साधना :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

18 नवम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (27 बार पढ़ा जा चुका है)

साधना :---- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*भारत देश को महान बनाने में सनातन धर्म का महत्वपूर्ण योगदान रहा है | सनातन धर्म के अनुयायी ऋषियों / महर्षियों एवं साधकों ने अनन्तकाल तक कठोर साधना करके मानवमात्र को नये - नये आविष्कार करके दिये | मनुष्य को कुछ भी प्राप्त करने के लिए साधना करनी ही पड़ती है | सनातन में बताये गये चार पुरुषार्थ धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को साधक बनकर साधना करना पड़ता है | किसी भी साधना को साधने के लिए मंत्रों के जप का विधान है | मंत्र , यंत्र एवं तंत्र या अन्य किसी भी विधा की साधना करने का मध्यम मंत्र ही होते हैं | क्योंकि मंत्रों में असीम शक्ति होती है ,आवश्यकता है उनको जानने एवं साधनाकाल में नियमों के पालन की | सर्वप्रथम तो किसी साधना का निर्देश करने वाले गुरु की शरण लेना आवश्यक है क्योंकि बिना गुरु के कोई भी साधना पूर्ण नहीं हो सकती | किसी भी साधना में मन के ऊपर नियंत्रण करना पुरथम प्राथमिकता होती है ! साधनाकाल में यदि नियमों का पालन न किया जाय तो कभी कभी घातक एवं प्राणघातक तक परिणाम देखने को मिलते हैं | किसी भी मंत्र साधना में प्राय: विघ्न-व्यवधान आ जाते हैं | निर्दोष रूप में कदाचित ही कोई साधक सफल हो पाता है, अन्यथा स्थान दोष, काल दोष, वस्तु दोष और विशेष कर उच्चारण दोष जैसे उपद्रव उत्पन्न होकर साधना को भ्रष्ट हो जाने पर जप तप और पूजा-पाठ निरर्थक हो जाता है | अनेक साधकों ने अपने मन पर नियंत्रण करते हुए अनेक साधनायें सम्पन्न की हैं | किसी भी साधना का अर्थ है मन पर नियंत्रण करना |* *आज का युवावर्ग वैसे तो सनातन धर्म के कर्मकाण्डों से दूर होता जा रहा है परंतु अभी भी कुछ युवक ऐसे हैं जो कि यंत्र , मंत्र एवं तंत्र की साधना में रुचि रखते प्रतीत होते हैं | आज ज्यादातर युवाओं में "यक्षिणी साधना" एवं "अप्सरा साधना" को लेकर उत्सुकता देखी जा रही है | अनेक लोग दूरभाष पर सलाह एवं नियम भी जानने का प्रयास कर रहे हैं | यक्षिणी एवं अप्सरा साधना को लालायित ये युवक अप्सरा नाम के आकर्षण से स्वयं को बचा नहीं पा रहे हैं | वैसे तो इस यंसार में असम्भव कुछ भी नहीं है परंतु इतना आसान भी नहीं है | उपरोक्त साधना को लालायित लोगों से मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इतना ही कहना चाहूँगा कि सर्वप्रथम तो गुरुदीक्षा लेकरके अपने मन पर नियंत्रण करना सीखें | मन में उठ रही विषय वासनाओं पर नियंत्रण करना सीखें , जिस दिन मनुष्य अपने मन पर नियंत्रण करके विषय - वासनाओं से विरक्त हो जायेगा उस दिन उसे किसी भी यक्षिणी या अप्सरा की साधना करने की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी | अप्सरा नाम में ही इतना आकर्षण है कि स्मरण करते ही उसका दिव्य मनमोहक चित्र आँखों में तैरने लगता है ! यही वह समय होता है जब साधक को स्वयं पर नियंत्रण रखना होता है | अनेक साधक इसी स्थान पर अपना संयम खो देते हैं और जिसका विपरीत परिणाम उनको भुगतना पड़ता है | जो अपने मन पर नियंत्रण कर चुका है वह तो सफल हो सकता है अन्यथा साधना तो विश्वामित्र जी की भी अधूरी ही रह गयी थी |* *किसी भी साधना को साधने के पहले मन पर नियंत्रण आवश्यक है | जिस दिन मन पर नियंत्रण हो गया समझ लो आपकी साधना पूरी है |*

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