जहां दीपावली का सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व है वही इसका एक प्राकृतिक पहलू भी है | दीपावली आने तक ऋतु के प्रभाव से वर्षा ऋतु प्राय: समाप्त हो चुकी होती है | मौसम में गुलाबी ठंडक घुलने लगती है आकाश पर खजन पक्षियों की पंक्तिबद्ध टोलिया उड़कर उसकी नील नीरवता को चार चाद लगा दिया करती हैं | राजहंस मानसरोवर में लौट आते हैं , नदियों-सरोवरों का जल इस समय तक स्वच्छ और निर्मल हो चुका होता है | दूर देश में रहने वाले परिवारी जन इसी त्यौहार के बहाने अपने घरों में वापस लौट कर अपने परिवार एवं समाज के साथ इस पर्व को मनाते रहे हैं | जिससे आपसी सामंजस्य , स्नेह बना रहा करता था | एक प्रकार से भारतीय त्योहार किसी कारणवश दूर जा चुके परिवारी जनों को एकत्र करने का एक सुखद माध्यम रहा है |* *आज जिस प्रकार समाज में विकृतियाँ बढ़ी हैं , लोगों में ईर्ष्या , द्वेष की वृद्धि हुई है , आपसी सामंजस्य बिगड़े हैं , उनका प्रभाव त्योहारों पर भी स्पष्ट दिखाई पड़ता है | अपने ही परिवार से अलग होकर अपना घर संसार अलग बसाने वाले आज त्योहारों पर भी अपने बूढ़े मां बाप एवं परिवारी जनों से नहीं मिलना चाहते हैं | आपस में समरसता फैलाने वाले इस त्यौहार पर भी लोगों में निष्कपटता नहीं देखने को मिलती है | आधुनिकता के रंग में आज सभी त्यौहार रंगे हैं जिसके कारण समाज में अनेक प्रकार की बुराइयां फैली है | बाजारों में धोखाधड़ी एवं नकली सामानों की बिक्री बढ़ गई है | जिस प्रकार ढोंगी लोग दिव्य वेशभूषा बनाकरके स्वयं को पूजवाते है , ठीक उसी प्रकार बाजारों में आकर्षक रूप में विद्यमान अनेक खाद्य सामग्रियों एवं त्यौहार में प्रयुक्त होने वाली अन्यान्य सामग्रियां मानव समाज को धोखा ही दे रही हैं | नकली खाद्य पदार्थों को खा करके कितने लोगों का त्यौहार अच्छा बन रहा है यह आज के समाज में स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" सिर्फ इतना ही निवेदन करना चाहूंगा की खूब भव्यता के साथ अपना त्यौहार मनाया जाए लेकिन हमारी जो पुरातन सामग्रियां रही हैं उनको भुला कर के हम नवीन सामग्रियों के दुष्परिणाम से भी सचेत रहें | केमिकल से बनी हुई मोमबत्ती जलाने से दीपावली की भव्यता नहीं बढ़ती है दीपावली की भव्यता थी दीए जलाने से | दीए जलाने का एक सुखद परिणाम और होता था की दीए बनाने वालों की रोजी-रोटी चला करती थी जो कि आज लगभग बंद हो गई है |* *आज यह आवश्यकता है कि हम अपने त्यौहारों को भव्यता के साथ मनाएं , परंतु अपनी पुरातन मान्यताओं को ना भूलते हुए मिट्टी के दीए जलाकर के गणेश लक्ष्मी का पूजन करके इस त्यौहार का लाभ लें |*

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