"जन्मभूमि की रोशनी"

11 नवम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (70 बार पढ़ा जा चुका है)

"जन्मभूमि की रोशनी" कहानी


हरिया की हक़ीक़त से यूँ तो गाँव का बच्चा-बच्चा वाकिफ़ है। एक रात कोई अन्जान आदमी पूरब वाली बाग में अपनी खूबसूरत पत्नी रज्जो के साथ खुले आसमान के नीचे, घास-फूस वाली जमीन पर अपना डेरा डाल लिया है। पर क्यों, क्या उसका इस दुनियाँ में कोई ठिकाना ही नहीं है कोई नहीं जानता। सभी लोग मनगढ़ंत कहानी दुहराते हैं, विचारा भला आदमी है, मेहनत मजदूरी करके अपना पेट पाल रहा है। बहुत ईमानदार हैं खैरात के किसी वस्तु को हाथ नहीं लगाता और किसी का एक गिलास पानी भी मुफ्त में नही पीता, वगैरह वगैरह।


पराई जमीन में मिट्टी की दीवाल और उसपर सलीके से बिछाई हुई मंडई उसकी पहचान हो गई है। रज्जो बड़ी ही कुशलता से अपने आशियाने को सजाकर रखती थी और दोनों बहुत खुश भी रहते हैं, अक्सर उनकी खिलखिलाती हँसी कइयों ने सुनी भी है जिसका राज क्या है वह तो वहीँ दोनों जानते हैं। कुछ दिन गुजरा और गई दीपावली पर रज्जो अपने घर को लीप रही थी ताकि लक्ष्मी पूजन और दीपावली का त्यौहार में कोई कमी न रहे कि अचानक उसके पेट में दर्द उठा और सूनसान बगिया बच्चे की किलकारी से गूँज उठी। हरिया एक स्वस्थ और सुंदर बच्चे का बाप बनकर खुशी से नाचने लगा। उसकी मंडई रोशनी से भर गई और हरिया गाँव में घूम- घूम कर मोतीचूर के लड्डू बॉटने लगा।


लोगों को आश्चर्य हुआ जब दीपावली के दिन बाग में एक साथ दो-दो मॅहगी गाड़ियों का प्रवेश हुआ और रज्जो को पुचकारने वाले रिश्तों की भीड़ लग गई। गाँव में मजदूरी की जगह पर हरिया को इसकी सूचना मिली कि गाड़ी वाले लोग उससे मिलना चाहते हैं। हरिया अपने काम को छोड़कर उनसे मिलने न गया पर उसकी रौनक उतर गई जब उसने अपने सगे संबंधियों को अपने पास आते देखा। उसने किसी से बात न की और अपने कुटिया की डगर पर बढ़ गया। आगे- आगे हरिया, पीछे-पीछे उसके बारे में जानकारी करने वाली उत्सुकता और अपराध ग्रस्त रिश्ते मूक बन कदम बढ़ाए जा रहे थे। अपनी मंडई पर पहुँचकर हरिया अपनी माँ के आँचल से लिपट गया और सबसे विनम्र भाव से कह दिया कि मैं यहाँ बहुत खुश हूँ आप सभी लोग दौलत के साथ भी बैचैन क्यों हैं?। कुछ नहीं चाहिए मुझे, हो सके तो मेरी माँ को कुछ दिन के लिए यहाँ छोड़ दीजिए ताकि मुन्ना दादी के सुख से बंचित न हो। लौटकर आप सभी के पास आने का अब कोई विकल्प शेष नही है अगर होता तो मैं यहाँ न होता। उसकी माँ भी हरिया को छोड़कर न जा सकी और उसकी बिरान मंडई में दीपावली का दीप जगमगाने लगा। रोशनी बढ़ती गई और हरिया आज उसी गाँव में रहकर अपनी कमाई से बगल में आलीशान मकान और थोड़ी सीजमीन के साथ अपनी माँ के आँचल को पकड़ कर कहता है माँ यह तुम्हारे नाती की जन्मभूमि है और तुम मेरी प्यारी जननी, किसे मिलेगी ऐसी रोशनी!


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "गीतिका" याद कर सब पुकार करते हैं जान कर कह दुलार करते है



रेणु
17 नवम्बर 2018

आदरणीय भैया -- सादर प्रणाम | आपके गद्य लेखन की बहुत प्रशंसक हूँ | ये रचना उसी दिन पढ़ ली थी और मुझे बहुत पसंद आई | सबसे बड़ी बात आप लघु कथा को थोड़े में लिखकर बड़ी बात कह जाते हैं | भावनाओं भरा हरिया का चरित्र बहुत प्रेरक है | शुभकामनाएं इस भाव स्पर्शी कथा के लिए |

महातम मिश्रा
15 नवम्बर 2018

रचना को विशिष्ठ श्रेणी में स्थान देने के लिए हृदय से मंच, मित्रों का आभारी हूँ

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
28 अक्तूबर 2018
"
आप का दिन मंगलमय हो,"मुक्तक"चढ़ा लिए तुम बाण धनुर्धर, अभी धरा हरियाली है।इंच इंच पर उगे धुरंधर, किसने की रखवाली है।मुंड लिए माँ काली दौड़ी, शिव की महिमा न्यारी है-नित्य प्रचंड विक्षिप्त समंदर, गुफा गुफा विकराली है।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
28 अक्तूबर 2018
10 नवम्बर 2018
छं
शिल्प विधान- ज र ज र ज ग, मापनी- 121 212 121 212 121 2 वाचिक मापनी- 12 12 12 12 12 12 12 12."छंद पंचचामर"सुकोमली सुहागिनी प्रिया पुकारती रही।अनामिका विहारिणी हिया विचारती रही।।सुगंध ले खिली हुई कली निहारती रही।दुलारती रही निशा दिशा सँवारती रही।।-1बहार बाग मोरिनी कुलांच मारती रही।मतंग मंद मालती सुगंध
10 नवम्बर 2018
03 नवम्बर 2018
"
छंद - चामर, शिल्प विधान- र ज र ज र, मापनी - 212 121 212 121 212 वाचिक मापनी - 21 21 21 21 21 21 21 2 "चामर छंद"राम- राम बोलिए जुबान मीठ पाइकै।गीत- मीत गाइए सुराज देश लाइकै।।संग- संग नाव के सवार बैठ जाइए।आर- पार सामने किनार देख आइए।।द्वंद बंद हों सभी बहार बाग छाइयै।फूल औ कली हँसें मुखार बिंदु पाइयै।
03 नवम्बर 2018
05 नवम्बर 2018
वज़्न-- 1222 1222 122 अर्कान-- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन, क़ाफ़िया— वास्ता (आ स्वर की बंदिश) रदीफ़ - है"गज़ल" कहो जी आप से क्या वास्ता हैसुनाओ क्या हुआ कुछ हादसा हैसमझ लेकर बता देना मुझे भीहुआ क्या बंद प्रचलित रास्ता है।।चले जा चुप भली चलती डगर येमना लेना नयन दिग फरिश्ता है
05 नवम्बर 2018
10 नवम्बर 2018
"
"क्षणिका"सब के सब देख रहे थेलगी हुई थी आग जलता हुआ रावण दर्शनार्थी अस्त ब्यस्तट्रेन की डरावनी चिंघाड़दौड़ती हुई उतावली रफ्तारधुँआँ उड़ा आँखों के सामनेशायद ही कोई देख रहा था।।-1जमीन से जुड़े है हममाटी दीया, अनेक प्रकारअंधकार से लड़ती दीवाली लोग खरीद रहे हैं बेंच रहे हैचहल-पहल, मंहगाई व व्यवस्थाप्रकाश पटाख
10 नवम्बर 2018
30 अक्तूबर 2018
मापनी, 2122 1212 22/112, समान्त- आर, पदांत- करते हैं"गीतिका" याद कर सब पुकार करते हैंजान कर कह दुलार करते है देखकर याद फ़िकर को आयीदूर रहकर फुहार करते है ।।गैर होकर दरद दिया होगा ख़ास बनकर सवार करते हैं।।मानते भी रहे जिगर अपनाधैर्य निस्बत निहार करते है।।लौट आने लगी हँसी मुँहपरमौन महफ़िल शुमार करते हैं।
30 अक्तूबर 2018
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x