"जन्मभूमि की रोशनी"

11 नवम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (62 बार पढ़ा जा चुका है)

"जन्मभूमि की रोशनी" कहानी


हरिया की हक़ीक़त से यूँ तो गाँव का बच्चा-बच्चा वाकिफ़ है। एक रात कोई अन्जान आदमी पूरब वाली बाग में अपनी खूबसूरत पत्नी रज्जो के साथ खुले आसमान के नीचे, घास-फूस वाली जमीन पर अपना डेरा डाल लिया है। पर क्यों, क्या उसका इस दुनियाँ में कोई ठिकाना ही नहीं है कोई नहीं जानता। सभी लोग मनगढ़ंत कहानी दुहराते हैं, विचारा भला आदमी है, मेहनत मजदूरी करके अपना पेट पाल रहा है। बहुत ईमानदार हैं खैरात के किसी वस्तु को हाथ नहीं लगाता और किसी का एक गिलास पानी भी मुफ्त में नही पीता, वगैरह वगैरह।


पराई जमीन में मिट्टी की दीवाल और उसपर सलीके से बिछाई हुई मंडई उसकी पहचान हो गई है। रज्जो बड़ी ही कुशलता से अपने आशियाने को सजाकर रखती थी और दोनों बहुत खुश भी रहते हैं, अक्सर उनकी खिलखिलाती हँसी कइयों ने सुनी भी है जिसका राज क्या है वह तो वहीँ दोनों जानते हैं। कुछ दिन गुजरा और गई दीपावली पर रज्जो अपने घर को लीप रही थी ताकि लक्ष्मी पूजन और दीपावली का त्यौहार में कोई कमी न रहे कि अचानक उसके पेट में दर्द उठा और सूनसान बगिया बच्चे की किलकारी से गूँज उठी। हरिया एक स्वस्थ और सुंदर बच्चे का बाप बनकर खुशी से नाचने लगा। उसकी मंडई रोशनी से भर गई और हरिया गाँव में घूम- घूम कर मोतीचूर के लड्डू बॉटने लगा।


लोगों को आश्चर्य हुआ जब दीपावली के दिन बाग में एक साथ दो-दो मॅहगी गाड़ियों का प्रवेश हुआ और रज्जो को पुचकारने वाले रिश्तों की भीड़ लग गई। गाँव में मजदूरी की जगह पर हरिया को इसकी सूचना मिली कि गाड़ी वाले लोग उससे मिलना चाहते हैं। हरिया अपने काम को छोड़कर उनसे मिलने न गया पर उसकी रौनक उतर गई जब उसने अपने सगे संबंधियों को अपने पास आते देखा। उसने किसी से बात न की और अपने कुटिया की डगर पर बढ़ गया। आगे- आगे हरिया, पीछे-पीछे उसके बारे में जानकारी करने वाली उत्सुकता और अपराध ग्रस्त रिश्ते मूक बन कदम बढ़ाए जा रहे थे। अपनी मंडई पर पहुँचकर हरिया अपनी माँ के आँचल से लिपट गया और सबसे विनम्र भाव से कह दिया कि मैं यहाँ बहुत खुश हूँ आप सभी लोग दौलत के साथ भी बैचैन क्यों हैं?। कुछ नहीं चाहिए मुझे, हो सके तो मेरी माँ को कुछ दिन के लिए यहाँ छोड़ दीजिए ताकि मुन्ना दादी के सुख से बंचित न हो। लौटकर आप सभी के पास आने का अब कोई विकल्प शेष नही है अगर होता तो मैं यहाँ न होता। उसकी माँ भी हरिया को छोड़कर न जा सकी और उसकी बिरान मंडई में दीपावली का दीप जगमगाने लगा। रोशनी बढ़ती गई और हरिया आज उसी गाँव में रहकर अपनी कमाई से बगल में आलीशान मकान और थोड़ी सीजमीन के साथ अपनी माँ के आँचल को पकड़ कर कहता है माँ यह तुम्हारे नाती की जन्मभूमि है और तुम मेरी प्यारी जननी, किसे मिलेगी ऐसी रोशनी!


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "गीतिका" याद कर सब पुकार करते हैं जान कर कह दुलार करते है



रेणु
17 नवम्बर 2018

आदरणीय भैया -- सादर प्रणाम | आपके गद्य लेखन की बहुत प्रशंसक हूँ | ये रचना उसी दिन पढ़ ली थी और मुझे बहुत पसंद आई | सबसे बड़ी बात आप लघु कथा को थोड़े में लिखकर बड़ी बात कह जाते हैं | भावनाओं भरा हरिया का चरित्र बहुत प्रेरक है | शुभकामनाएं इस भाव स्पर्शी कथा के लिए |

महातम मिश्रा
15 नवम्बर 2018

रचना को विशिष्ठ श्रेणी में स्थान देने के लिए हृदय से मंच, मित्रों का आभारी हूँ

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
03 नवम्बर 2018
"कुंडलिया"पावन गुर्जर भूमि पर, हुआ सत्य सम्मान।भारत ने सरदार का, किया दिली बहुमान।।किया दिली बहुमान, अनेकों राज्य जुड़े थे।बल्लभ भाइ पटेल, हृदय को लिए खड़े थे।।कह गौतम कविराय, धन्य गुजराती सावन।नर्मद तीरे नीर, हीर जल मूर्ति पावन।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
03 नवम्बर 2018
30 अक्तूबर 2018
वज़्न - 221 2121 1221 212 अर्कान - मफ़ऊलु-फ़ाइलातु-मफ़ाईलु-फ़ाइलुन बह्र - बह्रे मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ मक्फूफ़ महज़ूफ़ काफ़िया - घटाओं (ओं स्वर) रदीफ़ - में खो गया"गज़ल" जब चाँद का फलक गुनाहों में खो गयातब रात का चलन घटाओं में खो गयाजज्बात को कभी मंजिलें किधर मिलतीहमसफर जो था वह विवादों में खो
30 अक्तूबर 2018
28 अक्तूबर 2018
"
”लघु कथा" "खुले गगन में मैना" उड़ रही थी एक मैना निर्भीक होकर खुले गगन में। मगन थी, अपने विश्वास से परिपूर्ण होकर अपने पंख फड़फड़ाये जा रही थी। बे-खबर थी, उन शिकारी परिंदों की ललचायी आँखों से जो अपनी उड़ान तभी भरते हैं जब कोई नयी मैना आकाश से मंत्रमुग्ध होकर अपने हौसलों को हवा में उछाल कर अपने कोमल पंख
28 अक्तूबर 2018
28 अक्तूबर 2018
"
आप का दिन मंगलमय हो,"मुक्तक"चढ़ा लिए तुम बाण धनुर्धर, अभी धरा हरियाली है।इंच इंच पर उगे धुरंधर, किसने की रखवाली है।मुंड लिए माँ काली दौड़ी, शिव की महिमा न्यारी है-नित्य प्रचंड विक्षिप्त समंदर, गुफा गुफा विकराली है।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
28 अक्तूबर 2018
27 अक्तूबर 2018
"
छन्द- वाचिक विमोहा (मापनीयुक्त मात्रिक) मापनी - 212 212 अथवा - गालगा गालगा पारंपरिक सूत्र - राजभा राजभा (अर्थात र र) विशेष : विमोहा 'मापनीयुक्त वर्णिक छंद' है, जिसमें वर्णों की संख्या निश्चित होती है अर्थात किसी गुरु 2 / गागा के स्थान पर दो लघु 11 /लल प्रयोग करने की छूट नहीं होती है। ऐसे छंद को 'वर्
27 अक्तूबर 2018
07 नवम्बर 2018
दी
सारादेश विदेश पावन दीवाली पर राममय है। इसी ६नवमबर ,१८ को अयोध्या में दीवाली परदीपोत्सव गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ।अयोध्या में देश-विदेश से आये मेहमानों के रामसमर्पित भाव को देख ह्रदय में राम नाम की धुन बज उठी। त्रेता युग के राम से मिलने कीलालसा और तीव्र हो उठी। अयोध
07 नवम्बर 2018
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x